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कहां हो रायपुर काॅफी_हाउस?-3

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कनक तिवारी

(28) मेरे अच्छे दोस्त तो संतधर दीवान थे। सन्त पढ़ने में बेहद जहीन था और एन.सी.सी का बड़ा ओहदेदार। संत हाॅस्टल में आकर हमारी पढ़ाई खराब करता था और फिर घर ब्राह्मणपारा के अपने घर जाकर देर रात तक पढ़ता। माइनिंग इंजीनियरिंग में अपना भाग्य बना लिया और हमारा बिगाड़ दिया। उससे कहीं ज़्यादा दोस्ती बड़े भाई बसंत दीवान से हुई। बसंत दीवान जैसा नायाब ‘एकमेवो द्वितीयो नास्ति‘ कैरेक्टर दूसरा नहीं हुआ। वे एक साथ एक अद्भुत फोटोग्राफर, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी कविता के रचनाकार, गाने और संगीत के गहरे जानकार, बल्कि कलाकार, चुटकुलों के लतीफों के थिसारस और गप्प मारने के बेताज बादशाह। बसंत की आंखों और कंठ की आवाज़ में कौन ज़्यादा असरकारक था। फैसला नहीं हो पाता था। जब वे दोनों हथियारों का इस तरह इस्तेमाल करते कि कंजूसी न रह जाए, तो सामने वाला ढेर हो जाता। बसंत दीवान की संगति समय को तरन्नुम में बहाने की एक अलग विधा की बानगी थी। उनका असामयिक निधन उनके सभी दोस्तों, परिचितों के अलावा काॅफी हाउस की टेबल कुर्सियों को भी हुआ। उनमें ही तो बैठकर वे हम जैसे मुरीदों के आकर्षण का केन्द्र बने रहते। मैंने कई बार देखा जब कोई बसंत भैया को बोलने में डिस्टर्ब करता था। तो वे अपनी जगह खडे़े हो जाते थे और टेबल के चारों ओर बैठे लोगों को घुड़कते थे कि तुम लोग चुप रहो। अब मै अपना भाषण दूंगा। चुपचाप सुनो। उस पर कोई टीका टिप्पणी नहीं करना। सवाल पूछने की इजाजत नहीं है। बहुत देर से बोर कर रहो हो। एक एक काॅफी और पिओ और मुंह बंद रखो। वे तो कवि सम्मेलन और कवि गोष्ठियों तक में भी श्रोताओं को डांट देते थे। इस आत्मविश्वास के साथ कि कोई चूं चपड़ नहीं करेगा। खुद में आत्मविश्वास को देखना मैंने बहुत कम लोगों में देखा है।

उनसे रिश्ता ठीक से बन भी नहीं पाया अर्थात फुरसत के क्षणों में बसंत दीवान की घुमक्कड़ी पियक्कड़ी और बतक्कड़ी को मिलाकर कि तभी मेरा तबादला दुर्ग हो गया। इस तरह काॅफी हाउस के मेरे उस युग का अंत हो गया और मैं ज़िंदगी के अरण्य कांड में लोगों का आखेट बनने लगा।

(29) मेरे लगभग हम उम्र रहे, लेकिन मुझसे तीन बरस छोटे और मेरे छात्र भी रहे विमल अवस्थी का ठीहा भी काॅफी हाउस में लगता रहता। विमल को कोई बात सीधे करनी आती ही नहीं थी। आज भी नहीं आती। उसकी मुखमुद्रा की भौतिकी में नाटकीयता अंदर से उभर उभरकर आती। वह आंखें बड़ी बड़ी कर सामने बोलने वाले की ओर देखता। तो उसमें उत्कंठा, आशंका और जिरह करने की गुंजाइश एक साथ झलकियों में रहतीं। वह बेहद पढा़कू रहा है। इसलिए काॅफी हाउस में उसे काॅलेज की बोरिंग कक्षाओं के मुकाबले ज़्यादा अच्छा लगता रहा होगा। बीच बीच में काॅफी हाउस में प्रांतीय सेवा के कोटे से आईएएस वगैरह में गए कुछ बुद्धिजीवी समझे जाते नौकरशाह भी आते हैं। उनकी बातों में अलग तरह का रस होता है। वह रसगुल्ले की तरह का नहीं होता। जहां एक बुद्धिजीवी की उपस्थिति में दिमागी रसमयता टपकती सी लगती है। फिर भी उनकी अपनी एक दुनिया है। काॅफी हाउस की बड़ी दुनिया में उनकी भी अपनी एक कोने की दुनिया है।

