~ पुष्पा गुप्ता
सेक्स इतना बड़ा मुद्दा है कि अगर कोई इस पर लिखने की हिम्मत करे तो पढ़ने वाले, लिखने वाले की भाषा या कंटेंट पर विचार करने लगेंगे। ‘इतना अनुभव?’ सेक्स का मुद्दा हमारे समाज में शादी से काफी हद तक गुंथा हुआ है। शादी से इतर सेक्शुअल रिश्ते अलग कॉम्प्लीकेशंस लिए होते हैं।
सेक्स शादी में हो या शादी से बाहर, इसकी सहजता दोनों लोगों के बीच की समझ और भरोसा ही सबसे बड़ी चीज़ है और इस पर ध्यान बहुत कम दिया जाता है।
इस बारे में सिर्फ पुरुष ही नहीं, बल्कि औरतें भी लिखती हैं दर्द भरी भाषा में! कैसे पति या प्रेमी बिस्तर पर आता है और थकी हारी साथी को घसीटकर बिना उसमें कोई भावना जगाए अपनी वासना बुझा लेता है।
लिखा जाना ज़रूरी है मगर जो पुरुष ये लिखते हैं, क्या वे अपनी पत्नी या प्रेमिका का कंधा छूकर उसका इनकार या उसकी इच्छा समझ पाते हैं?
जो स्त्रियां ये लिखती हैं, क्या उन्होंने कभी गंभीरता से अपने साथी को इन बातों से अवगत कराया है? इतने वर्षों से प्रेम और सेक्स पर लिखे जाने के बावजूद ऐसा क्यों है कि आधे से अधिक लोग अपने प्रेमी या प्रेमिका से सेक्स के दौरान आत्मिक होकर नहीं जुड़ पाते?
क्या सेक्स दो आत्माओं का मिलन है?
किसी ने एक बार कहा था कि सेक्स जब अपने सुख के लिए किया जाता है, तो ना ही वह आनंदमय हो पाता है और ना ही आध्यात्मिक। सेक्स जब दोनों के सुख के लिए किया जाता है, जिसमें साथी का सुख ही वरीयता पर हो, उस सेक्स का सुख अब तक शायद ही कोई जान पाया हो।
सेक्स में अगर साथी की सुविधा और साथी के सुख का ध्यान ना रखा गया हो, तो स्त्री विरोध करे या ना करे, वह सेक्स है ही नहीं, वह रेप है।
रेप सिर्फ उतना नहीं है, जितना यह नज़र आता है। यह भी नहीं है कि केवल रेप ही एक समस्या है, जिसका हल होना चाहिए, रेप सिर्फ एक कड़ी है। दुनिया असल में एक लंबी जंज़ीर है। यहां जंज़ीर का नियंत्रण ताकतवर के हाथ में है, रेप और हिंसा के मामले में पुरुष ही ताकतवर है।
असमानता के क्षेत्र में पुरुषों की प्रमुख भागीदारी :
पहले तो पुरुषों को मिसोजिनिस्ट होना इस तरह सिखाया गया कि अब यह डीएनए में शामिल हो चुका है। अब जानकारी, संवेदनशीलता और प्रगतिशीलता के नाम पर और भी विकृत तरीके से चीजे़ें पेश की जा रही हैं। जैसे यह बताया जाता है कि औरतें पुरुषों से ज़्यादा सेक्शुअल होती हैं।
लेकिन यह नहीं बताया जाता कि वो सेक्शुअलिटी फंक्शन कैसे करती हैं? जैसे फेमिनज़्म में पुरुषों से बराबरी के लिए सही-गलत सारी चीज़ों को जस्टिफाई कर दिया जाता है कि मर्द स्मोकिंग और ड्रिंकिंग करते हैं, तब तो नहीं बुरा लगता?
मगर यह नहीं बताया जाता कि फेफड़ा और लिवर एक ही तरीके से काम करता है सबका।
मैं देखती हूं पीरियड्स को जब खुले मंच पर लाया जाता है, तो उसे अपवित्रता के खांचे से निकालने की कोशिश तो की जाती है लेकिन उसे मज़ाक का विषय तब भी रहने दिया जाता है।
हालांकि ये दोनों बातें आंशिक रूप से ही सही हैं। अपवित्रता वाला सिद्धांत अब भी चलता है, सिवाय उन जगहों के जहां आदमी का स्वार्थ पूरा होता हो।
अपने घर की औरत रसोई से पानी नहीं ले सकती लेकिन रेडलाइट एरिया में जाने पर पीरियड्स वाली औरतों की अलग डिमांड होती है। अजीब है कि ऐसे मर्दों को ना धर्म बहिष्कृत करता है और ना ही समाज।
आज भी रेप की रिपोर्ट नहीं की जाती है, क्योंकि इससे पीड़िता की बदनामी हो जाएगी, रेपिस्ट हमेशा खुलेआम घूमेगा। उसका परिवार, माँ-बाप, पत्नी, बच्चे, कोई बहिष्कृत नहीं करेगा। अगर वह कुंवारा निकला तो पंचायत उसी बलात्कारी से पीड़िता की शादी करवाएगी।
छेड़छाड़ के बारे में घर में अब भी नहीं बताया जाता है, क्योंकि इससे राह की दीवारों की संख्या बढ़ जाएगी। जो रेप केस दर्ज़ होते हैं, जिन पर ट्रायल होता है, उनका प्रतिशत रेप की तुलना में बहुत कम है और जिन मामलों में न्याय मिल जाता है, उन्हें तो उंगलियों पर गिना जा सकता है।
इसी तरह ‘प्रेम में स्त्री’ जैसे शीर्षक लेकर भी बहुत कुछ लिखा जाता है। कभी-कभी यह अच्छा लगता है पढ़कर और अच्छा होता अगर ये कविताएं सिर्फ कविताएं नहीं होतीं, प्रेम में स्त्री लिखने वाले पुरुष कविताओं जैसा ही प्रेम भी कर पाते।
आप इस पर अवश्य सोचें।





