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किसी दल में आंसुओं की झड़ी तो दूसरा दल मुस्कुराए पड़ा है

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चैतन्य भट्ट

मशहूर गजल गायक स्वर्गीय जगजीत सिंह का एक एल्बम है सहर इसमें गजलकार राजेश रेड्डी की एक ग़ज़ल बड़ी मकबूल है ये जो जिंदगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है इसी ग़ज़ल का एक शेर है कहीं आंसुओं की है दास्तां कहीं मुस्कुराहटों का है बयां ये शेर इस विधानसभा चुनाव में पूरी तरह से फिट बैठता हैं ।किसी दल में आंसुओं की झड़ी लगी है तो दूसरा दल मुस्कुराए पड़ा है, क्या-क्या अरमान सजाए बैठे थे चुनावी समर में उतरने वाले तमाम योद्धा, कोई अपने जीतने के सपने देख रहा था तो कोई सरकार बनने की और उसमें मलाईदार डिपार्टमेंट पाने के अरमान पाले बैठा था । कांग्रेस ने तो सोच ही लिया था इस बार तो उसकी सरकार पक्की है कुछ महीने पहले कमलनाथ को भावी मुख्यमंत्री बताते हुए होर्डिंग्स लगाए गए थे, दो दिन पहले भोपाल के कांग्रेस कार्यालय के सामने फिर एक पोस्टर लगाया गया था मिल रहा है सबका साथ आ रहे हैं कमलनाथ लेकिन कांग्रेस और उसके प्रत्याशियों ने कभी सोचा भी नहीं था कि उन्हें ऐसी हार का सामना करना पड़ेगा इतना ही नहीं भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को भी इस बात की उम्मीद नहीं थी कि उन्हें ऐसा जनादेश मिल जाएगा । जैसे ही रिजल्ट आए एक तरफ खुशियों की सुनामी सी आ गई और दूसरी तरफ मायूसी का सैलाब उमड़ पड़ा । पांच साल का वक्त बहुत लंबा होता है वैसे अपने हिसाब से तो कांग्रेस को अब विपक्ष में रहने की आदत पड़ गई है और अगर ना पड़ी हो तो अब उसे इसकी आदत डाल भी लेनी चाहिए, तमाम बड़े-बड़े नेता एक झटके में विधानसभा से बाहर हो गए, प्रत्याशियों ने जी भर कर पैसा खर्च किया न जाने कितने वायदे किए लेकिन हाथ में आया बाबा जी का ठुल्लू ये राजनीति की किताब भी बड़ी अजीब है एक बार जिसको इस राजनीति का खून लग जाता है फिर वो और किसी काम का रह नहीं जाता । जो नेता बरसों से नेतागिरी कर रहे थे वे हारने के बाद यही कह रहे हैं कि हम तो जनता की सेवा कर रहे थे जनता ने जो कुछ निर्णय लिया वह हम सर माथे पर रखते हैं और आगे भी सेवा करते रहेंगे, अब इसके अलावा और चारा भी क्या बचा है बेचारों के पास करें भी तो क्या करें जनता का निर्णय तो सर माथे पर रखना ही पड़ेगा । तमाम टीवी चैनलों ने अपने-अपने एग्जिट पोल दिखाए किसी ने कुछ बताया तो किसी ने कुछ बताया लेकिन जब रिजल्ट आया तो उनके तमाम एग्जिट पोल धरे के धरे रह गए। ज्योतिषियों, गुनियों तांत्रिकों की शरण में गए तमाम नेताओं को भी उनके मंत्र तंत्र नहीं बचा पाए क्योंकि चुनाव के दौरान सबसे बड़ा तांत्रिक मतदाता ही होता है और जो वह चाहता है वही होता है इसलिए अब यह कहना चाहिए प्रत्याशी लाख चाहे तो क्या होता है होता वही है जो मंजूर मतदाता होता है देखना ये है कि हारे हुए यह नेता आगे भी जनता की सेवा करते रहेंगे या फिर अपने-अपने धंधे में लग जाएंगे वैसे इसकी ही उम्मीद ज्यादा की जाना चाहिए ।

