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*सियासत के लिए राममंदिर अहम रामजन्मभूमि का अन्वेषण नहीं*

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         ~ पुष्पा गुप्ता

     रामजन्मभूमि यानी वह विशेष स्थान जहाँ राम का जन्म हुआ था। लेकिन सियासत का मकसद कभी भी रामजन्मभूमि ढूढना नहीं रहा है. मकसद वह स्थान रहा है जहाँ पर राममंदिर पहली बार बनाया गया था। 

     हिन्दू विचारधारा के अनुसार उनके देवता राम त्रेता युग में पैदा हुए थे इसलिए उनके समय और किसी विशेष जन्म-स्थान की पहचान करना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है। राम का ऐतिहासिक और भौगोलिक स्थापन हास्यास्पद हो सकता है क्योंकि राम का इतिहास और भूगोल एक रूपक की हैसियत रखता है। 

राम पर आस्था रखने वाले धर्मपरायण लोगों में गांधीजी अग्रणी रहे हैं। गांधीजी के अनुसार गीता का अध्ययन करने पर उन्हें महसूस हुआ कि यह कोई ऐतिहासिक कृति नहीं, बल्कि यह भौतिक संघर्ष के बहाने मानवजाति  के हृदय में निरंतर चल रहे द्वंद का वर्णन करती है, इसमें शारिरिक संघर्ष केवल आंतरिक द्वंद के वर्णन को अधिक मोहक बनाने के लिए दिखाया गया है।

     महाभारत के बारे में वह लिखते हैं कि मैं महाभारत को एक ऐतिहासिक कृति नहीं समझता। महाभारत के आदिपर्व में मेरे विचारों के समर्थन में प्रभावशाली प्रमाण हैं। मुख्य पात्रों को परामानवीय मूल वाले मानकर महात्मा व्यास ने राजाओं और उनके लोगों के इतिहास को छोटा बना दिया है।

      इसमें वर्णित व्यक्ति ऐतिहासिक हो सकते हैं लेकिन महाभारत के रचयिता ने उनका उपयोग सिर्फ अपनी धार्मिक विषय वस्तु के वर्णन के लिए किया है। 

रामायण को भी कुछ इसी तरह देखा जा सकता है। राम की तरह कृष्ण भी अभी तक के किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की तुलना में महान हैं और प्रत्येक हिंदू के लिए तो निश्चित रूप से महान हैं।

    वह एक संदेश, एक धार्मिक विषय-वस्तु का प्रतिनिधित्व करते हैं ना कि एक तथ्यात्मक इतिहास का। इससे इनकार करना हिंदू धर्म को एक तरह से बदनाम करना होगा।

    राम का जन्म कब हुआ था और किस निश्चित स्थान पर हुआ था, ऐतिहासिक तौर पर इसे स्थापित भी नहीं किया जा सकता क्योंकि देवत्व वाले राम का प्राचीनतम उल्लेख पहली सदी के आसपास के शिलालेखों में है(सातवाहन शिलालेख जिसमें राम एक देवता के रूप में हैं) और ठीक इसी समय के स्तूपों पर कला विशेषज्ञों/इतिहासकारों द्वारा बुद्धिष्ट रामकथा के मूर्तिशिल्प चिन्हित किये गए हैं(सन्दर्भ दशरथ जातक कथा से)। 

महत्वपूर्ण है कि राम के उल्लेख का ये दोनों प्राचीनतम ऐतिहासिक साक्ष्य उत्तर भारत से नहीं है, सातवाहन लेख महाराष्ट्र से तो भरहुत स्तूप मध्यप्रदेश और नागार्जुनकोंडा स्तूप आंध्र में है। जबकि रामकथा के अनुसार राम उत्तर भारत में पैदा हुए थे।

    इससे यही ऐतिहासिक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पहली सदी के सदियों पहले ही राम का जन्म हो चुका था अथवा रामकथा अस्तित्व में थी(यहाँ रामायण से साम्यता न ढूढें क्योंकि आज जो रामायण कथा हमारे पास है वो सदियों के साहित्यिक विकास का प्रतिफल है जिसमें समय-समय पर कथाओं को जोड़ा और बढ़ाया गया है) क्योंकि जहाँ पहली सदी में राम एक देवता रूप में स्थापित हो चुके थे वहीं रामायण के विकास पर विषयवस्तु और भाषाशैली के आधार पर अध्ययन करने वाले जे. एल. ब्रांकिगंटन ने बताया कि रामायण कालावधि और संस्कृति के आधार पर पांच चरणों में पूरी हुई।

      इसका पहला चरण जो चौथी और पाँचवीं सदी ई0 पू0(बुद्धकालीन) का है उसमें राम एक कथा के नायक भर हैं, जिनमें देवत्व अभी स्थापित नहीं हुआ था। इस समय का मौखिक रूप और इसके धार्मिक विचार वेदों से अधिक साम्यता रखते हैं न कि पुराणों से, जैसा कि गुप्तकालीन रामायण दिखती है। 

