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देश की जनता के लिए निराशापूर्ण मंजर…बिखरता विपक्ष और पिटते किसान…

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राकेश अचल

अब तो मानना ही पड़ेगा कि हमारा मुल्क तरक्की कर रहा है । एक तरफ मुल्क का विपक्ष तेजी से बिखर रहा है और दूसरी तरफ अन्नदाता ; कहा जाने वाला किसान मुल्क की राजधानी की देहलीज पर पिटता दिखाई दे रहा है। सियासत का ऐसा हसीन चेहरा आपने पहले शायद ही कभी देखा हो। हसीन इसलिए कि एक तरफ देश में खलबली मची है और दूसरी तरफ देश के भाग्यविधाता बेफिक्र होकर देश के बाहर धर्मध्वजाएं फहराने में मशरूफ हैं। मुल्क को हिन्दू राष्ट्र बनाने पर आमादा ताकतों के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता दिन ब दिन कमजोर होती जा रही है ।

विपक्षी एकता की पतवार थामने वाले नीतीश कुमार के बाद अब विपक्षी जलयान का पाल पकडे खड़े आम आदमी पार्टी के साथ ही समाजवादी और ममतामयी तृणमूल कांग्रेस वाले भी कांग्रेस का साथ छोड़कर जाते दिखाई दे रहे हैं। अब साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस और उसके मुठ्ठी भर सहयोगी ही साथ रह गए हैं। देश की जनता के लिए ये एक निराशापूर्ण मंजर है ,लेकिन कोई क्या कर सकता है ? भारतीय लोकतंत्र जिस दिशा में जा रहा है उसे रोकना नामुमकिन तो नहीं लेकिन कठिन जरूर है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस अपने आप रसातल की और जा रही है । कांग्रेस के निर्णय एक के बाद एक निराश करने वाले है। कांग्रेस की रणनीति को केवल कांग्रेस के नेता ही जानते हैं। कांग्रेस के प्रमुख चश्मों-चिराग राहुल गांद्दी ने चुनाव की मुख्य रणभूमि उत्तर प्रदेश को छोड़ दिया है । उनकी मां श्रीमती सोनिया गाँधी लोकसभा के बजाय राज्य सभा में जाने का रास्ता पकड़ चुकी हैं और उनकी बेटी प्रियंका वाड्रा ने रायबरेली और अमेठी से किनारा कर लिया है। अब नेहरू-गांधी खानदान का कोई सदस्य यूपी के चुनावी मैदान में नजर नहीं आयेगा। ऐसा होने में पूरे 77 साल लगे। हमारे यहां एक धारणा है कि देश की राजनीति उत्तर प्रदेश से चलती है ,और इस धारणा के अनेक आधार भी था । देश को जितने प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश ने दिए उतने किसी और सूबे ने नहीं दिए। खुद आज के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी इसी धारणा के चलते गुजरात छोड़कर उत्तर प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़ने आये थे और आज भी उत्तर प्रदेश में साबरमती के बजाय गंगा के बेटे बनकर चुनाव लड़ रहे हैं। ये सत्तारूढ़ दल की आक्रामकता ही है जो आज कांग्रेस उत्तर प्रदेश से अदृश्य होती जा रही है। आप कह और मान सकते हैं कि भाजपा और भाजपा के नए नेतृत्व ने कांग्रेस और नेहरू-गाँधी खानदान को उत्तर प्रदेश से खदेड़ दिया है। भाजपा धर्मनिष्ठ राजनीतिक दल है। उसके अनेक सपने भी रहे हैं और इन सपनों में से एक बड़ा सपना देश की राजनीति से कांग्रेस को बाहर करने का भी है। भाजपा और उसकी सरकार ने सत्ता सूत्र हाथ में आने के बाद जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटा दी । अयोध्या में राम मंदिर बना दिया। देश में रहने वाले 20 करोड़ मुसलमानों को जितना दबाया जा सकता था उतना दबा लिया। अब उसका एक ही सपना अधूरा रहा गया है और वो है देश की राजनीति से कांग्रेस को