ओमप्रकाश मेहता
लोकतंत्र की रीढ़ भारतीय संसद पिछले एक सप्ताह से भी अधिक समय से हंगामें का केन्द्र बनी हुई है, पिछली तेरह तारीख को कुछ बाहरी उपद्रवी तत्वों ने संसद में अवैध रूप से प्रवेश कर हंगामा किया था, उसके बाद प्रतिपक्षी दलों ने इस मसले पर केन्द्रीय गृहमंत्री से सरकारी बयान की मांग की थी और बयान के अभाव में लोकतंत्र के सबसे प्रमुख मंदिर हंगामें का केन्द्र बना हुआ है और अब तो संसद के दोनों सदनों के लगभग डेढ़ सौ सदस्यों का निलम्बन किया जा चुका है, यदि इस मसले पर केन्द्रीय गृहमंत्री पांच मिनट का भी बयान दे देते तो संसद को न सिर्फ हंगामें से मुक्ति मिल जाती बल्कि जनहित के कई फैसले भी लोकतंत्र का यह सबसे बड़ा मंदिर ले लेता, इस स्थिति में स्पष्ट तो यही होता है कि अपरोक्ष रूप से सरकार स्वयं नहीं चाहती कि संसद का सत्र् चले और उसमें जनहित के कार्य हो? क्या छोटी-छोटी सी राजनीतिक या गैर-राजनीतिक घटनाओं पर लम्बी तहरीर पेश करने वाले केन्द्रीय गृहमंत्री जी इस मसले पर पांच मिनट भी अपना रूख स्पष्ट नहीं कर सकते? यह सरकार और गृहमंत्री की हठधर्मी और जिद् है, नहीं तो और क्या है?
….और सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात पर भी है कि भाजपा के जिन सांसद महोदय की सिफारिश पर जारी किए गए उपद्रवी तत्वों के प्रवेश पत्र पर सरकार या गृहमंत्री ने उन भाजपा सांसद महोदय से कोई जवाब तलब नहीं किया, इस एक घटना को लेकर न सिर्फ संसद में हंगामा हुआ और करीब डेढ़ सौ सांसद पूरे सत्र के लिए सदन से निलम्बित हुए बल्कि इसी घटना से जुड़े उपराष्ट्रपति व राज्यसभा के सभापति की नकल के मामले से संसद की अशांति और बढ़ गई पश्चिम बंगाल के सांसद कल्याण चक्रवर्ती द्वारा उपराष्ट्रªपति की कि गई ‘मिमिक्री’ (नकल) ने इस निलम्बन की प्रक्रिया को और आगे बढ़ा दिया और संसद का मानसून सत्र् गड़बड़ा गया। अब इस पूरे घटनाक्रम का निचौड़ यही है कि 13 दिसम्बर की संसदीय घटना पर गृहमंत्री संसद में सिर्फ पांच मिनट का बयान दे देते तो यह हंगामा नहीं होता और संसद कई जनहित के फैसले ले सकती थी, किंतु गृहमंत्री ने ऐसा नही करके यह सिद्ध कर दिया कि सरकार के इस पूरे हंगामें पूर्ण घटनाक्रम पर मौन स्वीकृति थी, क्योंकि सरकार अपरोक्ष रूप से स्वयं संसद का सत्र चलाने के पक्ष में नहीं थी?
अब यहां यह अहम् सवाल नहीं है कि सांसदों के निलम्बन का फैसला कितना सही या कितना गलत है, मुख्य सवाल यह है कि आखिर सरकार ने ऐसी स्थिति ही क्यों पैदा होने दी? एक साथ इतने सांसदों का निलम्बन भारत के उस लचीलें या ‘लिबरल’ प्रजातंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाता है जो चार मुख्य स्तंभों पर टिका है और इन चार स्तंभों का अपने आप में काफी महत्व है, इन स्तंभों में से सरकार भी एक प्रमुख स्तंभ है और उसका मुखिया याने प्रधानमंत्री ही संसद में प्रस्तुत किए जाने वाला बयान खुलकर संसद के बाहर जाकर दे और संसद के अंदर इसी मसले पर हंगामा खड़ा हो तो प्रजातंत्र के उस महत्वपूर्ण अंग और उसके मुखिया के बारे में क्या कहा जा सकता है? इस तरह मूल रूप से सांसद वही सब कर रहे है, जो सरकार या प्रधानमंत्री जी चाहते है, इसलिए इस स्थिति के बारे में जो भी कहा जाए, वह कम ही होगा।





