~ पुष्पा गुप्ता
खुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वाकी धार.
जो उबरा सो डूब गया, जो डूबा वो पार.
जमाना बहुत आगे निकल गया है और इसकी रफ्तार बहुत तेज है।इतनी तेज कि पीछे मुड़कर कुछ भी देखें तो लगता है कि सब धुँआ-धुँआ है। भरम है। नज़रों का धोखा है। इंसान की जिंदगी की डोर इन दिनों मुकम्मल तौर पर बाज़ार के हाथों में है, जहाँ इंसानियत के रिश्ते घिसे हुए सिक्कों की तरह नहीं चल पाते।
मतलबपरस्त होना आज के जमाने की तहजीब है। शुक्र है कि हम जिंदगी के उस मुकाम से होकर गुजरे जहाँ एक इंसान दूसरे को सिर्फ इसलिए चाहता था कि वो भी एक इंसान है। बीच में न मुल्क, न मजहब, न नस्ल, न रंग, न जुबाँ।
एक थी समीरा.
वो आवाज़ों की दुनिया थी। जादू और तिलिस्म से भरी हुई। उस जादुई दुनिया के अंदरखाने तक जाने के लिए दरवाजों पर लगे तालों की चाभी मैंने हासिल कर ली थी और अब मैं भी उसी दुनिया का एक हिस्सा बनने जा रहा था। यहाँ इंसान की शिनाख्त चेहरों से नहीं, आवाजों से होती थी और आवाजों के पीछे सुर, ताल, लय, तान, मुरकियाँ इतनी ख़ामोशी से गूँजती रहतीं कि कभी यह सपने-सा लगता तो कभी सच।
लगता कि पूरी कायनात एक बड़े आकार के मंच में तब्दील हो गई है और कोई तानपूरा तो कोई सुर-मंडल के तारों को छेड़ रहा है। किसी के हाथ तबले पर थिरक रहे हैं, तो किसी के मृदंग या पखावज पर। कोई कान पर हाथ धरे आलाप ले रहा है और कोई मेघ-मल्हार में इस तरह से गरज रहा है, गोया झमामझ बारिश होकर रहेगी। गरज यह कि इन आवाजों को पकड़ने के लिए परियों के किस्सों की तरह आपको बस सामने की ओर बढ़ना था और पीछे मुड़कर देखने पर बुत बन जाने का खतरा था।
यों कौन अहमक यहाँ ऐसा था जो पीछे मुड़कर देखता! उस तिलस्मी दुनिया में अभी चार कदम रखे ही थे कि मेरे पाँव एक भारी-भरकम गठरी से टकराए। गठरी की ढीली गाँठ खुल गई और काले-गोल तवे मेरी आँखों के आगे नाचने लगे। यह वही खजाना था जो मुझे तिलस्मी दुनिया में घुसते ही मिल गया था, वरना बाज लोगों की जिंदगी खप जाती है।
ऐसी कई और गठरियाँ रेडियो सिलोन की लाइब्रेरी में उसी तरह अनदेखी पड़ी थीं, जैसे सियासी गलियारों के कोनों में इन दिनों ईमान पड़ा होता है। समीरा की कहानी इससे कुछ आगे की है। कहानी हमारे मित्र की ओर से :
यह ‘श्रीलंका ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन’ का दफ्तर और स्टूडियो था, जिसे कुछ दिनों पहले तक ‘रेडियो सिलोन’ के नाम से जाना जाता था। इस लिहाज से हम लोग कारपोरेशन के नए और पहले मुलाजिम थे, जो अब से कुछ देर पहले ही कटुनायक हवाई अड्डे से होकर यहाँ आ धमके थे। मशहूर एनाउंसर और गीतकार शिवकुमार सरोज हमें लेने आए थे। जमाल साहब भी थे। जहाँ ठहरने इंतज़ाम था, वहाँ हमसे ठहरा नहीं जा रहा था।