बाहर करना। ये सपना पूरा करने के लिए भाजपा ने आगामी लोकसभा चुनाव में अपने लिए 370 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। राजनीति के पंडितों को और गोदी मीडिया के अलावा सभी को लगता है कि ये लक्ष्य संधान करना आसान नहीं है । इसके लिए ईवीएम को साधना पडेगा ,किन्तु मै ऐसा नहीं मानता । मेरा मानना है कि भाजपा ने 2019 के आम चुनाव में प्रति मतदान केंद्र पर मात्र 20 मतदाता ज्यादा बढ़कर जो नया कीर्तिमान बनाया था उसे अब प्रति मतदान केंद्र पर 370 नए मतदाता जोड़कर बहुत आसानी से हासिल किया जा सकता है। इसके लिए न ईवीएम को इस्तेमाल करने की जरूरत है और न कोई और गड़बड़ करने की जरूरत है। कांग्रेस इस 370 को भाजपा से छीन नहीं सकती ,क्योंकि कांग्रेस के पास न ऐसी रणनीति बनाने वाले लोग हैं और न इस रणनीति को रोकने वाले लोग हैं। और ये देश का दुर्भाग्य है कि कांग्रेस लगातार दिशाहीन हो रही है। कांग्रेस के कमजोर होने का ही दुष्परिणाम है कि दो साल बाद दिल्ली की दहलीज पर अपनी पुरानी मांगों को लेकर जमा हुए किसानों को एक बार फिर पिटना पड़ रहा है। किसान अपनी मांगों को लेकर पहले भी एक साल तक दिल्ली के बाहर डटे रहे थे । किसानों ने 700 लोगों की कुर्बानी भी दी थी किन्तु किसानों को कुछ हासिल नहीं हुआ सिवाय एक धोखे के। सरकार अंकुश,तीर और बिल्ली की तरह किसानों के सामने झुकी जरूर लेकिन बाद में फिर अपने रौद्र रूप में वापस आ गयी। सरकार एक बार फिर किसानों के रास्ते में कीलें बिछाये हुए है । किसानों के साथ वार्ता का अभिनय किया जा रहा है ,और इस बात की पूरी आशंका है कि किसान इस बार भी ठगे जायेंगे। किसानों के पास वोट की ताकत है लेकिन बिखरा हुआ विपक्ष किसानों के लिए कुछ करने की स्स्थिति में नहीं है। यही स्थिति सत्तारूढ़ भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो रही है भारत की राजनीति में चौराचोरी के आंदोलन ने जो बदलाव लाया था वो बदलाव मौजूदा किसान आंदोलन की वजह से नजर नहीं आ रहा । जिस तरह पूरे देश में विपक्ष एक नहीं हो पा रहा ,उसी तरह देश का किसान एकजुट नहीं हो पा रहा । इसमें अनेक तकनीकी बाधाएं हैं। किसानों का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली से दूर है । जो दिल्ली के पास है ,उसे किसान विरोधी सरकारें दिल्ली में प्रवेश नहीं करने दे रही । मान लीजिये किसान दिल्ली में घुस भी गए तो उन्हें सिवाय लाठी-गोली के कुछ हासिल होने वाला नहीं है। देश की सरकार आम चुनाव में उतर चुकी है । सरकार और सरकारी पार्टी की आँख में अब केवल कुर्सी है। कुर्सी कि सिवाय और कुछ नहीं। सत्तारूढ़ दल किसानों को केवल आश्वासन दे सकता है ,क़ानून नहीं बना सकता ,क्योंकि अब क़ानून बनाने का समय ही नहीं रहा। वैसे भी सरकार की मंशा हमेशा से संदिग्ध रही है। किसानों को यदि अपनी मांगे पूरी करना है तो अब एक ही विकल्प है कि वो अपने वोट की ताकत का इस्तेमाल करे । जिस तरह से झारखण्ड ने सरकार को आइना दिखाया है उसी तरह दूसरे प्रदेशों में भी मोर्चाबंदी करे। विपक्षी एकता में सेंध लगाने वालों को सबक सिखाये। किसान यदि ऐसा नहीं कर सकते तो तो उनके साथ वो ही सलूक होगा जो आज हो रहा है। आज का युग मंदिरों में घंटियाँ बजाने का है ,आंदोलन कर आप सरकार को नींद से नहीं जगा सकते। जय सियाराम।

Ramswaroop Mantri

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