अग्नि आलोक
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*आधारभूत चिंतन : वैश्वानर और सत्य के विविध रूप*

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        ~ पुष्पा गुप्ता 

रैक्व म्लान हो गए। माताजी की बात ठीक लगती है। पर गाड़ी को कैसे छोड़ा जा सकता है? उनके हताश चेहरे को देखकर माताजी ने कहा, “मान ले शुभा नहीं मिलती, तो इन दुखियों के बारे में कुछ नहीं करेगा?*

      “करूँगा माँ अवश्य करूंगा। तुम जैसा कहोगी वैसा करूँगा। बताओ न क्या करू! प्राणायाम से कुछ सघनेवाला है? सधै तो प्रयत्न करूँ। पिताजी तो कहते हैं, प्राण भी विनश्वर हैं।’

“मैं भी तेरे साथ चलूंगी। राजा जानश्रुति से भी मिलूँगी। परन्तु तू अपनी गुरुभक्ति जरा मन में ही रख सबसे अपने गुरु महाभागा शुभा का गुणगान न करते फिरना में जैसा कहूंगी, वैसा ही करने का वचन दे तेरे साथ चलूंगी। बोल, में जैसा कहूंगी वैसा ही करेगा न?”

“हाँ माँ, वैसा ही करूंगा।

 “प्राणायाम भी अपनी जगह पर ठीक है। पर तू इस घटना को खंड-दृष्टि से न देख यह विशाल मानवता का प्रश्न है। तेरे पिताजी इसे वैश्वानर की उपासना कहते हैं। “

वैश्वानर क्या है, माताजी?”

“वैश्वानर? सम्पूर्ण विश्व का रूप ही नर-रूप में आराध्य है। खंड-दृष्टि से नहीं, पूर्ण दृष्टि से देखना ही वैश्वानर की उपासना है। पर चल, उन्हीं से पूछ ले। उनकी आज्ञा तो लेनी ही पड़ेगी। उनकी आज्ञा के बिना मैं तेरे साथ कैसे चल सकती हूं !”

माताजी रैक्व को साथ लेकर ऋषि के पास पहुंचीं। वे उस समय प्रसन्न मुद्रा में थे। रेक्व को देखकर अतीव प्रसन्न भाव से बोले, कैसा लग रहा है, सौम्य? माताजी के आश्रय में प्रसन्न तो हैं? चिन्तन-मनन के कार्य में कोई व्याघात तो नहीं आया?”

रेव ने माताजी की ओर देखा। माताजी समझ गई कि अभी से वचनपालन होने लगा है। मन्दस्मित के साथ उन्होंने उत्तर दिया और क्या चाहिए, इस वयस्क बच्चे को माँ चाहिए थी, और आपको पुत्र चाहिए था। संयोग से दोनों का मनोरथ पूरा हुआ। भगवान् का अनुग्रह है।”

     औषस्ति ऋषि प्रीत हुए। फिर माताजी ने ये सब बातें बताई जिनके कारण रैक्व ने जानपद जनों की सेवा का संकल्प किया है और यह भी बताया है कि आपकी अनुमति हो तो में भी इसके साथ जाना चाहती हूँ। फिर यह अनुरोध भी किया कि जाने के पूर्व वे दोनों वैश्वानर-साधना का रहस्य जानने की आकांक्षा से उनके पास आए हैं।

ऋषि और भी प्रीत जान पड़े। बोले, “साधु वत्स, तुम्हारा संकल्प महान है। तुम अपनी माताजी के साथ अवश्य जाजो सौम्य, राग-द्वेष और तृष्णा-लोभ से परे पहुँचे हुए द्वैपायन व्यास ने कहा है कि, लोक ताप से तप्त होना सबसे बड़ा तप है, क्योंकि वह अखिलात्मा पुरुष की परमाराधना है। यही वैश्वानर-उपासना भी है। मैं स्वयं तुम्हें वैश्वानर-साधना के बारे में बताने की सोच रहा था। अब तुम्हारे मन में यदि जिज्ञासा उठी है तो उत्तम अवसर भी मिल गया। पुत्र, जिज्ञासु को ही रहस्य समझाना चाहिए। वही चरितार्थ होता है। तुम सुनने के लिए उत्सुक हो न, वत्स ?

