-सुसंस्कृति परिहार
तो भारतवासियों भारत की राजधानी में एक बहुत बड़ा आयोजन सम्पन्न हुआ।भारत का दुनिया में डंका बजा।भारत मंडपम में वसुधैव कुटुम्बकम की अनुभूति हुई।सोने चांदी के बर्तनों में मेहमानों की दावत हुई। दिल्ली जहां मोदीजी के पोस्टरों से पटा पड़ा था वहीं दिल्ली बंद थी पूरी तरह सूनी सूनी।यह सब इसलिए था ताकि मेहमानों की सुरक्षा को कहीं कोई खतरा ना रहे। गरीबों के घर, उनकी छोटी दूकानों को इस तरह हरे कपड़े से ढक दिया गया मानो वहां पेड़ों की सुरक्षा की गई हो।ऐसा ट्म्प के आगमन पर भी हुआ था। जताया गया भारत अमीर देश है इसलिए ऐसा व्यवहार हुआ गरीब दिखते तो प्रतिष्ठा धूमिल हो जाती।कोई बात नहीं ऐसा समां घरों में,जब किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति का आगमन होता है तो किया जाता रहा है।ये हमारी देशीय प्रवृत्ति बन चुकी है।

तो इस छुपा छुपाई के खेल में हमने अपने देश की गरिमा बढ़ाई है। मेहमानों की आवभगत में 4100 करोड़ रु ख़र्च कर डाले।बजट 919करोड़ का बनाया गया था। यहां क्या गुल खिलाया गया है कि बजट चार गुने से ज्यादा हो गया। बहरहाल हम यह शान से कह सकते हैं जिस आयोजन में जर्मनी ने पिछले वर्षों में 642करोड़,जापान ने 2020करोड़ ,इंडोनेशिया ने मात्र गत साल के आयोजन 324करोड़ ख़र्च किए वहां हम बाजी मार ले गए।इससे हमारे साहिब की शोहरत विदेशों में बढ़ जाएगी ऐसा कयास लगाया जा रहा था पर सब किए कराए पर पानी फिर जाएगा किसी ने सोचा भी ना होगा।
हुआ यह कि साहिब जी जो प्रेस कॉन्फ्रेंस विरोधी हैं इसे अनुपयोगी मानते हैं इसलिए इसे इतने बड़े आयोजन से भी निकाल दिया गया।वे ऊल-जलूल सवालों का सामना नहीं करते उन्होंने इस सम्मिट के बाद भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होने दी।जिसका मलाल अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडिन को हुआ तो उन्होंने यहां से जाकर वियतनाम में एक प्रेस कांफ्रेंस में अपने मन की भड़ास निकाल दी और भारत सरकार की ऐसी बेइज्जती कर दी कि सब गुड़ गोबर कर दिया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारत में मानवाधिकार का उल्लंघन हो रहा है,अल्पसंख्यकों के साथ बुरा व्यवहार हो रहा है तथा मीडिया आज़ाद नहीं है। विदित हो साहिबजी ने बाइडन के चुनाव में प्रतिद्वंद्वी ट्म्प की जीत के लिए भारत में नमस्ते ट्म्प और न्यूयार्क में नमस्ते अमरीका कार्यक्रम आयोजित किया था जिससे बाइडन दिली तौर पर पहले से दुखी थे। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस ना करना अपनी तौहीन मानी।
वहीं दूसरी ओर तुर्की के राष्ट्रपति तैयब एर्दोगान ने भी कुछ ऐसा कह दिया जो भारत सरकार के मुख पर करारा तमाचा है। उन्होंने भारत और अन्य देशों में इस्लामोफोबिया पर सवाल उठाया।भारत के उत्तराखंड, हिमाचल, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मुंबई, दिल्ली के उदाहरण देकर उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहाकि इस विषय पर जी 20 को विचार करना चाहिए उन्होंने कहा कि मोदी मीडिया इसे प्रशय देती है और पुलिस मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार कर रही है उनके आशियानों पर बुलडोजर चला रही है।यह चिंताजनक है।कुरान जलाने वालों की भी उन्होंने ख़बर ली। अमेरिकी राष्ट्रपति भी लगभग यह ही कह रहे हैं। इससे भारत की छवि ख़राब हुई है।
