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 गंगा जमुनी तहजीब पर हो रहे हमलों का माकूल जवाब

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मुनेश त्यागी

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना तेरी
जिंदगी शमअ की सूरत हो खुदाया मेरी।

दूर दुनिया का मेरे दम से अंधेरा हो जाए
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए।

हो मेरे हमदम से यूंही मेरे वतन की जीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की जीनत।

जिंदगी हो मेरी परवाने की सूरत या-रब
इल्म की शमअ से हो मुझको मोहब्बत या-रब।

हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्द-मंदो से जईफों से मोहब्बत करना।

मिरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझ को
नेक जो रहा हो रह पर चलाना मुझको।

यह वही प्रार्थना है कि जिसे लेकर पिछले दिनों  उत्तर प्रदेश के बरेली स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा प्रार्थना के रूप में ईश्वर भक्ति के रूप में गया गया था। अब इसे धार्मिक प्रचार बताकर स्कूल की प्रधान अध्यापिका नाहिद सिद्दीकी निलंबित कर दिया गया है और शिक्षामित्र वजीरउद्दीन को नौकरी से निकाल दिया गया है।
   यहां पर सबसे अहम सवाल उठता है कि आखिर प्रार्थना में किसी को क्या समस्या है, इसमें किसी को क्या परेशानी हो रही है? इसमें तो नेक राह पर चलाने और बुराई से बचाने की प्रार्थना यानी दुआ की जा रही है। इसमें तो गरीबों की हिमायत करने और दर्दमंदों और जईफों यानी गरीबों से प्यार मोहब्बत करने की बात की जा रही है। इसमें तो दुनिया से अंधेरा दूर करने और हर जगह उजाला किए जाने की बात हो रही है, वतन और चमन के सम्मान की बात हो रही है।

इसमें तो बुराई से बचने और नेक राह पर चलने की बात की जा रही है।
अल्लामा इकबाल साहब जिन्होंने “सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा” लिखा था जो आज भी भारत के कोने कोने में गाया जाता है, द्वारा लिखित इस प्रार्थना को लेकर हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा विवाद उठाया जा रहा है। इसे समाज के गंभीर लोगों को धैर्य से पढ़कर यह बताना चाहिए कि इसमें एतराज जताने लायक क्या लिखा गया है? एतराज करने वालों ने ऐसा कुछ भी नहीं बताया है।
इस प्रार्थना में तो उस सबकी दुआ की गई है कि जिससे हर एक आदमी अच्छा इंसान बन सकता है। इस प्रार्थना में अल्लाह और उर्दू शब्दों के होने पर एतराज उठाया जा रहा है। इस पूरी कविता यानी प्रार्थना को पूरा पढ़कर जगजाहिर है कि इसमें कुछ भी विवादित या ऐतराज करने योग्य नहीं है। अगर सब चीजों को ऐसे ही लेकर विवाद का मुद्दा बनाया जाएगा तो यह भारत की साझी विरासत और गंगा जमुनी तहजीब पर गहरी चोट होगी। हम तो यह भी कहते हैं इस कविता में जो भी प्रार्थना या दुआ की जा रही है ऐसी दुआ और प्रार्थना तो हम सब करना चाहेंगे जिससे कि हम बुराई से बचें और नेक रस्ते पर चलें, गरीबों की मदद करें, दुनिया में रोशनी फैलाए, और धर्मांधता, पाखंडों, अज्ञानताओं और अंधेरों को दूर करें।
यहां उर्दू शब्दों को लेकर एतराज उठाया जा रहा है। मगर हकीकत तो यह है कि हमारे समाज में रोजाना हजारों उर्दू शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। अगर हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और व्यवहार से उर्दू भाषा और शब्दों को निकाल दें तो हमारी सारे हिंदी भाषी गूंगे और बहरे हो जाएंगे। वे सब के सब बोलने के शब्द कहां से लाएंगे? वे तो खाने पीने, पहनने के शब्दों से तरस जाएंगे क्योंकि रोटी, तवा, कपड़ा, कमीज, पजामा, कुर्ता, कचहरी, कानून, अदालत आदि-आदि हजारों शब्द उर्दू भाषा के हैं जिन्हें अपनाकर हिंदी भाषा दुनिया की एक सर्वश्रेष्ठ भाषा बन गई है उसकी खूबसूरती का पूरी दुनिया में कोई जवाब नहीं है यही भाषा तो कहती है,,,,
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा
हिंदी है हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा
इसी भाषा में तो हम रोज गाते और कहते हैं,,,
हम मेहनतकश जग वालों से
जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं एक देश नहीं
हम सारी दुनिया मांगेंगे।