मामा का जादू
भले ही भाजपा के हाई कमान ने अपने प्रदेश के मामा शिवराज सिंह चौहान को चुनावी टिकट बांटने में और चुनाव के दौरान होने वाली बड़े नेताओं की सभाओं में साइड लाइन कर दिया हो लेकिन मामा जी तो मामा जी हैं, राजनीति का हर दांव पेंच उनके रग रग में बसा हुआ है, किस वक्त क्या करना है इसकी टाइमिंग उनसे ज्यादा बेहतर और कोई नहीं समझता यही कारण है कि पिछले 17 सालों से हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हुए हैं,लोग बात और राजनीतिक विश्लेषक भी यह मानते हैं कि जो सरकार ज्यादा समय तक रहती है उसके खिलाफ एंटी इनकंबेंसी हो जाती है लेकिन मामा जी पता नहीं ऐसी कौन सी घुट्टी इस प्रदेश की जनता को पिलाए पड़े हैं कि एंटी इनकंबेंसी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। मामा जी की एक और खासियत है वे रात दिन जनता को लुभाने वाली स्कीमों के बारे में सोचते रहते हैं,अब देखो ना और चुनाव के पहले लाडली बहना योजना शुरू कर प्रदेश की महिलाओं को हजार फिर बारह सौ देने की जो स्कीम मामा जी ने स्टार्ट की तो तमाम बहनों ने विजय का हार अपने भाई के गले में डाल दिया ।भाजपा के बड़े नेताओं को भी मानना पड़ा कि ये जो स्कीम है वो वास्तव में तरफ का पत्ता है इसलिए अंत में मामा जी का नाम भी लेना पड़ा और उनकी स्कीम के बारे में भी लोगों को लोगों के सामने कहना पड़ा की प्रदेश कि शिव राज सिंह चौहान के नेतृत्व में प्रदेश में गजब की उन्नति की है अब सवाल यह आ रहा है की मामा की इस स्कीम से जो जनादेश भारतीय जनता पार्टी को मिला है तो इसके जनक मामा शिवराज सिंह चौहान को किनारे कैसे किया जा सकता है,एक ही झटके में मामा जी ने सारा खेल अपने पक्ष में कर लिया और यही मामाकी सबसे बड़ी खासियत है अपना तो मानना ये है कि मामा जी को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी परमानेंट रूप से एलॉट कर देना चाहिए।

किसी पर भरोसा नहीं रहा
जो प्रत्याशी चुनाव में खड़े हुए थे उन्हें अपने मतदाता पर गजब का भरोसा था कि वे उन्हें ही वोट देंगे लेकिन जब रिजल्ट आया तो उनके हाथों के तोते उड़ गए ऐसी पटकनी दी मतदाता ने जो कभी सपने में भी उन्होंने सोची नहीं थी । दरअसल जनता भी राजनेताओं के साथ रह रहकर बहुत उस्ताद हो गई है जो आता था उसी से वायदा कर देते थे कि आपके अलावा तो और किसी को वोट देने का सवाल ही नहीं उठाता ,जैसे राजनेता वायदा करते हैं आपका जो भी काम होगा वह हम करेंगे लेकिन जब काम करवाने जनता जाती थी तो टरकाना के अलावा और कुछ उसे मिलता नहीं सो जनता ने भी वो स्कीम पकड़ ली है उसे भी मालूम है कि पांच साल में एक बार नेताजी दरवाजे पर आएंगे उसके बाद तो उसी को नेताजी के दरवाजे जाकर उनके हाथ पर जोड़ना पड़ेंगे इसलिए वह भी उन्हीं की तर्ज पर वायदा करने लगी है। वैसे भी इस कलयुग में किसी का किसी पर भरोसा बचा नहीं है जब जनता को नेताओं पर भरोसा नहीं तो नेता जनता पर क्यों भरोसा कर रहे हैं । फिर विश्वास का संकट तो इन दोनों बहुत तेजी पकड़ रहा है भाई भाई पर भरोसा नहीं कर रहा बाप को बेटे पर भरोसा नहीं रहा,पति-पत्नी के बीच भरोसे की डोर टूटती जा रही है जब हर तरफ भरोसा खत्म हो रहा है तो राजनीति में तो सबसे पहले यह भरोसा खत्म हो जाना चाहिए ।

Ramswaroop Mantri

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