भारतीय अव्यवस्थाओं से भी मेहमान नाराज़ दिखें।ज़रा सी वारिश ने पूरे भारत मंडपम को तरण ताल में बदल दिया वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा में भारी चूक पाई गई।प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करना भी भारत सरकार पर भारी पड़ गया।विदेश से आए पत्रकार भी बहुत हताश नज़र आए। इस बीच समापन अवसर पर राजघाट महात्मा गांधी की समाधि पर गाए गए भजन ईश्वर अल्लाह तेरो नाम में से अल्लाह निकालकर परिवर्तित कर गाया गया वह पड़ोसी देशों के साथ देशवासियों को भी नागवार गुजरा।इस संकीर्ण सोच का नोटिस अन्य देशों ने भी लिया।
इस सबके बावजूद G20 के बाद जो हासिल हुआ वह भी महत्वपूर्ण है। सभी देशों ने अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को सक्रिय करना, विकास के लिए अधिक संसाधनों की उपलब्धता, पर्यटन का विस्तार, वैश्विक कार्यस्थल के अवसर, बाजरा उत्पादन और खपत के माध्यम से मजबूत खाद्य सुरक्षा और जैव-ईंधन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता जताई। G20 नेताओं ने सदी के मध्य तक या उसके आसपास वैश्विक शुद्ध शून्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, कार्बन तटस्थता प्राप्त करने के लिए सहमति जताई है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्र 2050 तक कार्बन तटस्थ बनना चाहते हैं।
आपदा जोखिम में कमी के लिए, राष्ट्रीय और स्थानीय क्षमताओं को मजबूत करके, निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार और ज्ञान साझाकरण को बढ़ाकर प्रारंभिक चेतावनी और शीघ्र कार्रवाई पर प्रगति में तेजी लाने की बात महत्वपूर्ण है।
घोषणा में कहा गया है कि जी20 नेता आपदा जोखिम में कमी और बुनियादी ढांचे प्रणालियों की जलवायु लचीलापन के विकास को बढ़ावा देकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं, विशेष रूप से विकासशील देशों, कम विकसित देशों और छोटे द्वीप विकासशील राज्यों का समर्थन करना जारी रखेंगे।
जी20 में गरीब देशों को लेकर और उनके कर्ज को लेकर भी चर्चा हुई थी जिसे भारत ने पुरजोर तरीके से उठाया भी। लेकिन भारत में बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे बड़ी चुनौतियां सरकार के सामने हैं। जिनसे पार पाना सरकार के लिए बेहद जरूरी है। ऐसे में दूसरे देशों के साथ खुद अपने देश में महंगे कर्ज, महंगाई और बेरोजगारी को कम करना काफी बड़ी चुनौती बनी हुई है।कुल मिलाकर G20 सम्मिट में भारत से बहुत आशाएं की गई है भारत एक दुनिया के बड़े बाजार में परिवर्तित होने की राह पर है किंतु जो मुनाफा अब तक हुआ उसका वितरण ही नहीं होता उसका लाभ आम लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता यदि बाज़ार का लाभ चंद लोगों तक ही पहुंचना है तो देश की अवाम के लिए यह कतई फ़ायदेमंद नहीं होगा। चीन और रुस की अनुपस्थिति ने शिखर सम्मेलन को हतोत्साहित किया। इधर घोषणापत्र पर बैठक में शामिल सभी देश राजी हो गए लेकिन वेस्टर्न मीडिया को नई दिल्ली में G20 मीटिंग का डिक्लेरेशन खास पसंद नहीं आया कई प्रमुख अखबारों में एक्सपर्ट्स की ओर से कहा गया कि यूक्रेन में युद्ध को लेकर इस बार रूस की निंदा उस तरह से नहीं की गई, जिस तरह से इंडोनेशिया बाली में पिछली आयोजित बैठक में की गई थी।
निश्चित तौर पर दो प्रमुख देशों की अनुपस्थिति के कारण भारत का दबदबा बढ़ा है किंतु देश के अंदर पनप रहे इंसानियत के विरुद्ध जो स्वर मुखर हुए हैं उन पर सरकार को विचार करना ही होगा।यदि ध्रुवीकरण के ये प्रयास वोटों की खातिर यूं ही चलते रहे तो वे दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान के कश्मीर समर्थक तुर्की के शासक के साथ अन्य देश भी इसका समर्थन करने लग जाएं।याद रखिए मानवता का पुजारी हमारा देश दुनिया के लिए मार्गदर्शक रहा यदि ऐसा होता रहा तो डूब मरने वाली बात होगी।