(30) मैंने कभी कभार ही ‘नवभारत‘ रायपुर के संपादक गोविन्दलाल वोरा और उनके जोड़ीदार साथी पत्रकार मधुकर खेर को वहां बैठे पाया। उनसे बहुतों का बेतकल्लुफ रिश्ता भी नहीं था। इसलिए कोई उनके ठौर जाकर अनौपचारिक बतिया ले, ऐसा कम हो पाता था। वे बूढ़ापारा के अपने निवास से मंथर गति से पैदल चलते। दुआ सलाम करते। यहां वहां किसी दुकान वगैरह में बैठ भी जाते। फिर वाया काॅफी हाउस से गुजरते जिला कलेक्टरेट की ओर जाते। शासकीय अधिकारियों से उनकी मेल मुलाकात ही तो उनकी पत्रकारिता का बहुत बड़ा संबल रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ के बाहर दिल्ली तक पत्रकारिता और शासकीय सम्पर्क की दुनिया के वे स्थायी हस्ताक्षर समझे जाते थे। उनमें वह चुस्तीफुरती, अल्हड़पन वगैरह नहीं था, जो काॅफी हाउस की हवा की खुनकी में फितरत की तरह होता है। इंगलैंड में भी अनावश्यक गंभीर किस्म के उदास दीखने की मुहिम में जुटे खूसट लेखक काफी हाउस में नहीं पाए जाते थे। काॅफी हाउस में तो उत्सवधर्मिता अपने शबाब पर होती है। इसलिए काॅफी हाउस लिटरेचर में उन्हीं मर्द लेखकों की याददाश्तें दर्ज़ हैं। जो लेखक तो थे लेकिन जिंदगी के रंगों को मर्दों की परिभाषा में जीते थे।

(31) कुछ यार लोग चाय के मुकाबले काॅफी पीना पसंद नहीं करते थे। फिर भी मुझ जैसे यार दोस्त के कारण काॅफी हाउस जाते तो थे। वेटर आकर पूछता ‘क्या चाहिए।‘ दुर्ग के सनत कुमार मिश्रा अजीब शख्सियत थे। जानबूझकर धोती और आधे बांह की सफेद कमीज पहनकर तथा सिर पर एक गमछा बांधकर गए। पूरे देहाती दिख रहे थे। कुर्सी पर बैठे तो पांव सिकोड़कर कुर्सी पर रख लिए। बेचारा वेटर मना तो नहीं कर पाया लेकिन तिरछी निगाहों से उनकी ओर देखा। मैंने भी हस्तक्षेप नहीं किया। आर्डर देने की बात पर बोले ‘भजिया है क्या? मलयाली भाषा के वेटर ने अपनी हिन्दी में कहा ‘यहां भजिया नहीं बनता।‘ ‘अच्छा आलू बोंडा होगा?‘ ‘हम आलू बोंडा भी नहीं बनाते।‘ ‘अच्छा भाई तो आलू पोहा ही दे दो।‘ वेटर बोला ‘यहां आलू पोहा भी नहीं बनता।‘ झल्लाकर सनत ने पूछा। यहां बनता क्या है? वेटर बोला ‘यहां इडली, दोसा, वड़ा, कटलेट, आमलेट, सेंडविच सांभर रसम सब मिलता है।‘ सनत बोला यह सब हम नहीं खाते ‘कुछ नहीं हो तो कम से कम भात ही दे दो।‘ वेटर बोला ‘अभी खाना नहीं बना है। रेस्टोरेंट का अभी टाइम भी नहीं हुआ है। जब टाइम होगा तो ऊपर जाइए। वहां पूरा थाली मिल जाएगा।‘ मैंने बड़ी मुश्किल से वेटर को समझाया और मामला दही बड़े पर समझौता बतौर तय हुआ। मैंने जानबूझकर सनत को चिढ़ाने के लिए एक फ्रेंच टोस्ट और ब्लैक काॅफी का आर्डर दिया। ये दोनों चीजें उस वक्त की औसत नाश्ता दूकानों में मिलती नहीं थीं। वह अचरज में पड़कर मुझे खाते और काॅफी पीते देखता रहा। बाद में निकलकर दोस्तों के सामने मजा़क उड़ाया। ‘अरे पता नहीं ये क्या क्या खाता है? क्या क्या पीता है ? दूसरे दोस्त रवि शुक्ला बेहद समझदार और गंभीर थे। लेकिन चाय पियेंगे क्या। पूछने पर अंगरेजी का वाक्य टेबल पर दै   मारते। ‘आलवेज़ टी।‘ और आलवेज़ शब्द को इतनी ज़ोर से रेखांकित करते कि टी शब्द सुनाई नहीं पड़ता था। लेकिन काॅफी से उन्हें स्थायी परहेज नहीं था। चाय के महारथी तो मेरे दोस्त रंजन मजूमदार अब यादों में गुम हो रहे हैं। लेकिन होंगे नहीं।(अभी तो जारी है)।

Ramswaroop Mantri

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