
प्रो. राजकुमार जैन
23 मार्च को ग्वालियर में आईटीएम यूनिवर्सिटी की ओर से भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ-साथ डॉ राम मनोहर लोहिया यादगार दिवस मनाया गया। पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार गांधी पीस फाउंडेशन के अध्यक्ष कुमार प्रशांत को मुख्य भाषण देना था, परंतु अचानक अस्वस्थता के कारण उन्होंने भाग लेने में असमर्थता व्यक्त कर दी। इसके बाद जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा से इस कार्य को संपन्न करने का आग्रह किया गया। मनोज सिन्हा ने अपने वक्तव्य मैं गांधीजी की प्रशंसा के साथ-साथ यह कहकर गंभीर आपत्तिजनक वक्त दे दिया कि गांधीजी के पास कानून की डिग्री नहीं थी वह डिप्लोमा धारी थे। सोशल मीडिया में यह वक्तव्य प्रसारित होने के बाद स्वाभाविक रूप से तीव्र प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। लगता है कि श्री मनोज सिन्हा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो स्वयं बिना डिग्री धारी है। उनके बारे में झूठ -मूठ का प्रचार किया जाता है कि, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के पत्राचार विभाग से बीए की डिग्री हासिल की। तत्पश्चात एनटायर पॉलिटिकल साइंस में m.a. की सनद प्राप्त की। परंतु झूठ पकड़े जाने पर मोदी के समर्थकों को ने एक नया पैंतरा अख्तियार किया कि महापुरुषों के जीवन में डिग्री का कोई महत्व नहीं होता इसी क्रम में मनोज सिन्हा गांधीजी पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी। उनके इस वक्तव्य के बाद हमारे नए और पुराने साथियों ने बिना तथ्यों को जाने, मंच पर उस समय जो लोग उपस्थित थे, खास तौर पर रमाशंकर सिंह और मुझ पर हमला बोल दिया। । दूसरों पर फब्तियां कसना बड़ा आसान होता है परंतु रचनात्मक रूप से अपने द्वारा किए गए कार्यों पर या यह कहूं अपने गिरेबान में झांकना भी जरूरी होता है।आईटीएम विश्वविद्यालय निजी विश्वविद्यालय है। टेक्नोलॉजी, साइंस पैरामेडिकल साइंस, एग्रीकल्चर साइंस, जैसे विषयों का शिक्षण करता है। परंतु रमाशंकर सिंह ने सोशलिस्ट इतिहास उसके महापुरुषों के कार्यों को याद करने का हर प्रकार की दुश्वारियां खतरों को मोल
लेकर कार्य कर रहे हैं। 8 बरसों से राममनोहर लोहिया स्मृति व्याख्यान, परिसर में डॉ राममनोहर लोहिया सभागार, मधुलिमए हॉल जैसे नामकरण से विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को अवगत कराने का कार्य किया है । समाजवादी समागम जैसे फ्रंट पर सक्रिय रूप से अपनी भागीदारी निभाना, जिसमें आर्थिक तथा शारीरिक सहभागिता में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना। सोशलिस्टो की बैठको मे शारीरिक और आर्थिक मदद पहुंचाना वे करते रहे हैं।
जहां तक मेरी जानकारी है उन्होंने अब तक लगभग 27 पुस्तकों को प्रकाशित किया है ।
1डॉ रामनोहर लोहिया कुछ चुने हुए भाषण, वह लेख
2डॉ राममनोहर लोहिया रचनाकारों की नजर में( खंड 1)
3 गांधी, मार्क्स एवं समाजवाद (विचार- सिद्धांत -नीति वक्तव्य) 4समाजवादी विचार -संकल्प बदलाव का।
5 फ्रेगमेंट ऑफ ए वर्ल्ड माइंड।