 इसी हिंदुस्तानी भाषा में तो हम रोज गाते हैं,,,,,,

जात धर्म के झगड़े छोड़ो
समता ममता की बात करो,
बहुत रहे लिए अलग-थलग अब
मिलने जुलने की बात करो।
और
इसी भाषा में हम कहते हैं,,,,,,
सारे ताने-बाने को बदलो
खुद भी बदलने की बात करो,
हारे थके आधे अधूरे नहीं अब
पूरे इंकलाब की बात करो।

ये जो लोग इस प्रार्थना में उर्दू लफ्जों को लेकर एतराज और विवाद कर रहे हैं, क्या इसे कोई धर्म प्रचार मान लिया जाएगा? क्या हम इन विभाजनकारी नफरती तत्वों से पूछ सकते हैं कि यदि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रार्थना सभी स्कूलों में गाए जाने वाली “वर दे वीणावादिनी, वर दे वर दे” को भी देवी सरस्वती को संबोधित होने और संस्कृतनिष्ठ होने के कारण वे इसे आपत्तिजनक और विवादित मानने के लिए तैयार होंगे?
हमारा सोच, हमारी समाज व्यवस्था और हमारी हमारी सोच और हमारा व्यवहार गंगा जमुनी तहजीब और साझी संस्कृति की अनेक मिसालों से भरा पड़ा है, अगर हम गंगा जमुनी तहजीब की इन इस मिली-जुली संस्कृति पर इन सांप्रदायिक हिंदुत्ववादी लोगों की बातों को मानेंगे तो हमारी गंगा जमुनी तहजीब और साझी संस्कृति जिंदा नहीं रह सकती। हमारी गंगा जमुनी तहजीब में, जय हिंद,,,, आबिद हसन, भारत छोड़ो,,,,, युसूफ मेहर, तिरंगे का स्वरूप,,,,, सुरैया तैयब, इंकलाब जिंदाबाद,,,,, हसरत मोहनी, सरफरोशी की तमन्ना,,,,, बिस्मिल अजीमाबादी, भारत की जय,,,,,, अजीमुल्ला खान, सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा,,,, अल्लामा इकबाल, जैसे लेखकों,शायरों और बुद्धिजीवियों द्वारा रचित मिली-जुली सभ्यता संस्कृति के नारों और बहुमूल्य विरासत से भरा पड़ा है। अगर हम इन हिंदुत्ववादी तत्वों की बात पर विश्वास करें, तो हमें इस सारी महान साझी संस्कृति को तिलांजलि देनी होगी, जो किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है और ना ही ऐसा सोचा भी जा सकता है।
ऐसी ही बातों को लेकर कई मस्जिदों को लेकर विवाद उठाए जा रहे हैं। अभी मथुरा की शाही ईदगाह को लेकर विवाद शुरू हो गया है। पहले यही विवाद काशी मस्जिद को लेकर उठाया गया था जबकि प्लेसिस आफ वरशिप एक्ट 1991, स्पष्ट रूप से कहता है कि अयोध्या के मामले को छोड़कर अन्य सभी उपासना स्थल मंदिर मस्जिद उसी स्थिति में रहेंगे जिस स्थिति में 15 अगस्त 1947 से पहले थे।
दुर्भाग्य यह है कि ज्यादातर अदालतें भी इन बहुसंख्यक हिंदुत्ववादी संप्रदाय की राजनीति करने वालों और हिंदू मुसलमान के नारे नाम पर जनता में नफरत और हिंसा की राजनीति करने वालों के दबाव में संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों को का उल्लंघन कर रही हैं।
अब तो इन सांप्रदायिक ताकतों का यह रोजमर्रा का काम हो गया है कि हिंदू मुसलमान के नाम पर फैलाये जा रहे नफरत के माहौल को जारी रखा जाए और जनता की एकता को तोड़ा जाए, ताकि जनता अपने बुनियादी सवालों,,,, रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार महंगाई भ्रष्टाचार और समाज में फैली दूसरी समस्याओं पर विचार ही ना करें, बस इन्हीं नफरत भरी मुहिम में लगी रहे और अलग थलग पड़ जाएं। हमें जनता की एकता को तोड़ने वाले और विभाजन करने वाली इन ताकतों से होशियार रहने की जरूरत है, इनकी राजनीति में आने की कतई भी आवश्यकता नहीं है।
इस प्रार्थना के मामले में हम सरकार से मांग करते हैं कि इन दोनों शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से नौकरी पर बहाल किया जाए और सरकार और हमारी सारी जनता, विविधता से भरे देश के माहौल, गंगा जमुनी तहजीब और साझी संस्कृति पर हो रहे इरादतन हमलों का मुंहतोड़ जवाब दें और गंगा जमुनी तहजीब की रक्षा करें और हिंदू मुसलमान के नाम पर नफरत फैलाने की राजनीति करने वालों को पूरी जनता के सामने नंगा करें और अलग-थलग करें। वर्तमान समय में हर कवि, लेखक और साहित्यकर्मी की यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि नफरत फैलाने वाले इन लोगों को समाज में हावी न होने दें।

Ramswaroop Mantri

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