अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*स्त्री-पुरुष विमर्श के पार : मनुष्यता की ओर एक विमर्श*

Share

-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          यहां एक अत्यंत जटिल, संवेदनशील और विचारोत्तेजक विषय पर विस्तृत सामग्री साझा की गई है, जिसमें पुरुष और स्त्री के रिश्तों, सामाजिक संरचनाओं, लैंगिक असमानताओं और कानूनी व्यवस्थाओं के दुरुपयोग जैसे कई पहलुओं को प्रस्तुत किया गया है। इस पूरे पाठ को एक साहित्यिक, संतुलित और परिष्कृत शैली में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है ताकि न केवल विषय की गंभीरता बनी रहे, बल्कि यह भी सुनिश्चित हो सके कि किसी पक्ष का अनावश्यक महिमामंडन या दमन न हो। नीचे मैं इस मसले को एक संयमित, संवेदनशील और भाषा-सौंदर्य से युक्त रूप में परिष्कृत किया गया है। यह रूपांतर मूल विचारों को सम्मानपूर्वक प्रस्तुत करते हुए उसे अधिक पठनीय, सुसंगत और वैचारिक बनाता है:

स्त्री का रहस्य और पुरुष की पीड़ा: एक विचारशील संवाद:

          प्रेम की पराकाष्ठा शायद वहीं होती है जहाँ शर्तें समाप्त हो जाती हैं। ऐसा प्रेम केवल एक मां और उसके नवजात शिशु के बीच संभव है—जहाँ न अपेक्षा है, न आग्रह, न अधिकार, बस एक निरंतर प्रवाह, एक पूर्ण समर्पण। पुरुष, जीवन भर स्त्री के साथ रहता है—उसी से जन्म लेता है, उसी से प्रेम करता है, उसी के साथ जीवन बिताता है। फिर भी, स्त्री उसके लिए अबूझ बनी रहती है। वह उसे एक रहस्य मानता है—कभी घाटी का रहस्य, कभी अंधकार की गहराई, कभी निषेध का सौंदर्य। स्त्री, प्रेम में भी आक्रामक नहीं होती। वह प्रतीक्षा करती है। उसे जीतने नहीं, उसे अपनाने का अवसर देती है। इसलिए पुरुष कभी स्त्री पर यह आरोप नहीं लगा सकता कि “तुमने मुझे प्रेम में बाँध लिया।” प्रेम स्त्री का आक्रमण नहीं, उसका समर्पण है। लेकिन यही स्त्री जब अपने पूर्ण रूप में विकसित होने लगे, तो पुरुष समाज घबरा उठता है। क्योंकि वह जानता है—अगर स्त्री पर अत्याचार न किए जाएं, अगर उसे स्वतंत्रता और समान अवसर मिले, तो वह पुरुषों से अधिक शक्तिशाली सिद्ध हो सकती है। यही भय, यही असुरक्षा, सदियों से स्त्री के पैरों में लोहे की बेड़ियाँ डालती रही है।

          यह बेड़ियाँ सिर्फ़ प्रतीकात्मक नहीं हैं—कभी चीन में स्त्रियों के पैरों को छोटा रखने के लिए लोहे के जूते पहनाए जाते थे, ताकि वे दौड़ न सकें, न भाग सकें। उनका चलना भी पुरुष पर निर्भर हो जाए। और फिर पुरुष उसे ‘नाज़ुकता’ का नाम देकर महिमामंडित करता है—क्योंकि ‘नाज़ुक’ को नियंत्रित करना आसान होता है। प्रकृति ने स्त्री को सृजन की शक्ति दी है। गर्भधारण करना, प्रसव करना—ये क्रियाएं केवल वही कर सकती है जो भीतर से बेहद मजबूत हो। लाओ त्सु ने कहा है—”स्त्री घाटी की आत्मा है, जो कभी थकती नहीं, कभी मरती नहीं।”

स्त्री बिना आक्रामक हुए भी अपने प्रेम से जीवन को जीत लेती है। वह न करके करने की कला जानती है। यही कला हमें ईश्वर तक पहुंचा सकती है—क्योंकि सत्य और ईश्वर को कभी आक्रमण से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

