मदन जैड़ा
पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में हार-जीत के फैसले में वामपंथी दलों को मिलने वाले धर्मनिरपेक्ष मतों की भूमिका बेहद अहम होगी। कांग्रेस और वामदलों के गठबंधन को बंगाल में हुए पिछले विधानसभा चुनावों में करीब 30 फीसदी मत मिले थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में वे इन वोटों को नहीं बचा पाए थे।
पश्चिम बंगाल के वामपंथी नेताओं का कहना है कि लोकसभा चुनाव की तुलना विधानसभा चुनावों से नहीं की जा सकती है। वे इसकी तुलना बिहार से करते हैं, जहां लोकसभा में राजद को एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन डेढ़ साल बाद हुए विधानसभा चुनावों में उसने शानदार प्रदर्शन किया। पश्चिम बंगाल में करीब 70 फीसदी आबादी हिंदुओं की है। माना जा रहा है कि इसमें से 50 फीसदी के मत सीधे भाजपा की झोली में जाएंगे, लेकिन बाकी जो 50 फीसदी मत हैं, वे किसे मिलेंगे, यह एक यक्ष प्रश्न है। क्या इन मतों के ज्यादातर हिस्से पर तृणमूल काबिज होगी या फिर इसका बड़ा भाग वाम-कांग्रेस गठबंधन के पास जाएगा? सही मायने में इसी पर हार-जीत का सारा दारोमदार टिका हुआ है।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2016 के चुनावों में माकपा को करीब 20 फीसदी और तीन अन्य वामदलों भाकपा, फॉरवर्ड ब्लॉक तथा आरएसपी को करीब छह फीसदी वोट मिले थे। तब लेफ्ट कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था और 12 फीसदी वोट कांग्रेस के खाते में गए थे। इस प्रकार पिछले चुनावों में लेफ्ट-कांग्रेस के वोटों की हिस्सेदारी करीब 38 फीसदी रही, जबकि तृणमूल को 44.91 फीसदी और भाजपा महज 10 फीसदी मत हासिल हो पाए थे। लेकिन, लोकसभा चुनावों में मतों का यह पैटर्न पूरी तरह से बदल गया। मुख्य वामदल माकपा को महज 6.34 फीसदी और कांग्रेस को 5.67 फीसदी मत मिले। दूसरे वामदलों के मतों को भी जोड़ लिया जाए तो कुल मिलाकर 15 फीसदी से ज्यादा नहीं होता।
हालांकि, लोकसभा चुनावों में वाम-कांग्रेस गठबंधन नहीं था, लेकिन वोटों में उनकी कुल हिस्सेदारी 38 फीसदी से घटकर 15 फीसदी पर आ गई। तृणमूल को 43.69 फीसदी मत मिले, जो विधानसभा चुनावों से महज एक फीसदी ही कम रहा। यानी पार्टी लोकसभा चुनाव में अपना वोट बैंक बचाने में सफल रही, जिसमें लेफ्ट-कांग्रेस फेल हो गए। जबकि भाजपा 10 फीसदी से 40 फीसदी तक पहुंच गई। यानी उसे 30 फीसदी का फायदा हुआ। इससे साफ है कि वामदलों और कांग्रेस का सारा वोट भाजपा की तरफ चला गया।
हालांकि, वामपंथी नेता प्रकाश करात मानते हैं कि विधानसभा चुनावों में यह स्थिति नहीं होगी। इसके कई कारण हैं। पहला, कांग्रेस के साथ गठबंधन है। दूसरा, यह लोकसभा का नहीं विधानसभा चुनाव है, जिसमें कांग्रेस-वाम गठबंधन धर्मनिरपेक्ष राजनीति का विकल्प पेश कर रहा है। इसलिए लोकसभा चुनावों जैसा मतदान राज्य में नहीं होगा। एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि केंद्रीय बलों की मौजूदगी के कारण यदि चुनाव में गड़बड़ी नहीं हुई तो इसका फायदा वाम-कांग्रेस को भी होगा।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राज्य में भाजपा और तृणमूल ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही हैं। ऐसे में धर्मनिरपेक्ष मत कांग्रेस-वाम गठबंधन को जा सकते हैं। पर फुरफुरा शरीफ से गठबंधन के चलते वाम-कांग्रेस गठबंधन की धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल उठे रहे हैं। इसलिए राह उतनी आसान नहीं है, जितनी नजर आ रही है।