  रचच ने विनीत-भाव से कहा, “अवश्य सुनना चाहता हूँ।”

“तो सावधान होकर सुनो। पहले मैं वह प्राचीन कथा सुनाता हूँ जो गुरुमुख से मैंने सुनी थी। फिर मैं तुम्हें अपने चिन्तन-मनन से प्राप्त विचारों को भी सुनाऊँगा। सुनोः

     “उपमन्यु का वंशज प्राचीनशाल, पुलुष का वंशज सत्ययज्ञ भल्लव का वंशज इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्ष्य का वंशज जन, अश्वतराश्व का वंशज बुडिल-ये पांचों बड़ी-बड़ी शालाओं के स्वामी थे,

वेदों के महान पंडित भी थे। एक बार ये इकट्ठे हुए और विचार करने लगे कि ‘आत्मा’ क्या है, ‘ब्रह्म’ क्या है?

“ये इस निश्चय पर पहुंचे कि अरुण का वंशज उद्दालक आजकल ‘वैश्वानर-आत्मा की खोज में लगा हुआ है, चलो, उसके पास चलें ये उसके पास पहुँचे।”

  “उन्हें आया देखकर उद्दालक ने सोचा, ये महाशाल महाश्रोत्रिय मुझसे ब्रह्मज्ञान विषयक प्रश्न करेंगे, मैं इनकी सब बातों का उत्तर न दे सकूंगा; किसी अन्य गुरु के पास उन्हें ब्रह्म- ज्ञान के लिए भेज दूँ।”

“फिर उसने कहा, ‘हे महानुभाव! केकय देश का राजा अश्वपति आजकल ‘वैश्वानर आत्मा’ की खोज में लगा हुआ है। चलो, हम सब मिलकर उसी के पास चलें। फिर वे सब उसके पास गए।”

“जब वे उसके पास पहुँचे, तो राजा ने उनका अलग-अलग सम्मान करवाया और अगले दिन प्रातःकाल उठकर उनके पास पहुचा और बोला, ‘महानुभावो, आपके शुभागमन से में धन्य हुआ। आप कैसे पधारे? मेरे जनपद में कोई चोर नहीं है, कोई कृपण नहीं है, कोई माप नहीं है, कोई अनाहिताग्नि नहीं है, कोई अविद्वान नहीं है, कोई व्यभिचारी नहीं है- फिर व्यभिचारिणी तो हो ही कैसे सकती है? हे महानुभावो फिर भी हो सकता है कि मेरे अनजाने में कहीं कुछ दोष रह गया हो। आप कृपापूर्वक मुझे त्रुटियों को बतायें में हाल में ही एक यज्ञ करनेवाला है, जितना- जितना एक-एक ऋत्वि को धन दूंगा, उतना उतना आपको भी दूंगा। आप मेरे यहाँ ही निवास करें!!”

    “उन्होंने कहा, ‘राजन, हम त्रुटि बताने नहीं आए हैं। मनुष्य जिस प्रयोजन से घूम रहा हो, जिस बात की खोज में हो, उसे यही कहना चाहिए। सुना है, आप आजकल वैश्वानर-आत्मा पर विशेष मनन कर रहे हैं. आप हमें इसी का उपदेश दें।”

“राजा ने कहा, ‘प्रातः काल में इस बात का उत्तर दूंगा।’ 

अगले दिन प्रातःकाल हाथ में समिधा लेकर वे राजा के पास पहुंचे। वैसे तो, शिष्य का उपनयन करके उसे दीक्षा भी दी जाती है, परन्तु राजा इन महात्माओं के विनय भाव को देखकर इतना प्रसन्न हुआ कि उनका बिना उपनयन किए ही उन्हें उपदेश देना स्वीकार किया।”

राजा ने पहले उपमन्यु के वंशज प्राचीनशाल से पूछा, ‘आप किसे ‘आत्मा’ समझकर उसकी उपासना करते हैं?’ 