6 स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा,
7 नागरिक स्वाधीनता
8 डॉक्टर लोहिया के खत रमा मित्रा को।
9 गोवा मुक्ति संघर्ष
10 लाहौर किला जेल से गोवा की अगवार्ड जेल तक,
11 गोवा लिबरेशन मूवमेंट ,एंड मधु लिमए।
12 गोवा मे क्रांति,
13 विवेकानंद- धर्म में मनुष्य या मनुष्य में धर्म
14 सरदार पटेल -सुव्यवस्थित
राज्य के प्रणेता ,
15 विवेकानंद की दुनिया ,
16 गांधीवाद और समाजवाद -भारत में समाजवाद
17 मार्क्सवाद और समाजवाद 18राम कृष्ण और शिव, नदिया साफ करो
19 द्रौपदी या सावित्री जाति और योनि के दो कटघरे, योनि सुचिता और नर- नारी संबंध,
20 सात क्रांतियां
21 हिंदू बनाम हिंदू- हिंदू और मुसलमान,
22 राष्ट्रीय एकता का आधार,
23 डॉ राममनोहर लोहिया- रचनाकारों की नजर में( खंड 2)
आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर, डॉ राममनोहर लोहिया 8वा व्याख्यानमाला मे जम्मू कशमीर के उपराज्यपाल माननीय मनोज सिन्हा द्वारा दिए गए भाषण के संदर्भ में। (1) शैक्षणिक संस्थाओं में समय-समय पर विभिन्न विषयों पर विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों, विशेषज्ञो सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, प्रतिष्ठित व्यक्तियों को अलग-अलग विषयों पर कभी एकल तथा सामूहिक रूप से आमंत्रित करके उनके उद्बोधन, भाषणों, सहभागिता से सम-सामयिक संदर्भो पर उनके विचारों, आंकलन निष्कर्षों से अवगत कराना विश्वविद्यालय की एक शैक्षणिक नियमित गतिविधि होती है। (2)विश्वविद्यालय क्योंकि किसी एक विचारधारा, दल या समूह तक सीमित या बाधित नहीं होता, इसलिए विभिन्न विचारधाराओं, विश्वासों, आस्थाओं, निष्कर्षों में विश्वास रखने वाले विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों, विषय विशेषज्ञों को आमंत्रित करता रहता है।
( 3) उद्बोधन में वक्ता के विचार, निष्कर्ष उनके निजी हैं। श्रोता उसे स्वीकार करता है अथवा अस्वीकार यह उसका अधिकार है। विश्वविद्यालय की भूमिका मात्र पर्यवेक्षक की होती है।
( 4) विश्व विद्यालय और अन्य सार्वजनिक आयोजनों में एक अंतर स्पष्ट होता है। अन्य स्थानों पर श्रोता वक्ताओं के किसी वक्तव्य सेअसहमत होकर तत्काल अपनी असहमति, विरोध, नारेबाजी, बहिष्कार करते देखा जाता है, परंतु शैक्षणिक संस्थाओं में वक्ता की बातों से पूर्णत असहमति होने के बावजूद तत्काल आमंत्रित वक्ता का प्रतिकार, विरोध, शैक्षणिक सिद्धांतों, नियमों, परंपराओं के विरुद्ध माना जाता है। (5) विश्वविद्यालय में समय-समय पर विभिन्न विचारधाराओं, विषयों मान्यताओं में विश्वास रखने वाले विशेषज्ञों अनुभवी विद्वानों को समय-समय पर आमंत्रित किया जाता रहा जाता है। जिसमें गांधीवादी, निर्दलीय, कांग्रेसी, कम्युनिस्ट सोशलिस्ट, भाजपा, के सिद्धांतों, विचारधाराओं के प्रवक्ताओं को शामिल किया गया है। विश्वविद्यालय में एक अति महत्वपूर्ण विषय ‘गांधियन सोशलिस्ट स्टडी पर एक कोर्स शुरू किया है, जिसमें साइंस के विद्यार्थियों ने काफी रुचि ली है।
विश्वविद्यालय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रति पूर्णता आस्थावान तथा उनको भारत का एक महान सपूत मानता है।