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बिल्किस बानो को राहत, लेकिन कई सवाल बाकी

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2002 के गुजरात दंगों में सामूहिक बलात्कार की शिकार बिल्किस बानो को एक लंबे वक़्त के बाद फिर से इंसाफ़ मिलने की उम्मीद जगी है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 8 जनवरी को एक महत्वपूर्ण फैसले में बिल्किस बानो के दोषियों की जल्दी रिहाई के गुजरात सरकार के फैसले को खारिज कर दिया है। अदालत ने इस फैसले को सुनाते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां भी की हैं, जो भविष्य में न्याय की लड़ाई में राह दिखाने का काम करेगी। बिल्किस बानो पर आए फैसले से यह कड़वा तथ्य भी सामने आया है कि किस तरह सत्ता में बैठे लोग अपने सियासी फ़ायदे के लिए कई बार अत्याचारियों पर मेहरबान होते हैं और पीड़ितों की ओर से आंखें फेर लेते हैं। हालांकि इस प्रकरण से कई ज़रूरी सवाल भी निकले हैं, जिनके जवाब ईमानदारी से सभ्य समाज को तलाशने होंगे, क्योंकि किसी महिला का बलात्कार करना और उसके दोषियों को सजा देने की जगह उनका स्वागत करना, समाज के बीमार होने की निशानी है। यह देश ऐसे बीमार समाज को एक लंबे वक़्त से ढो रहा है।

पाठक जानते हैं कि 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में जो दंगे भड़के थे, उसमें कई हज़ार ज़िंदगियां तबाह हो गई थीं। जो लोग दंगों में मारे जाने से बच गए, उनके जीवन से बाद के वक़्त में धडक़नें गायब ही रहीं। अपनी ही जमीन पर धर्म के नाम पर एक पूरे समुदाय को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया और ढोल पीटा गया वाइब्रेंट  गुजरात और शाइनिंग इंडिया का। इन दंगों में बिल्किस बानो के साथ उनके ही गांव के कुछ लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया, उनके सामने उनके परिवार के कई लोगों को मार दिया गया। इस हैवानियत के बाद किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए उठ कर खड़े होना, और अपने लिए इंसाफ़ की लंबी लड़ाई लड़ना आसान नहीं था। लेकिन बिल्किस बानो ने अपने पति के साथ मिलकर यह लड़ाई लड़ी और आख़िरकार मुंबई में सीबीआई की विशेष अदालत ने जनवरी 2008 में बिल्किस के 11 अपराधियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इन लोगों पर गर्भवती महिला का बलात्कार, हत्या और गैरक़ानूनी तौर पर एक जगह इकट्ठा होने का आरोप लगाया गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में बिलकिस बानो को दो हफ्ते में 50 लाख रुपये मुआवज़ा, घर और नौकरी देने का आदेश दिया था। हालांकि तब गुजरात सरकार के वकील ने कहा था कि दस लाख रुपये का मुआवज़ा देना काफ़ी होगा। इससे पहले गुजरात सरकार ने बिलकिस बानो को पांच लाख रुपये का मुआवज़ा दे चुकी थी।

बलात्कार, अपने सामने अपनी बच्ची की हत्या, अपने परिवारजनों की हत्या, ऐसे दर्द को सहना मामूली बात नहीं है। कोई भी मुआवजा बिल्किस बानो की जिंदगी 2002 के पहले वाले दिनों की तरह सामान्य नहीं कर सकता। ज़िंदगी में आगे संभलने में थोड़ी मदद मिल जाए, इस नज़रिए से ही मुआवजे की व्यवस्था की गई है। लेकिन गुजरात सरकार यहां भी मोलभाव करती नजर आई। हालांकि बिल्किस पर अभी और अन्याय होना बाकी था। 2022 के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर गुजरात सरकार ने अपनी माफ़ी नीति के तहत बिल्किस के सभी दोषियों की समय से पहले रिहाई कर दी। लिहाजा बिल्किस को फिर अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। इंसाफ़ की लड़ाई में एक बार फिर बिल्किस का सामना सत्ता के संरक्षण में फलती-फूलती अमानवीयता से हुआ। उसने अपने सामने अपने बलात्कारियों का स्वागत होते देखा, उन्हें संस्कारी कहते हुए सुना। बीमार समाज संस्कारों और अपराधों का फर्क नहीं कर पाया।

लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने बिल्किस बानो के हक में फैसला सुनाते हुए यह आदेश दिया है कि उसके सभी दोषी दो हफ्ते के भीतर आत्मसमर्पण करें। यानी उन्हें फिर से जेल जाना होगा। यह लगभग वही समय होगा, जब देश राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के लिए तैयार कर दिया गया होगा। राम का महात्म्य इसी में है कि उन्होंने सीता का हरण करने वाले रावण का वध किया। लेकिन क्या मौजूदा सरकार आज के रावणों को फिर से जेल में डालेगी, ये देखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार के अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण बात कही कि गुजरात सरकार ने जिस तरह रिहाई का आदेश दिया, वह दूसरे के अधिकार को हड़पने का मामला है। सजा माफ़ी का अधिकार महाराष्ट्र सरकार के पास था, लेकिन रिहाई का आदेश गुजरात सरकार ने दिया। तो यहां सवाल ये उठता है कि क्या भाजपा अधिकार हड़पने वाली अपनी गुजरात सरकार पर कोई कार्रवाई नैतिकता के आधार पर करेगी?

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि एक दोषी ने गलत तथ्यों को पेश कर याचिका दाखिल की थी, जो एक तरह का फ्रॉड था। ऐसे में सवाल है कि अगर अदालत के साथ इस तरह की धोखाधड़ी की जा सकती है, तो फिर आम आदमी के अधिकार कितने सुरक्षित हैं। अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में गुजरात सरकार का रवैया विवादित था, इसलिए सुनवाई दूसरे राज्य में की गई। यानी शुरु से आखिर तक गुजरात सरकार किसी न किसी तरह सवालों के घेरे में है। तो फिर देश में जिस गुजरात मॉडल को प्रचारित किया गया है, वह कितना विश्वसनीय माना जा सकता है।

सबसे आखिरी सवाल बिल्किस बानो ने अपने दोषियों की रिहाई के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और लड़ाई लड़ती रहीं। मान लें कि वे एक के बाद एक अत्याचार से टूट जातीं तो क्या समाज और बेटियों को बचाने का दावा करने वाली सरकार इस अन्याय को चुपचाप देखते रहती। क्या बिल्किस बानो ने हिंदुस्तान की हर लडक़ी को यह संदेश दे दिया है कि अपने हक के लिए लड़ते ही रहना होगा, क्योंकि सरकार आपकी हिफ़ाज़त नहीं कर सकती!

देशबन्धु में संपादकीय

Ramswaroop Mantri

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