          लेकिन आज की स्त्री कहाँ है? आधुनिकता की दौड़ में हम एक ऐसी स्त्री गढ़ चुके हैं जो मूलतः पुरुष-प्रेरित, पुरुष-निर्मित ‘गुड़िया’ है। उसका स्वाभाविक स्त्रीत्व, उसकी मौलिकता, कहीं खो चुकी है। समाज में स्त्री की छवि अब या तो आदर्श बहू की  है या फिर “खतरनाक स्त्री की”—बीच का स्पेस मिटा दिया गया है।

अब बात पुरुष की—जिसे अक्सर पीड़ित माना ही नहीं जाता:

          समाज की रूढ़ मानसिकता ने एक भ्रम गढ़ा है—कि केवल पुरुष ही स्त्री पर अत्याचार करता है। लेकिन क्या पुरुष हमेशा उत्पीड़क होता है? दिल्ली के जंतर-मंतर पर पुरुषों ने जब ‘पुरुष आयोग’ की मांग की, तो उनके स्वर चुप्पी के खिलाफ़ विद्रोह बन गए। वहाँ आए पुरुषों की आवाज़ में करुणा थी, क्रोध था, और एक सवाल—”क्या पुरुष को पीड़ा नहीं होती?”

·        एक बुज़ुर्ग कर्मचारी ने कहा—“एक महिला ने मुझ पर झूठा उत्पीड़न का आरोप लगाया और मेरी पेंशन अटक गई।”

·        एक युवा ने बताया—“मेरे भाई ने आत्महत्या कर ली, और उसकी पत्नी ने हमारे परिवार पर झूठा दहेज और घरेलू हिंसा का केस कर दिया।”

·        किसी ने कहा—“मेरे खिलाफ़ 12 केस कर दिए गए, सिर्फ़ पैसे वसूलने के लिए।”

·        एक व्यक्ति बोला—“मैं अपनी बेटी को नहला रहा था, पुलिस ने मुझ पर घिनौने आरोप लगाए।”

·        किसी की रीढ़ की हड्डी टूट गई, किसी ने वकीलों को लाखों रुपये दिए और अब कर्ज़ में डूब गया।

          इनमें से कोई भी यह नहीं कहता कि महिलाओं को अधिकार न दिए जाएं। वे बस यह कहते हैं—”हमें भी न्याय चाहिए।” सवाल यह नहीं है कि कौन अधिक पीड़ित है—पुरुष या स्त्री। सवाल यह है कि क्या हम लैंगिक आधार पर अन्याय को नजरअंदाज़ कर सकते हैं? भारत में आत्महत्या करने वाले पुरुषों की संख्या कहीं अधिक है। NCRB के आंकड़े बताते हैं कि सालाना 1.2 लाख से अधिक पुरुष आत्महत्या करते हैं, जिनमें 80,000 विवाहित होते हैं। बावजूद इसके, पुरुषों के लिए अलग आयोग तक नहीं है।

स्त्रीवाद जब एकतरफा हो जाए, तो वह न्याय नहीं, वर्चस्व बन जाता है:

          स्त्रियों को समानता मिले—यह ज़रूरी है। लेकिन पुरुषों को भी संवेदनशील नागरिक के रूप में देखा जाए—यह उससे कम ज़रूरी नहीं। कानूनों की ज़रूरत है, परंतु उनके दुरुपयोग की गुंजाइश भी नहीं होनी चाहिए।

दोनों की पीड़ा सत्य है, और दोनों का सम्मान आवश्यक:

          जिस प्रकार स्त्री के साथ सदियों centuries से अन्याय होता रहा है, उसी प्रकार अब पुरुषों की भी कुछ श्रेणियाँ ऐसी हैं जो बिना दोष के अपराधी घोषित की जा रही हैं। ज़रूरत है—न्याय व्यवस्था में संतुलन की। नारी सम्मान तभी सच्चा होगा जब न्याय ‘नारी’ और ‘पुरुष’ दोनों के लिए समान हो। वर्ना यह संघर्ष कभी समाप्त नहीं होगा—नारी अपने लिए न्याय मांगेगी, और पुरुष अपने लिए मंच।