उसने उत्तर दिया, “हे राजन्! में तो द्युलोक’ को आत्मा मानकर उसकी उपासना करता हूँ।” 

राजा ने कहा, ‘ठीक है, ‘वैश्वानर- आत्मा का यह रूप तो है, परन्तु पूर्ण रूप यह नहीं है। उसके विशाल रूपों में जो तेजोमय रूप है, आप उसकी उपासना करते हैं। आप वैश्वानर के सुतेजा रूप की आराधना करते हैं, इसलिए आपके घर में सुत है, प्रसुत’ आसुत’ है, अर्थात् घर में सोम रस की धाराएँ ‘सुत हो रही हैं, बह रही हैं। तभी परमेश्वर के आशीर्वाद से आपको

भोजन मिलता है, प्रिय वस्तु दृष्टिगोचर होती है जो इस प्रकार ‘वैचानर-आत्मा’ के तेजोमय रूप की उपासना करता है, उसे उनके आशीर्वाद से भरपेट भोजन मिलता है, प्रिय वस्तुएँ देखने को

मिलती हैं, उसके कुल में ब्रह्मतेज दीख पड़ता है। यह तेजोमय द्युलोक, ‘वैश्वानर-आत्मा’ का, जिसे आप खोज रहे है, ‘मूध’ है, एक अंश है। आपका मूर्धा गिर जाता, अगर ब्रह्म के पूर्णरूप को जानने के लिए मेरे पास न आते।’

“फिर पुलुष के वंशज सत्ययज्ञ को सम्बोधित करके राजा ने पूछा, ‘हे प्राचीनयोग्य! आप किसे ‘आत्मा’ समझकर उसकी उपासना करते हैं?’ 

उसने उत्तर दिया, ‘हे राजन्! मैं तो ‘आदित्य’ को इस सूर्य को आत्मा मानकर उसकी उपासना करता हूँ।’

राजा ने कहा, ‘ठीक है, ‘वैश्वानर-आत्मा’ का यह रूप तो है ही, परन्तु पूर्ण रूप यह नहीं है। उसके अनेक रूपों में जो विश्व रूप है उसकी आप उपासना करते हैं। इसलिए आपके कुल में विश्व-रूप दिखाई देते हैं। वैश्वानर के ही आशीर्वाद से आपके यहां रथ चलते हैं, दासियाँ हैं, हार है, भरपेट भोजन है, सुहावने दृश्य हैं यही सब तो विश्व रूप है। जो इस प्रकार ‘वैश्वानर-आत्मा’ के विश्व-रूप की उपासना करता है, उसे उसके आशीर्वाद से भरपेट भोजन मिलता है, प्रिय वस्तुए देखने को मिलती है, उसके कुल में ब्रह्म-तेज दीख पड़ता है। यह विश्वरूप आदित्य ‘वैश्वानर आत्मा’ का, जिसे आप खोज रहे हैं. ‘चक्षु’ है, एक अंश है। आप अन्धे हो जाते, अगर ब्रह्म के पूर्ण रूप को जानने के लिए मेरे पास न आते।”

“फिर भल्लव के वंशज इन्द्रद्युम्न को सम्बोधित करके राजा ने पूछा, ‘वैयाघ्रपद्य! आप किसे ‘आत्मा’ समझकर उसकी उपासना करते हैं?” 

उसने उत्तर दिया, ‘राजन मैं तो ‘वायु’ को आत्मा

मानकर उसकी उपासना करता हूं।’ 

राजा ने कहा, ‘ठीक है,

“वैश्वानर आत्मा का यह रूप तो है ही, परन्तु पूर्ण रूप यह नहीं है। इसके अनेक रूपों में जो ‘पृथक वर्मा’- भिन्न-भिन्न भागों में बहनेवाला उसका रूप है आप उसकी उपासना करते हैं।

वैश्वानर के अनुग्रह से आपके पास नाना भेंट आती हैं, और नाना रथश्रेणियाँ पीछे-पीछे चलती हैं उन्हीं के अनुग्रह से आप अन्न प्राप्त करते हैं, प्रियजनों को देखते हैं। जो इस प्रकार ‘वैश्वानर-आत्मा के नाना मागों में जानेवाले रूपों की उपासना करता है, उसे उनके आशीर्वाद से भरपेट भोजन मिलता है, प्रिय वस्तुएँ देखने को मिलती हैं, उसके कुल में ब्रह्म तेज दीख पड़ता है। यह पृथक-पृथक भागों में बहनेवाला वायु वैश्वानर-आत्मा का ‘प्राण’ है। आपका प्राण निकल जाता, अगर आप ब्रह्म के पूर्ण रूप को जानने के लिए मेरे पास न आते।

“फिर शर्कराक्ष्य के वंशज जन को सम्बोधित करके राजा पूछा, ‘आप किसे ‘आत्मा’ समझ उसकी उपासना करते है ?

