मंजुल भारद्वाज
राम
तुम कभी ईश्वर नहीं थे
तुम राजनीति का केंद्र थे !
तुम्हारी राजनीति
तुम्हारे परिवार
मां,बाप ,भाई
और पत्नी तक सीमित थी !
राम तुम कहीं भी
जन कल्याण के लिए
प्रतिबद्ध नहीं थे
तुम परिस्थिति शिकार थे
किसी भी परिस्थिति को
तुम विवेक सम्मत नहीं
सुलझा पाए !
रावण की बहन के
प्रेम प्रस्ताव को
विवेक सम्मत सुलझा सकते थे
पर तुमने उसे भाई के
जिम्मे छोड़ दिया
सीता की अग्नि परीक्षा
और वनवास
तुम्हारा महिला सम्मान पर
आघात था !
राम तुम स्त्री द्वेष के
शिकार थे !
राम
तुम मात्र एक कवि की
कल्पना हो
जिसने तुम्हारे
अक्षम राजा की छवि को
भक्ति लिहाफ़ से ढक दिया है!
राम
तुम कभी चैतन्य
विचार और विवेक
सम्पन्न नहीं थे
कवि ने तुम्हें गढ़ा है !
राम तुम स्वयं
और तुम्हें गढ़ने वाला कवि
आस्था की अंधी गहवर में
मनुष्यता को धकेलने के
जिम्मेदार हो
झूठ, फरेब ,पाखंड से
चल रही राजनीति के
मोहरे के सिवा
तुम्हारी कोई पहचान नहीं है !