          अब प्रस्तुत है– एक संतुलित, विचारोत्तेजक और सूक्ष्मता से सज्जित लेख, जिसमें स्त्री‑पुरुष संबंध, प्रेम, शक्ति और न्याय की कहानी एक सुसंगत कथा के रूप में चलती है।

रहस्य, शक्ति और न्याय – स्त्रीपुरुष के संवाद:

1. प्रेम की प्रारंभिक अवस्थाएँ:

          प्रेम की सबसे स्वाभाविक अवस्था वह है जहाँ कोई शर्तें नहीं होतीं—उसी शुद्ध प्रेम से एक माँ अपने शिशु से बँधती है। वहाँ न अपेक्षा है, न स्वार्थ, न नियंत्रण—केवल एक निरंतर समर्थन और पूर्ण समर्पण।

2. रहस्यमयी स्त्रीत्व:

          पुरुष जीवन भर स्त्री‑के साथ जुड़ा रहता है—उनके साथ रहता है, प्रेम करता है, और उससे सब कुछ सीखता है। फिर भी स्त्री उसके लिए एक रहस्य बनी रहती है। इससे उपजता है आकर्षण और कहीं‑न‑कहीं भय भ– “उसके भीतर क्या है?”, “उसका रहस्य क्या है?” पुरुष उसकी प्रतीक्षा करता है–उसकी दी हुई चुप्पी, उसका सौम्य शक्ति‑प्रदर्शन है।

3. शक्ति का अवमापन और नियंत्रण:

          जब स्त्री का स्वतंत्र विकास बाहर आता है, समाज असहज हो उठता है। “स्त्री शक्तिशाली तो न रहे”—इस भय की वजह से उसे दशकों तक सशर्त सीमाओं में बांधा गया है। कभी यह स्पष्ट व्यवहार था, जैसे चीन में कुचल‑पैर की प्रथा, तो कहीं यह प्रतीकों से होता है—नाज़ुकता, कोमलता जैसी संज्ञाएँ स्त्री पर थोप दी गयीं ताकि वह नियंत्रित रहे।

इससे स्पष्ट हुआ—संवेदनशीलता को स्त्रीत्व समझ लिया गया और उसे नियंत्रण का हथियार बना लिया गया।

4. प्रकृति की शक्ति: जन्मदेने की कला:

          प्रकृति ने स्त्री को जन्म देने की शक्ति दी है—एक अनोखी शक्ति जिसमें गहराई, सहनशीलता और रचनात्मकता है। यही वह शक्ति है जिसे लाओ त्सु ‘गहराई’, ‘घाटी की आत्मा’ कहते हैं—एक ऐसी आत्मा जो कभी थकती नहीं, कभी टूटती नहीं। और इस आत्मा को समझने वाले को सच्चे अर्थ में जीवन का परम सत्य मिलता है।

5. आधुनिक ‘गुड़िया’स्त्री का युग:

          आज की स्त्री का अधिकांश चित्रण एक आदर्श, पाक छवि में हो गया है—जो पुरुष की सुविधा के अनुरूप हो। उसका असली स्वरुप, उसकी गहराई कहीं खो गई। वह “एक बनी‑बनाई गुड़िया” बनकर रह गयी है—जिसे पुरुषों ने ही रचा है। इस क्रांतिकारी स्त्रीत्व का अस्तित्व कहीं छुप गया है।

6. पुरुष की पीड़ा और अनदेखी:

          दूसरी ओर पुरुष की पीड़ा सामने आती है—जब वह यह कहता है—

·        “मेरे भाई ने आत्महत्या कर ली क्योंकि उसके ऊपर झूठे केस लगे।”

·        “मैं पिता हूँ, लेकिन मुझे अपनी बेटी को नहलाने पर बदनाम किया गया।”

·        “मेरी पेंशन अटक गई क्योंकि एक महिला ने झूठा आरोप लगाया।”

          सिर्फ महिला को न्याय मिलना ही न्याय नहीं है—जब पुरुष कहे कि उसे भी न्याय चाहिए। समाज, कानून और मीडिया इस पीड़ा को अक्सर अनदेखा कर देते हैं, या मज़ाक़ बनाकर खारिज कर देते हैं। पर क्या यह उचित है? क्या संवेदनशीलता और पीड़ा केवल किसी एक लिंग तक सीमित हो सकती है?