हाथ-मुँह धोने के बजाए हम हाथ धोकर सरोज जी के पीछे पड़ गए कि हमें बस अभी स्टूडियो देखना है। सरोज जी हमारी उतावली को समझ रहे थे। कहा, ‘मुन्ना! अभी जिंदगी पड़ी है। आज आराम कर लो, कल से ज्वाइनिंग है।” वे मुझे इसी क्षण से मुन्ना कहने लगे थे और मुन्ने को चैन नहीं पड़ रहा था। मैंने कहा, ” ज्वाइनिंग तो कल कर लेंगे, पर स्टूडियो आज ही दिखा दें।”
यह स्टूडियो देखने की उतावली इसीलिए मची हुई थी कि यहीं से वह ‘बिनाका गीतमाला’ पूरी दुनिया के आकाश में गूँजता था, जिसे मैं जबलपुर के गलगला में साबू टी स्टॉल में बैठकर सुना करता था। उन दिनों अमीन सायानी साहब का जलवा दिलीप कुमार से कम न था। तब रेडियो एनाउंसर भी फिल्मी सितारों की तरह सेलिब्रिटी हुआ करते थे। अमीन सायानी साहब से मैं मुंबई में ही मिल आया था।
हुआ यूँ कि जिस ‘श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन’ के लिए अपनी भर्ती हुई थी, उसकी आधिकारिक ट्रेनिंग एजेंसी मुंबई की ‘रेडियो एडवरटाइजिंग सर्विसेज’ थी, जिसमें अमीन सयानी साहब “बिनाका गीतमाला” रिकॉर्ड किया करते थे। उन्हें रिकॉर्ड करते हुए देखना ही अपनी ट्रेनिंग थी। पहले दिन देखा तो यकीन नहीं हुआ।
चिकोटी काटी कि कहीं यह ख्वाब तो नहीं है! साबू टी स्टॉल में जिन्हें बड़ी हसरत के साथ सुना करते थे, वो इतने करीब थे कि उन्हें छुआ जा सकता था। छूने का मन हुआ। मैंने अपने-आप को नियंत्रित किया। फिर उन्होंने कुछ जरूरी बातें बताईं। समझ में कुछ न आया, बस आवाज गूँजती रही। मेरे मन में एक अजीब-सा ख़याल आया कि “अरे! यह आवाज तो बिल्कुल अमीन सायानी जैसी है! वही साबू टी स्टॉल वाली!”
खुद पर हँसी भी आई पर जितनी देर तक उनकी आवाज़ कानों में घुलती रही, उतनी देर तक चाय के प्याले से उठने वाली गर्म भाप की खुशबू का एहसास होता रहा।
यहाँ आकर जो पहला गीत मैंने ‘टर्न टेबल’ पर सुना था, वो लताजी का था। महल फ़िल्म का, “आएगा, आएगा आने वाला आएगा।” इसी गीत की धुन में खोया हुआ मैं चहलकदमी कर रहा था कि मेरे पाँव उस करामाती गठरी से टकराए। गठरी की गाँठ खुल गई और कई रिकार्ड छिटककर बाहर आ गए। मैंने जतन से उन्हें उठाया, जैसे कोई माँ बच्चे को उठाती है।
78 आरपीएम के रिकॉर्ड थे। उस जमाने में यही चलते थे। मैंने कई बार उन्हें उल्टा-पलटा और अजूबे की तरह देखता रहा।। उनमें से कुछ के न तो कवर थे न रिकॉर्ड में कुछ छपा हुआ था। इतना समझ में आ रहा था कि यह खजाना बेशकीमती है। क्या ये वही रिकॉर्ड थे, जिन्हें ‘देश निकाला’ मिला हुआ था? लायब्रेरी के मुलाजिम ने टका सा जवाब दिया, ‘जगह नहीं है, इसलिए इन्हें बाँधकर धर दिया गया है।” मैं अवाक!