     ईस्वी सन के सदियों पहले प्रसिद्ध होने वाले राम, बुद्धिष्ट भी हो सकते हैं(दसरथ जातक जैसे एक भिन्न कथा के आधार पर) बाकी हिन्दू-पौराणिक धर्म के तो ये हैं ही(यहाँ ये लिखके कि अशोक के अभिलेखों में राम का जिक्र नहीं इसलिए अशोक के समय रामकथा का अस्तित्व नहीं था कहने वाले पहले ही जान लें कि मौर्यकालीन इतिहास या कह लें कि अशोक का भी इतिहास केवल अशोक के शिलालेखों से नहीं लिखा जा सकता क्योंकि अशोक के शिलालेखों का मुख्य विषय-वस्तु धम्म और उसका प्रसार है, उसमें सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्थिति केवल प्रसंगवश मिलती वो भी कहीं-कहीं टुकड़ों में, जैसे अगर लुम्बिनी स्तम्भलेख के अनुसार अशोक को बुद्ध के जन्मस्थान पर करों को घटाकर 1/8 न करना होता तो आर्थिक जानकारी तो कत्तई न मिलती अशोक के शिलालेखों में)।

      अभी हाल ही में मैंने जलेसर राजकीय महाविद्यालय का एक रिसर्च पेपर पढ़ा था जिसमें नारायण विष्णु से संबंधित राम की पूजा-उपासना का सबसे प्राचीन शिलालेख कौशाम्बी प्रस्तर अभिलेख का जिक्र है।

 इस शिलालेख की लाइन है :

दिवसे 10+2 गहपति

सह दारकेन इद्धघोषेन

…भगवतो रामनारायन।

     यह लेख प्राकृत में है जिसमें राम के साथ नारायण(यानी विष्णु के अवतार के रूप में) शब्द है। यहीं कौशाम्बी से ही प्राप्त शक संवत 81,83, 87 के भद्रमघ के शिलालेख के अक्षरों और विषयवस्तु से इसकी साम्यता अधिक है। कुछ अन्य अभिलेखों से मिलान करने पर स्पष्ट होता है कि यह लेख दूसरी सदी ई0 का है। क्योंकि चौथी सदी के गुप्त सम्राटों ने तो राम की पूजा-उपासना के बहुत अधिक प्रमाण छोड़ रखे हैं। 

ख़ैर, हम फिर आते हैं रामजन्मभूमि की ओर। ऐतिहासिक काल में राम की अयोध्या को “फिर से खोजने” का काम विक्रमादित्य द्वारा होता है और यह विक्रमादित्य था; गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त(455-467ई0), जो खुद को राम जैसा दिखाना चाहता था(ध्यान दें कि इसी के भीतरी अभिलेख में इसकी तुलना कृष्ण से की गई है जो अपने शत्रुओं का नाश कर उसी तरह अपनी माँ से मिलने गया जैसे श्रीकृष्ण देवकी के पास गए थे)। 

     लोकपरंपरा और इतिहासकारों के अनुसार भी अयोध्या कई बार बसा और उजड़ा है। विक्रमादित्य ने राम की अयोध्या का ‘पुनर्अन्वेषण’ करवाया और राम,सीता, लक्ष्मण, हनुमान समेत कई हिन्दू देवताओं के मंदिर भी बनवाये। यहीं से मिली गुप्तकालीन एक शिलालेख की पंक्ति है;-स्कन्दगुप्त ने शारंगी विष्णु अर्थात धनुर्धारी विष्णु के सम्मान में मंदिर बनवाया(राधेश्याम शुक्ल की रामजन्मभूमि, पृष्ठ.6)। इस पुस्तक पर संशय न करें क्योंकि इसका संदर्भ मैंने प्रसिद्ध इतिहासकर ज्ञानेंद्र पांडेय के लेख से लिया है। 

     अयोध्या जो कि गुप्तों के समय बियावान जंगल था, यही क्षेत्र गुप्तों के पहले “साकेत” नाम से कुषाण शिलालेखों में आता है जो कि एक व्यापारिक नगर था। साकेत और अयोध्या में क्या संबंध रहा है, इसके निश्चित प्रमाण तो नहीं मिलते लेकिन गुप्तकाल के कवि कालिदास ने अपने ग्रँथ रघुवंश में साकेत और अयोध्या को एक ही नगर माना है।

     यहाँ यह भी जानना बेहद जरूरी है कि एक ही शहर के कई हिस्से कई काल में बसते हैं जिनका अलग-अलग नाम होता है, जैसे सल्तनत काल और मुगल काल मिलाकर दिल्ली में 7 शहर बने थे, बाद में ये सब दिल्ली नाम से ही प्रसिद्ध हुए। साकेत और अयोध्या में यही साम्यता मुझे अधिक जँचता है। 

कहा जा सकता है कि गुप्त सम्राटों ने रामकथा के आधार पर एक ऐसे भूगोल की पुनर्रचना की जिससे अयोध्या को एक निश्चित स्थान दिया जा सके।

     गुप्तकाल के बाद भी अयोध्या में निरन्तरता विद्यमान न रह सकी, इसपे आगे लिखूँगा। इससे भी इंकार न किया जा सकता कि गुप्त सम्राटों ने प्राचीन साकेत के किसी जर्जर बौद्ध संरचना से मदद ली हो या उसे तोड़कर ही कुछ हिन्दू मन्दिर बनवाए हों क्योंकि अशोक ने बौद्ध धर्म के विस्तार में लगभग हर महत्वपूर्ण नगर के पास शिलालेख और बौद्ध विहार बनवा रखे थे, जिनका विकास मौर्योत्तर काल विशेषकर कनिष्क के समय भी होता रहा। गुप्तों के समय ही फाहियान ने साकेत के बारे में क्या लिखा है ये महत्वपूर्ण रहेगा।

Ramswaroop Mantri

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