7. सभी के लिए न्याय: एक न्याय­संगत दृष्टिकोण:

          न्याय तभी न्याय कहलाएगा—जब वह सबके लिए समान रूप से लागू हो। लैंगिक आधार पर पीड़ित को नज़रअंदाज़ करना या किसी को वरीयता देना ही असंतुलन है और अंततः संघर्ष की जड़ बनता है।

·        स्त्री को उसकी स्वतंत्रता, सम्मान और क्षमता का अधिकार है।

·        पुरुष को भी संवेदनशील, जिम्मेदार, और पीड़ित मानने की आवश्यकता है।

8. निष्कर्ष: संवेदनशील समाज की ओर:

          स्त्री‑पुरुष संघर्ष का हल कोई लड़ाई या वर्चस्व नहीं—बल्कि वह बराबरी, समझ और सहयोग है। इसका मूल आधार है विश्वास, स्त्री में आत्मा का गहरापन, पुरुष में संवेदनशीलता का अधिकार। इस परंपरागत ढाँचे में झरोखों को खोला जाए—न तो कोई सशर्त सीमाएं हों, न कोई समूह विशेष की आवाज़ दबे। केवल तभी हम एक ऐसे समाज के निर्माता होंगे जहाँ माँ समान है, बेटा समान है, बेटी समान है, पति समान है और पत्नी समान है।

          सारांश –यह लेख इस बात की वकालत करता है कि सच्चा न्याय तब ही संभव है जब हम लैंगिक दृष्टियों से मुक्त होकर, हर मनुष्य की पीड़ा को समझें। स्त्री की कोमलता उसकी शक्ति है, पुरुष की संवेदनशीलता उसकी स्थिरता। और न्याय की मशाल तब तक नहीं ठहरेगी जब तक हम इन दोनों को समान रूप से नहीं मानते। यहाँ नीचे अब स्त्री-पुरुष के बीच के रहस्य पर कुछ विचार दिये जा रहे हैं

स्त्री-पुरुष के बीच के रहस्य:

          संसार की सबसे पुरानी जुगलबंदी है—स्त्री और पुरुष। एक जनम देती है, एक नाम देता है। एक पालती है, एक पालक कहलाता है। एक कोमल है, इसलिए शोषित है। दूसरा कठोर है, इसलिए खलनायक है। लेकिन जैसे-जैसे सभ्यता की कहानी आगे बढ़ी, ‘देवी’ की मूर्ति गढ़ते-गढ़ते हम ‘डायन’ का मुकदमा भी साथ-साथ तैयार करने लगे।

और बीच में बेचारा पुरुष…? अरे, वो तो अब “पुरुष” कहे जाने से भी डरता है। क्योंकि ज़माना बदल गया है, और गालियाँ अब लिंग निर्धारण से जुड़ गई हैं।

1. माँ: दुनिया का पहला फ्रीलांसर:

          माँ – यानी वो स्त्री जिसे न तनख्वाह चाहिए, न रविवार। सदियों से वो फुल-टाइम वर्कर है, पर उसका ‘सीवी’ अब भी खाली है। उसे प्यार देना आता है, गालियाँ सहना आता है, और एक ही समय में “तू मेरी जान है!” और “तेरे कारण ही मैं कुछ न कर पाया!” दोनों ही बाते सुनने को मिलती हैं। जो माँ अपने बेटे के लिए दिन-रात खप जाती है, वही सास बनते ही ‘किचन की तानाशाह’ घोषित कर दी जाती है। और ससुराल की बेटी, जिसने पाँच दिन में पति की पैंट अलग फोल्ड की, वो ‘नारीवादी क्रांति’ की अग्रदूत कहलाती है।

2. स्त्री: देवी जब तक चुप रहती ?