जिन्हें हीरों की तरह मुकुट में जड़ा होना चाहिए, वे पैरों की ठोकर खा रहे हैं। मैंने उन रिकॉर्ड्स के बारे में खूब सोचा। इतना सोचा कि तबीयत बिगड़ गई और आधे दिन की छुट्टी लेकर घर जाना पड़ा।
अगले दिन डायरेक्टर जनरल से मिला। अपनी पूरी बात कही। वे संवेदनशील थे। उन्होंने कुछ कर्मचारियों को आवश्यक हिदायतें दीं। रिकॉर्ड्स की सफाई के साथ उन्हें सुनने लायक बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। कई बार उँगलियों के पोरों से लहू छलक आया।
रिकॉर्ड बजे तो मालूम हुआ कि मेरा ख्याल बेजा नहीं था। वे सचमुच संगीत जगत की अनमोल धरोहर थे। कहीं -कहीं गाने के आखिर में गाने वालों ने खुद ही अपना परिचय दिया था-“माई नेम इस अख्तरी बाई।” इनके लिए कवर बनाकर नाम दर्ज कर दिए। पर सारे रिकॉर्ड्स के साथ यह बात नहीं थी।
बहरहाल, गुमनाम रिकॉर्ड्स को लेकर अचानक अपने दिमाग की बत्ती जली। एक नया प्रोग्राम “भूले बिसरे गीत” चालू किया और श्रोताओं से ही पूछना शुरू कि इस गाने के बारे में कुछ बताएँ। यह प्रयोग बेहद सफल रहा और पूरे मुल्क से हैरतअंगेज जानकारियां मिलनी शुरू हो गई। विश्वनीय सूचनाओं के साथ गुमनाम रिकॉर्ड्स अब रेडियो सिलोन की लाइब्रेरी में सम्मानपूर्वक जगह बनाने लगे।
‘फ़िल्म संगीत”, “दृश्य और गीत’, ‘हास्य संगीत”, “शीर्षक संगीत”, “अनाउंसर की पसंद”, “रेडियो पत्रिका”, “श्रीलंका की सैर” और हफ्ते के श्रोता” जैसे प्रोग्राम पहले ही काफी लोकप्रिय थे। इनकी वजह से रेडियो सिलोन के दफ्तर में रोज बोरियों में भरकर डाक आते थे। इनमें तीन -चार सौ चिठ्ठियां मेरे अपने नाम पर होतीं। ज़्यादतर प्रोग्राम से सम्बंधित होतीं। कुछ में तारीफ होती।
कुछ में निजी जीवन के सबन्ध में जिज्ञासाएं होतीं। कुछ चिठ्ठियां बिल्कुल अलग मिज़ाज की होतीं, जिनमें से एक-दो का जिक्र यहाँ करूँगा। सबका मुमकिन भी नहीं।
एक मोहतरमा कलकत्ते से थीं। वे राखी भेजती थीं। उनके खत की जुबान, लहजा, लिखावट और कागज वगैरह आम खतों से अलग थे। मुझे खटका-सा लगा। थोड़ी तहकीकात की तो पता चला कि ये डाक कोलकाता के बदनाम मोहल्ले से आती हैं। खतों के जवाब हम अलग से देते नहीं थे। जो भी कहना हो प्रोग्राम के जरिए ही कहते। फिर उन मोहतरमा का एक दुःख भरा खत आया।.
लिखा कि “लगता है कि आपको मेरे पेशे के बारे में मालूम हो गया है, इसलिए आपने राखी कबूल नहीं की।” मैं देर तक इस बारे में सोचता रहा। मेरे राखी बांध लेने से उन मोहतरमा की सेहत में क्या फर्क पड़ने वाला था? लेकिन वे कहीं न कहीं एक भावनात्मक सम्बल तलाश रही थीं और वह उन्हें मुझमें नज़र आया।
मुझे लगा कि किसी को सिर्फ इतने भर से खुशी मिल जाती है तो उसे नाउम्मीद करना ठीक नहीं है। मैंने अपने किसी प्रोग्राम में उनकी पहचान सुरक्षित रखते हुए कहा कि “यह इंसान के हालात होते हैं, जो उसे कहीं भी धकेलकर ले जाते हैं। इसमें उस इंसान का कोई कसूर नहीं होता।” मैं जब तक रेडियो सिलोन में रहा वे बिला-नागा हर साल राखी भेजती रहीं और मैं राखी बाँधता रहा।
