~ नीलम ज्योति
सम्राट होकर भी वह एक गरीब लड़की के प्रेम में पड़ गया। प्रेम कहाँ देखता है यह सब.
वह इतनी गरीब थी कि थोड़े धनवान द्वारा भी खरीदी जा सकती थी, सम्राट के लिए तो कोई दिक्कत ही न थी। बात प्रेम की थी, वह ऐसा नहीं कर सकता था.
उसने लड़की को उसके पिता के साथ बुलवाया और पिता से कहा : जो तुमको जो चाहिए खजाने से सब ले लो, लेकिन यह लड़की मुझे दे दो। मैं इसके प्रेम में पड़ गया हूं। कल मैं घोडे पर सवार निकलता था, मैंने इसे कुएं पर पानी भरते देखा बस तब से मैं सो नहीं सका हूं।
बाप तो बहुत प्रसन्न हुआ, लेकिन बेटी एकदम उदास हो गयी। उसने कहा, क्षमा करें महाराज! आप राजा हैं, मै प्रजा. आदेश नहीं टाल सकती. आप कहेंगे तो आपके राजमहल में आ जाऊंगी. शरीर भी मजबूरी में सौंप दूंगी लेकिन मैं आपसे प्रेम नहीं कर सकूंगी. मेरा किसी से प्रेम है। मैं आपकी पत्नी भी हो जाऊंगी, लेकिन यह प्रेम बाधा रहेगा।
सम्राट विचारशील, सज्जन व्यक्ति था। उसने सोचा कि इस उपलब्धि में तो कुछ सार न होगा। कैसे प्रेम हो मुझ से इसका? किस से इसका प्रेम है इसका. पता लगवाया गया।
सम्राट बड़ा हैरान हुआ कि अब भी मुझे छोड्कर यह उससे प्रेम करती है, एक साधारण आदमी से. लेकिन प्रेम तो हमेशा बेबूझ होता है। उसने अपने वजीरों को पूछा कि मैं क्या करूं कि यह प्रेम टूट जाए?
आप चकित होओगे, वजीरों ने जो सलाह दी, वह बड़ी अद्भुत थी। आप मान ही न सकोगे कि यह सलाह कभी दी गयी होगी। क्योंकि यह सलाह, यह कहानी पुरानी है, फ्रायड से कोई हजार साल पुरानी। फ्रायड यह सलाह दे सकता था। मनोविज्ञान यह सलाह दे सकता है अब।
मनोविज्ञान भी सलाह देने में थोड़ा झिझकेगा। सलाह वजीरों ने यह दी कि इन दोनों को नग्न करके एक खंभे से बांध दिया जाए. दोनों को एक—दूसरे से बांध दिया जाए और खंभे से बांध दिया जाए।
सम्राट ने कहा : इससे क्या होगा?
वजीर बोले : यही तो उनकी आकांक्षा है कि एक—दूसरे की बांहों में बध जाएं। आप फिक्र न करें।
अब उनको अलिंगन में बांधकर नग्न, एक खंभे से बांध दिया गया।
अब जरा सोचो, जिस स्त्री से आपका प्रेम है, फिर वह कोई भी क्यों न हो, वह इस जगत की सबसे सुंदरी क्यों न हो; या किसी पुरुष से आपका प्रेम है, वह मिस्टर युनिवर्स क्यों न हों, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता. कितनी देर आलिंगन कर सकोगे?
पहले तो दोनों बड़े खुश हुए, क्योंकि समाज की बाधाओं के कारण मिल भी नहीं पाते थे। जातियां अलग थीं, धर्म अलग थे, चोरी-छिपे कभी यहां- वहां थोड़ी देर को गुफ्तगू कर लेते थे थोड़ी-बहुत।
अब एक-दूसरे के आलिंगन में नग्न! पहले तो बड़े आनंदित हुए. बाँधने से पहले ही नग्न होकर एक-दूसरे के आलिंगन में बंध गए। लेकिन ज़ब रस्सियों में लपेटकर उन्हें एक खंभे से बांध दिया गया तो कितनी देर यह सुख रहता. कुछ ही मिनट बीते होंगे कि वे घबड़ाने लगे कि अब अलग कैसे हों, अब छूटें कैसे? मगर वे बंधे ही रहे।
कुछ घंटे बीते और तब और अधिक उपद्रव शुरू हो गया। मलमूत्र का विसर्जन भी हो गया। गंदगी फैल गयी। एक-दूसरे के मुंह से बदबू भी आने लगी। एक-दूसरे का पसीना भी। घबड़ाहट होती गयी. चौबीस घंटे यूँ ही बंधे रहना पड़ा।
फिर जैसे ही उनको छोड़ा गया, वे ऐसे भागे एक- दूसरे से कि फिर दुबारा कभी एक-दूसरे का दर्शन नहीं किया। वह युवक तो वह गांव ही छोड्कर चला गया। यह प्रेम का अंत करने का बड़ा अहत उपाय सावित हुआ, लेकिन बड़ा मनोवैज्ञानिक।
आप देखते हो, पश्चिम में प्रेम उखड़ता जा रहा है, टूटता जा रहा है!