          जैसे ही स्त्री बोलती है, पुरुषों की कनपटियाँ बजने लगती हैं। “ये तो बहुत बोलती है!”- मतलब जब चुप थी, तो “बहुत समझदार थी”। अब जब सवाल पूछने लगी, तो “बहुत उग्र हो गई है।” दफ्तरों में ‘क्वालिफाइड’ औरतें रखी जाती हैं, लेकिन मन में डर यही रहता है—”कहीं #MeToo न हो जाए!” (इसका आशय यह होता है कि कोई व्यक्ति या संस्था यह डर या संकोच जता रही है कि कहीं उनके किसी कार्य, व्यवहार या कथन को महिला उत्पीड़न, यौन शोषण या अनुचित आचरण के रूप में उजागर न कर दिया जाए।) हर कॉन्फ्रेंस में पुरुष स्पीकर अब दो बार सोचते हैं – “कह दूँ कि वो अच्छा बोल रही है?” या फिर HR बुला लेगी…। इधर घर में पति झाडू लगा दे, तो “आदर्श पति”। पर पत्नी ऑफिस से देर से आए, तो “घर तो संभलता नहीं, ऑफिस क्या करेगी?”

3. पुरुष: अब बेचारा है, मगर बताना नहीं है:

          आज का पुरुष रात 11 बजे तक काम करके घर आता है, फिर इंस्टाग्राम पर पत्नी की मुस्कराती तस्वीर पोस्ट करता है— “Behind every successful man is his wife!”

(और पीछे पीछे बिजली का बिल, लोन का ईएमआई और पेट्रोल का रेट भी…) अब पुरुष भी रोता है, लेकिन बाथरूम में।  क्योंकि समाज कहता है—“मर्द को दर्द नहीं होता।” तो मर्द अब कोर्ट कचहरी में होता है— जहाँ उसकी शिकायत का मतलब है कि वो “असली मर्द नहीं रहा!”

4. न्याय: जब लिंग से पहले पीड़ा देखी जाए:

          हमारे संविधान में लिखा है—”सभी नागरिक बराबर हैं”, लेकिन गली-मुहल्ले में लिखा है—“स्त्री पीड़िता होती है, और पुरुष संदिग्ध।” मसलन, पति की ग़लती हो तो पुरुष अपराधी, पत्नी की ग़लती हो तो “कहीं कुछ वजह रही होगी।” कानून की आंखों पर पट्टी है—पर कान खुले हैं, और अक्सर कान सिर्फ एक तरफ की कहानी सुनते हैं।

5. पौराणिक उदाहरण: द्रौपदी बनाम राम:

          द्रौपदी पांच पतियों के साथ भी सम्मानित थी, राम एक पत्नी के होते हुए भी “पतिव्रत धर्म” की परीक्षा में फेल करार दिए जाते हैं। सीता अग्निपरीक्षा में गईं, पर राम का खुद के मन की परीक्षा में जाना नहीं गिना गया। क्यों? क्योंकि पुराना समाज ‘राम’ से ज़्यादा ‘सीता’ से उम्मीद रखता था, और आज का समाज ‘सीता’ से ज़्यादा ‘न्यूज़ चैनल’ से।

6. मीडिया का न्याय: हेडलाइन से पहले सुनवाई:

          यदि एक महिला आरोप लगाए तो ब्रेकिंग न्यूज़ – “बॉस निकला दरिंदा!” यदि मामला झूठा निकले – “समझौता हो गया…” (और समझौता कहाँ हुआ, वो सिर्फ टीआरपी की कॉफी टेबल पर पता चलता है) पुरुष का करियर तो गया, पर लड़की की छवि अब ‘बहादुर महिला’ बन चुकी है। और समाज का न्याय इतना व्यस्त है कि वो फिर किसी अगली ‘हैशटैग’ के इंतज़ार में रहता है।

7. निष्कर्ष: न तो देवी, न ही दानव — बस इंसान:

          नारी को ‘देवी’ कहो तो pedestal पर चढ़ा देते हो, फिर वो pedestal से नीचे उतरे, तो ‘स्वार्थी’, ‘नास्तिक’, ‘संस्कृति-विरोधी’ हो जाती है। और पुरुष को ‘मर्द’ कहो तो उससे आंसू, नमी और डर छीन लेते हो। सवाल यह नहीं है कि स्त्री को क्या चाहिए या पुरुष को क्या चाहिए। सवाल यह है कि क्या हम इंसानों को इंसान मान पा रहे हैं?

