शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी ने मुझसे कहा
इन दिनों सियासत में कुछ नए शब्दों का भी प्रचलन शुरू हुआ है।
मैने कहा साहित्यकार को शब्दों का ज्ञान तो रखना ही चाहिए।
इन दिनों सियासत में मुक्त शब्द का प्रचलन शुरू हुआ है।
सीतारामजी ने कहा मुफ्त शब्द का भी तो प्रयोग बहुत हो रहा है।
मैने कहा सियासत में मुफ्त शब्द का पर्यायवाची शब्द रेवड़ी हो गया है।
सीतारामजी मेरी बात सुनकर मुस्कुराए और कहने लगे अच्छा व्यंग्य है?
मैने कहा सियासत में किसी एक दल को मुक्त करने की घोषणा तो बहुत जोर शोर से की गई थी,लेकिन किसी को भी न खाने देंगे और स्वयं भी नहीं खाएंगे
ऐसी घोषणा के बाद “खाने वालों” से युक्त सियासत शुरू हो गई।
एक व्यवहारिक प्रश्न जेहन में उपस्थित होता है क्या देश की जनता ने क्षमा विरास्य भूषणम इस सूक्ति को चरितार्थ करते हुए घोषित आपातकाल को क्षमा कर दिया? क्या जनता ने पप्पू को सिर्फ पास ही नहीं किया बल्कि लगता है,जनता पप्पू को Distinction मतलब विशिष्टता प्रदान करने की मानसिकता में है?
गांधीजी ने कहा है कि क्षमा करने से ज्यादा साहस का काम है क्षमा मांगना।
सैद्धांतिक मुद्दा है कि, कभी भी किसी को कम नहीं आंकना चाहिए।
निम्न फिल्मी संवाद भी प्रसिद्ध है।
रावण ने हनुमानजी को एक साधारण वानर समझने की भूल की थी,उसी वानर ने पूरे लंका में आग लगा दी
बहरहाल चर्चा का मुद्दा है,कुछ शब्दों का राजनीति में प्रचलन?
मैने सीतारामजी से कहा आपने मुक्त,युक्त इन शब्दों के साथ घोषित और अघोषित शब्दों की नई बहस पैदा कर दी है?
सीतारामजी कहा लोकतंत्र के चारों स्तंभ समान रूप से मजबूत होने चाहिए, न्यायपालिका,
कार्यपालिका, विधायिका और प्रेस,यदि चारो स्तंभों में से कोई एक ज्यादा मजबूत हो जाए और किसी स्तम्भ को जान बुझकर कमजोर किया जाए तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो सकती है।
आज समाजवादी विचारक,
चिंतक,स्वतंत्रता सैनानी डॉ. राम मनोहर लोहियाजी की प्रासंगिकता स्पष्ट नजर आ रही है।
लोहियाजी ने कहा है, जब सड़क खामोश होगी तो संसद आवारा होगी आज येनकेनप्रकारेण सड़क गर्म हो रही है। भारत जोड़ो यात्रा को भी इस मुद्दे के साथ जोड़ सकते हैं?
चौथा संभ कहलाने वाली प्रेस पर जब अप्रत्यक्ष और अघोषित रूप से अंकुश लगाने की चेष्टा की जाती है,तो प्रेस के लोग कलम छोड़ सड़क पर आने पर संकोच नहीं करते हैं।
इस सूक्ति का भी स्मरण सदैव होना चाहिए असहमति लोकतंत्र की बुनियाद है
स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास साक्षी है,स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेस की अहम भूमिका रही है।
देश की स्वतंत्रता,में असंख्य लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई और असंख्य लोगों ने शहादत इसलिए नहीं दी थी की,स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़े?
बार बार यह दोहराने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि,भारत के लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को कोई भी कमजोर नहीं कर सकता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





