,मुनेश त्यागी
उनकी फितरत है वे फैलाएंगे नफरत,
हमारी भी जिद है हम फैलाएंगे मोहब्बत।
उन्होंने उद्योगों को बनाया था तीर्थ
इन्होंने तीर्थों को बना दिया है उद्योग।
हड़पते हैं जो मेहनत को
उनको हड़पने की बात करो
बेनूर सुबह के हामी वो
तुम लाल सुबह की बात करो।
जालिम राहों में कांटे बिछाते रहे
खुदा की कसम हम मुस्कुराते रहे।
हमने दुश्मनों को हरा ही दिया
उनके हर वार पर हम मुस्कुराते रहे।
उन्हें पसंद हैं सर झुकाए हुए लोग
हमें पसंद हैं सर उठाकर चलते हुए लोग।
वो कोई और चिराग होंगे
जिन्हें बुझा देती हैं हवाएं,
हमारे चिराग तो जलते रहते हैं
तूफानों की आंधियों में भी।
वो चाहते हैं कि सिर झुका कर चलें लोग
हम चाहते हैं कि सिर उठकर चलें लोग।
रंजो गम मेरी फितरत को बदल नहीं सकते
मेरी दो आदत है हंसने और मुस्कुराने की।
यह बात तो सही है कि हो रहा है विकास
पर यह ढूंढो कि किसका हो रहा है विकास?
धर्म नहीं यह धंधा है
यहां पढ़ा लिखा भी अंधा है,
सभी धंधों में धर्म का
धंधा ही तो सबसे चंगा है।
बच्चों से मानव वश चले
बच्चे हैं घर की शान,
पर जिस घर में बेटी नहीं
वह घर है रेगिस्तान।