उसने उसने उत्तर दिया, ‘हे राजन्! मैं तो ‘आकाश’ को आत्मा मानकर उसकी उपासना करता हूँ।” 

राजा ने कहा, “वैश्वानर-आत्मा का यह रूप तो है ही, परन्तु पूर्ण रूप यह नहीं है। इसके अनेक रूपों में जो बहुल — अनन्त — रूप है, उसकी आप उपासना करते हैं। इसी कारण आपके पास बहुल प्रजा तथा धन है। उन्हीं के अनुग्रह से आप अन्न प्राप्त करते हैं, प्रियजनों को देखते हैं। जो इस प्रकार ‘वैश्वानर आत्मा के बहुल रूप की उपासना करता है, उसे उनके प्रसाद से भरपेट भोजन मिलता है, प्रिय वस्तुएं देखने को मिलती हैं, उसके कुल में ब्रह्म-तेज दीख पड़ता है। यह अनन्त आकाश ‘वैश्वानर-आत्मा का मध्य-भाग है, धड़ है। आपका घड़ नष्ट हो जाता, अगर आप ब्रह्म के पूर्ण रूप को जानने के लिए मेरे पास न आते।”

“फिर अश्वतराश्च के वंशज बुडिल को सम्बोधित करके राजा ने पूछा, वैियाघ्रपद्य! आप किसे ‘आत्मा’ समझकर उसकी उपासना करते हैं?” 

उसने उत्तर दिया, ‘हे राजन! मैं तो ‘जल’ को आत्मा मानकर उसकी उपासना करता हूँ।” 

राजा ने कहा, ‘ठीक है, “वैश्वानर आत्मा’ का यह रूप तो है ही, परन्तु पूर्ण रूप यह नहीं है। इसके अनेक रूपों में जो ‘रयि’ – सम्पति, ऐश्वर्य-रूप है, उसकी आप उपासना करते हैं। इसी कारण आप रयिमान तथा पुष्टियान हैं। भगवान् वैश्वानर के अनुग्रह से मनुष्य अन्न खाता है, प्रिय देखता है। जो इस प्रकार ‘वैश्वानर आत्मा’ के रयि रूप की उपासना करता है, उसे प्रभु के प्रसाद से अन्न मिलता है, वह प्रियदर्शन होता है, उसके कुल में ब्रह्म-वर्चस्व दीख पड़ता है। यह रयि-रूप जल ‘वैश्वानर-आत्मा का बस्ति प्रदेश- मूत्राशय है। आपका बस्ति प्रदेश नष्ट हो जाता, अगर आप ब्रह्म के पूर्ण रूप को जानने के लिए मेरे पास न आते।”

“फिर, अरुण के वंशज उद्दालक को सम्बोधित करके राजा ने पूछा, ‘हे गौतम! आप किसे ‘आत्मा’ समझकर उसकी उपासना करते हैं?” 

उसने उत्तर दिया, राजन में तो पृथिवी की आत्मा मानकर उसकी उपासना करता हूँ।’ 

राजा ने कहा, ‘ठीक है। ‘वैश्वानर- आत्मा का यह रूप तो है ही, परंतु पूर्ण रूप यह नहीं है। इसके अनेक रूपों में जो प्रतिष्ठा —  सबको सभालनेवाला — रूप है, उसकी आप उपासना करते हैं। इसी कारण आप प्रजा और पशुओं से प्रतिष्ठित हो रहे हैं। उन्हीं के अनुग्रह से मनुष्य अन्न खाता है, प्रिय देखता है। जो इस प्रकार वैश्वानर आत्मा के प्रतिष्ठा, अर्थात् स्थिरता के रूप की उपासना करता है, उसे प्रभु-प्रसाद से अन्न मिलता है, यह प्रिय दर्शन होता है, उसके कुल में ब्रह्म-वर्चस्व दीख पड़ता है। यह पृथिवी की प्रतिष्ठा, ‘वैश्वानर-  आत्मा के पाँव है। आपके पांव सूख जाते, अगर आप ब्रह्म को जानने के लिए मेरे पास न आते।”