          अंत में एक सुझाव: अगर अगली बार कोई स्त्री गुस्से में हो तो पूछिए, “क्या हुआ?” और अगर कोई पुरुष चुप बैठा हो तो कहिए, “तुम भी रो सकते हो।” क्योंकि इंसान को इंसान समझने का वक्त आ गया है, वरना “देवी” और “दानव” दोनों ही न्याय के दरवाजे पर रोते रहेंगे, और “पंच” ट्रोल बनकर इंस्टाग्राम पर रील बना देगा।

उलझनों में स्त्री-पुरुष विमर्श :

          संसार की सबसे पुरानी जुगलबंदी है—स्त्री और पुरुष। एक जनम देती है, एक नाम देता है। एक पालती है, एक पालक कहलाता है। एक कोमल है, इसलिए शोषित है। दूसरा कठोर है, इसलिए खलनायक है। लेकिन जैसे-जैसे सभ्यता की कहानी आगे बढ़ी, ‘देवी’ की मूर्ति गढ़ते-गढ़ते हम ‘डायन’ का मुकदमा भी साथ-साथ तैयार करने लगे। और बीच में बेचारा पुरुष…? अरे, वो तो अब “पुरुष” कहे जाने से भी डरता है। क्योंकि ज़माना बदल गया है, और गालियाँ अब लिंग निर्धारण से जुड़ गई हैं।

इस लेख  को पढ़ने से पहले, एक बात समझ लीजिए– यहाँ न तो  इस लेख में ‘नारी-विरोधी’  और न ही कोई ‘पुरुष-विरोधी’ आग्रह है, यहाँ सब ‘मानव-पक्षधर’ हैं — लेकिन अफ़सोस, आज के समाज में यही सबसे संदिग्ध पद है।

·        जब कोई स्त्री “मेरे साथ अन्याय हुआ है” कहती है, तो एक वर्ग तालियाँ बजाता है—“बहादुर नारी!”

·        दूसरा वर्ग कहता है—“अब तो मर्द का जीना हराम है!”, और

·        एक तीसरा वर्ग है—जो सिर्फ पढ़ना चाहता है, समझना चाहता है, और शायद धीरे से मुस्करा कर कहता है, “तो आखिर दोष किसका था? सिस्टम का या सोच का?”

          इस लेख  का आरंभ एक ऐसे प्रश्न से  है जिसका कोई आसान उत्तर नहीं है— कि क्या हम वाकई स्त्रियों को ‘देवी’ मानते हैं? या सिर्फ तब तक, जब तक वो हमारी उम्मीदों के खांचे में फिट बैठती हैं? और क्या पुरुष वाकई ‘शोषक’ हैं, या वे भी पितृसत्ता की कठपुतलियाँ बनकर नपुंसक बना दिए गए हैं?

तस्वीर में सच के रंग कौन भरता है?

·        इस लेख  में ऐसी स्त्री पात्र हैं जो बोलती हैं, तो समाज उन्हें “बदतमीज़”, “ज़बानदराज़”, “आधुनिक”, “फेमिनिस्ट” कहता है— और यदि पुरुष पात्र हैं, जो चुप रहते हैं या उन पुरुषों को “कमज़ोर”, “नामर्द”, “भावुक” कहकर खारिज किया जाता है।

·        आपने आम तौर पर अधिकतर किस्से-कहानियों में  ‘माँ’  को ही पाएँगे, जो पूरी ज़िंदगी निःशुल्क सेवा देती है, और अंत में उसी बहू से ताना सुनती है जिसे वो बेटी मान बैठी है।

·        आप उस पिता को भी किस्से-कहानियों में पाएँगे जो नौकरी और ईएमआई में उलझा रह गया, और अब बेटा कहता है—“आपने मेरे लिए किया ही क्या है?!”