कारण?
स्त्री और पुरुष के बीच कोई व्यवधान नहीं रहा है, इसलिए प्रेम टूट रहा है। स्त्री और पुरुष इतनी सरलता से उपलब्ध हो गए हैं एक-दूसरे को कि प्रेम बच ही नहीं सकता. प्रेम टूटेगा ही।
संयुक्त परिवार नहीं रहा पश्चिम में तो पति और पत्नी दोनों रह गए हैं. एक मकान में अकेले। जब मिलना हो मिलें; जो कहना हो कहें; जितनी देर बैठना हो पास बैठें. कोई रुकावट नहीं, कोई बाधा नहीं। जल्दी ही चुक जाते हैं। जल्दी ही सुख ‘दु:ख’ हो जाता है।
वही संगीत पहली दफा सुनते हो, सुख; दुबारा सुनते हो, उतना सुख नहीं रह जाता। तीसरी बार सुनते हो, सुख और कम हो गया। चौथी बार ऊब पैदा होने लगती है। पांचवीं बार फिर कोई रिकार्ड चढ़ाए तो सोचते हो कि मेरा सिर घूम जाएगा। कहते हो : ”अब बंद करो! अब बहुत हो गया।’’
वही संगीत पहली दफा सुख दिया, दूसरी दफा कम, तीसरी दफा और कम।
अर्थशास्त्री नियम की बात करते हैं : ”ला आफ डिमिनिशिग रिटर्नश।” हर बार उसी चीज को दोहराओगे तो सुख की मात्रा कम होती जाती है।
पुराना ढंग प्रेम को बचाने का ढंग था। पति-पत्नी मिल ही नहीं सकते थे। दिन में तो मिल ही नहीं सकते थे। पति-पत्नी भी नहीं मिल सकते. दूसरे की पत्नी से मिलना तो मामला दूर की बात। अब तो दूसरे की पत्नी से मिलना भी इतना सरल हो गया है, जितना पहले अपनी पत्नी से भी मिलना सरल नहीं था। पश्चिमी देशों में ही नहीं, हमारे देश में भी.
अपने यहां पहले दिन भर तो मिल ही नहीं सकते थे। परिवार में बड़े-बूढे थे, बुजुर्ग थे, उनके सामने कैसे मिल सकते थे. रात में भी मिलना बड़ा चोरी-छिपे था। अपनी ही पत्नी से चोरी-छिपे मिलना. क्योंकि ज़रा भी जोर से बोल नहीं सकते थे।
छोटे-छोटे घर, जिनमें कई लोग सोए हुए हैं। चोरी-छिपे, रात के अंधेरे में। ठीक- ठीक पति अपनी पत्नी के चेहरे को जानता भी नहीं था कि वह कैसा है। अंधेरे में जानेगा भी कैसे? कभी घूंघट उठा कर रोशनी में ठीक से देखा भी नहीं था।
ऐसे में प्रेम अगर लंबा जिंदा रह जाता था तो आश्चर्य की बात नहीं. प्रेम को, सुख को क्षीण होने का मौका ही नहीं था। दिनभर अपने कामधंधे में रहते दोनों और याद जारी रहती।
अभी हालतें उल्टी हो गयी हैं। चौबीस घंटे एक-दूसरे के सामने बैठे हैं, वही खंभा, बंधे हैं। एक-दूसरे से चिढ़ पैदा होती है। पत्नी चाहती है कि कहीं उठो, कहीं जाओ, कुछ करो, यहीं क्यों बैठे हो? पति चाहता है मायके जाये.
जीवन के बड़े अद्दभुत नियम हैं! सुख और दु:ख में बहुत फर्क नहीं है। वही उत्तेजना सुख है, वही उत्तेजना दु:ख है। पसंद किए तो सुख है, ना-पसंद किए तो दु:ख है। बस नापसंद-पसंद का फर्क है। दोनों तरंगें हैं। दोनों समय के भीतर घट रही हैं। दोनों समय की झील की तरंगें हैं।