“इतना कह चुकने के बाद अश्वपति कैक्य ने उन सब उपासकों को सम्बोधित करके कहा, ‘आप लोग ‘वैश्वानर-आत्मा’ को भिन्न-भिन्न तौर से जानते रहे, उसके पृथक-पृथक रूप की उपासना करते रहे, और अन्न खाकर जैसी तृप्ति होती है वैसी तृप्ति का जीवन व्यतीत करते रहे। आप लोग प्रादेश– मात्र ‘वैश्वानर– आत्मा’ की एक-एक अंश में उपासना करते रहे हैं। जो यह समझकर उपासना करता है कि, वह एक प्रदेश में ही नहीं है, अपितु सर्वत्र विद्यमान है, वह सब लोकों में, सब भूतों में सब आत्माओं में विद्यमान है, वैसी तृप्ति का अनुभव करता है जैसी बुभुक्षित व्यक्ति अन्न खाकर अनुभव करता है।’

“उस सर्वत्र विद्यमान ‘वैश्वानर-आत्मा’ का विराट् रूप देखो। तेजोमय द्युलोक उसका मूर्धा है, विश्वरूप आदित्य उसका चक्षु है, पृथग्वन वायु उसका प्राण है, अनन्त आकाश उसका धड़ है, ऐश्वर्य रूप जल उसका बस्ति प्रदेश है, पृथिवी उसके पाँव हैं, यज्ञ की वेदी उसकी छाती है, यज्ञ की कुशा उसके रोम हैं, गार्हपत्याग्नि उसका हृदय है, अन्वाहार्यपचनाग्नि उसका मन है।

आहवनीयाग्नि उसका मुख है।”

कथा समाप्त करके ऋषि ने रैक्च की ओर देखा। बोले, इस कथा का अर्थ जो मेरी समझ में आया है यह यह है सौम्य, कि समूचा विश्व एक पुरुषोत्तम का रूप है। यह जड़ धरित्री, सप्राण वनस्पति जीवन्त जन्तु और बुद्धिमान मनुष्य उस एक की

ही विभिन्न अभिव्यक्ति हैं — तुम भी, प्राण भी, आकाश भी, सूर्य भी, चन्द्र भी जो ऐसा समझकर सेवा में प्रवृत्त होता है उसमें अहकार नहीं होता। अहंकार सेवा की महिमा को ही कम नहीं करता, वह सेवा को सेवा ही नहीं रहने देता। अच्छा सौम्य, तुमने वायु के स्तर पर निखिलात्मा वैश्वानर को पकड़ने का प्रयत्न किया था न? तुमने बताया था न कि वायु ही पिंड में प्राण है?

हाँ भगवन्, ऐसा ही सोचा था।’

“कोई दोष नहीं है। सभी उस महासत्य के ही विभिन्न पक्ष है, किसी एक को कसकर पकड़ने से भी सत्य के द्वार तक पहुंचा जा सकता है। मुझे लगता है कि हर आदमी के लिए सत्य का रास्ता अलग-अलग होता है। आवश्यक नहीं कि सब एक ही मार्ग से चलकर परम तत्व तक पहुंचे। सच्चाई से अगर अपने स्वभाव के अनुरूप चलो तो किसी पक्ष को पकड़कर सत्य तक पहुँच सकते हो। वायु का चुनना तो केवल तुम्हारे विशिष्ट स्वभाव का सूचक मात्र है। समझ रहे हो, वत्स ।”

“समझ रहा है, भगवन्! आपने मेरे स्व-भाव को कैसा पहचाना है, यह जानना चाहता हूँ।”

हां वत्स, यह भी पहचानने का प्रयत्न कर रहा हूं, पर यह तो मेरा अनुमान मात्र ही होगा। तुम्हें स्वयं अपने आप को पहचानना होगा।

   (स्रोत : अनामदास का पोथा~ हजारी प्रसाद द्विवेदी)

Ramswaroop Mantri

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