व्यंग्य की आँच में पकते रिश्ते:

·        इस लेख  में, जो आप अभी तक पढ़ रहे हैं, कुछ वाक्य तीखे हैं। कुछ कड़वे भी लग सकते हैं। पर यक़ीन मानिए, यह तीखापन टमाटर की नहीं, सच की चटनी से आया है।

·        यह समाज अब ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ स्त्री को ‘सशक्तिकरण’ चाहिए और पुरुष को ‘संदेह से मुक्ति’। लेकिन दोनों ही दरबार में पेश हैं— जहाँ न्याय नहीं, ‘नैरेटिव’ (दृष्टिकोण) सुनवाई करते हैं।

यह लेख  क्या है?

·        यह लेख  एक आग्रह है कि स्त्री-पुरुष विमर्श को ‘वॉर ज़ोन’ न बनाया जाए। यह आग्रह है कि हम ‘देवी’ और ‘दानव’ की जगह ‘मनुष्य’ देखें, उसकी थकान, उसकी हँसी, उसकी भूख और उसकी चोटें भी।

·        यह उन संकेतों का समूह है जो आपको कभी मुस्कराने पर मजबूर करेंगे, कभी पीड़ा में झुका देंगे, और कभी आईने के सामने खड़ा कर देंगे।

अंत में एक स्वीकृति-पत्र:

इस लेखक ने स्वयं भी कई बार ग़लतियाँ की होंगी—

·        कभी अपनी बहन की चुप्पी को ‘शालीनता’ समझा,

·        कभी अपने बेटे के आँसुओं को ‘कमज़ोरी’ कहा।

          लेकिन अब वह सीख रहा है, जैसे आप भी सीखेंगे, इस लेख  के पन्नों से। तो आइए, इन पन्नों पर चलते हैं…जहाँ स्त्री भी है, पुरुष भी है—और दोनों के बीच एक पुल—हास्य, संवेदना और प्रश्नों से बना हुआ। नीचे मैं उसी भावना, शैली और विषयवस्तु को समापन अध्याय के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ — जो पूरे लेख  की प्रस्तुति, अनुभवों, कथ्य और प्रश्नों को समेटते हुए एक सार्थक विदाई देता है और साथ ही पाठकों को सोच की यात्रा पर आगे ले जाने का निमंत्रण भी देता है–

स्त्री-पुरुष विमर्श के पार, मनुष्यता की ओर एक विमर्श :

·        आपने यह लेख  पढ़ा…शायद कहीं मुस्कराए होंगे, कहीं तिलमिलाए होंगे, कभी आँखें डबडबाई होंगी, और कभी ज़ोर से ठहाका भी मारा होगा। तो एक बात तो तय है— आप पढ़ने नहीं, सहभागी बनने आए थे। और यही इस लेख की सबसे बड़ी जीत है। अब जब सब पढ़ चुके, तो सुनिए कुछ अघोषित बातें… इस लेख  में वो स्त्रियाँ थीं जो प्रेम में टूटीं, सेवा में घिसीं और अंत में कह उठीं, “अब और नहीं।”

 ·        और पुरुष भी थे— जो सदा ‘कमाऊ मशीन’ बने रहे, और कभी कुछ भी कह नहीं पाए –“मुझे भी दर्द होता है।”

          ·        कुछ माँएँ थीं जो ‘तू तो मेरी बेटी जैसी है’ कहती रहीं, और कुछ बहुएँ थीं, जो कभी बेटी बन ही नहीं सकीं।

          ·        कुछ बेटियाँ थीं, जिन्हें ‘इज्ज़त’ के बोझ में ख़ुद को साबित करना पड़ा, और

·        कुछ बेटे थे, जो ‘मर्द’ बनने की दौड़ में आदमी होना भूल गए।

इस लेख में  क्या है?