समीरा अलबत्ता खत नहीं लिखती थीं, उनके फोन आते थे। बुधवार की शाम “बिनाका गीत माला” की घोषणा मुझे करनी होती थी। इसकी रिकॉर्डिंग आधे-आधे घण्टों के दो हिस्सों में आती। एक बार एनाउंसमेंट हो गया तो एक घण्टे की फुर्सत।
आगे अमीन सयानी साहब होते और उनके लाखों श्रोता होते! मैं खाली कमरे में बैठे-बैठे पहलू बदलता रहता। पिछले कुछ दिनों से यूँ हुआ कि ठीक इसी खाली समय में फोन की घण्टी बजती। उन मोहतरमा का नाम समीरा था। वे संगीत की शौकीन थीं और जाहिर सी बात थी कि मेरा कोई भी कार्यक्रम नहीं छोड़ती थीं।
फ़िल्म “पर्वत” का एक गीत ‘हाय मेरा दिल ले गया कोई इशारों में’ उन्हें बेहद पसंद था। यह शंकर जयकिशन की कम्पोजिशन थी। वे कहतीं कि आप यह गीत कभी भी बजा दिया करें। मेरा नाम लेना जरूरी नहीं। आगे “पाकीजा” रिलीज हुई तो “मौसम है आशिकाना” भी उनकी फरमाइश की फेहरिश्त में शामिल हो गईं। और भी बातें होतीं पर उनका केंद्र संगीत ही होता। इस बीच कुछ और चौंकाने वाली सूचनाएँ मिलतीं।
वे बतातीं की कल आप सपरिवार अमुक फ़िल्म देखने गए थे। मैं पीछे ही बैठी थी। एक बार मैं मैटिनी शो में छाता भूल आया। अगले दिन उन्होंने स्टूडियो भिजवा दिया था। मैंने उन्हें कभी नहीं देखा, बस हर बुधवार को नियम से बातें होतीं। मुझे बुधवार शाम को टेलीफोन की घण्टी की आदत हो गई थी।
फिर बुधवार की एक शाम टेलीफोन नहीं आया। अगले बुधवार को भी नहीं। थोड़ा हैरान हुआ। बुधवार की कई शामें खाली बीतीं तो इस वाकये को भूलने लगा था। कोई दो महीने बाद एक शाम को फिर से घण्टी बजी। उसी समय। समझ गया कि समीरा ही हैं। उनके सिसकने की आवाज आ रही थी। मैंने पूछा, “क्या हुआ? इतने दिनों तक कहाँ थीं?” वे रो भी रही थीं और बातें भी कर रही थीं।
मालूम पड़ा कि वे पिछले दिनों इलाज के सिलसिले में हिंदुस्तान गईं थीं। वहाँ मालूम हुआ कि उनके दिल में छेद है और जल्द ऑपरेशन करना निहायत जरूरी है। लेकिन रोने का सबब दिल की बीमारी नहीं थी। उनका कहना था कि “ऑपरेशन के लिए अमेरिका जा रही हूँ। चिंता ऑपरेशन की नहीं है। चंद दिनों बाद रोज़े की शुरुआत करनी थी, पर अब डॉक्टरों की सख्त हिदायत है। मैंने आज तक इस नियम को नहीं तोड़ा है।”
मेरा दिमाग तेजी से दौड़ने लगा। ऐसे वक्त में किसी जरूरतमंद की मदद किस तरह की जा सकती है? मैंने पूछा, ” अगर आपकी जगह कोई और आपके नाम रोज़ा रखे तो क्या आपको सवाब मिलेगा?” उन्होंने कहा, “हाँ। पर रखेगा कौन?” मैंने कहा, “मैं!” वे चौंक गयीं। कोई भी इस बात पर आसानी से यकीन नहीं करता, पर मैंने पूरे एक महीने तक ईमानदारी से रोजा रखा। पत्नी से झूठ बोला कि किसी नजूमी ने मुझे व्रत रखने को कहा है।
झूठ बोलते हुए मुझे कोई अपराध-बोध नहीं था, क्योंकि यह झूठ नेक काम के लिए पाक इरादे से कहा जा रहा था।
कई दिन बीत गए। कहीं कोई सुराग न था। रेडियो सिलोन छोड़कर मैं मुंबई आ गया था। एक दिन अचानक “रेडियो एडवरटाइजिंग एजेंसी” के दफ्तर में फोन की घण्टी बजी।
“मैं समीरा”, वही चिर-परिचित आवाज, “मुझे भूल तो नहीं गए।” मेरी दुआएँ कामयाब हो गई थीं। उनका ऑपरेशन दुरुस्त रहा। इस बीच उनका निकाह भी हो चुका था। मैंने कहा, ” कैसे भूल सकता हूँ।” कुछ किस्से ऐसे होते हैं, जो जनम भर भुलाए नहीं भूलते!