·        एक व्यंग्य? एक विलाप? या दोनों का मेल? इस लेख में व्यंग्य किया गया—क्योंकि कभी-कभी हँसी ही सबसे गहरी चीख होती है।

·        हमने दर्द कहा—क्योंकि केवल आँसू ही नहीं, शब्द भी अश्रु-वर्षा कर सकते हैं।

·        ऐसे पात्र गढ़े—जो शायद आपके पड़ोस में रहते हैं, या फिर आपके भीतर ही कहीं घुसे बैठे हैं।

तो क्या हुआ इस पूरी यात्रा में?

·        कुछ ‘देवी’ देवी कहलाने से ऊब गईं ।

·        कुछ ‘डायन’ थक गईं बार-बार जलाई जाने से और

·        कुछ पुरुष, जो हमेशा ‘बाहुबली’ बने रहे, उन्होंने पहली बार कहा—“मैं डरता हूँ…”

इस लेख के खत्म होते-होते, शायद आप यह समझ गए होंगे—

·        नारीवाद सिर्फ औरतों का मुद्दा नहीं, और

·        पितृसत्ता सिर्फ पुरुषों का हथियार नहीं।

·        ये एक संरचना है, जिसमें सब घायल हैं—बस ज़ख्म अलग-अलग दिखते हैं।

आखिर अब क्या किया जाए?

·        इस लेख  का उद्देश्य ‘निर्णय’ देना नहीं रहा है, बल्कि सोचने को महत्व देना है।

·        यह प्रस्ताव नहीं, प्रतिबिंब था।

·        यह निष्कर्ष नहीं, संभावना थी।

          तो यदि आपने यह लेख पढ़कर किसी एक स्त्री से आँख मिलाने की हिम्मत पाई हो, या किसी पुरुष की चुप्पी सुनने की क्षमता विकसित की हो तो इस लेख को सफल माना जाना चाहिए।

और अंत में…

·        जब अगली बार कोई स्त्री मुस्कराए, तो पूछिए, क्यों?

·        कहीं उसे हँसने के लिए मजबूर तो नहीं किया गया?

·        जब अगली बार कोई पुरुष खामोश हो, तो पूछिए, क्यों?

·        कहीं उसे बोलने की इजाज़त मिली ही नहीं?

·        जब अगली बार कोई बच्चा बड़ा हो रहा हो, तो सोचिए कि आप उसे ‘इंसान’ बना रहे हैं, या ‘लड़का-लड़की’ नाम की पिंजरे में डाल रहे हैं?

**तो चलिए, अब इस लेख को बंद करें —पर अपने भीतर की आँखें खोलिए। क्योंकि कोई भी कहानी कभी भी ख़त्म नहीं होती —अभी तो मनुष्यता की शुरुआत होनी है।

आखिर मैंने यह लेख क्यों लिखा?

(एक व्यक्तिगत आग्रह — आभार, आत्मस्वीकार और भविष्य की ओर एक मौन आमंत्रण)

·        क्योंकि मैं भी देवी-डायन के बीच पिसती औरतों को रोज़ देखता हूँ, जो घर की रोटियों में सहनशीलता बेलती हैं, और जब कभी चीख़ती हैं, तो लोग कहते हैं — “कुछ ज़्यादा ही बोलने लगी है…”

·        मैंने यह लेख  इसलिए भी लिखा क्योंकि मैंने ऐसे पुरुषों को भी देखा है जो रात के खाने में खामोशी चबाते हैं, और दिन में “पुरुषार्थ” का अभिनय करते हैं।

·        ऐसी स्त्रियों और पुरुषों के बीच –एक बहुत अकेला मनुष्य खड़ा होता है— जो पूछना चाहता है– “क्या मैं पहले इंसान हो सकता हूँ, फिर कुछ और?”

·        इस लेख को लिखते हुए, मैंने कई बार अपनी माँ की चुप्पी सुनी,

·        बहन की थकी मुस्कराहट देखी,

·        दोस्तों की टूटी उम्मीदों को महसूस किया,

·        और कभी-कभी, अपने ही भीतर के डर को काग़ज़ पर उतारा।

·        एक छोटी-सी स्मृति मुझे याद है, एक बार बचपन में मैंने अपनी मां से पूछा था —”आप हर किसी को खाना क्यों परोसती हैं, सबसे आख़िर में खुद क्यों खाती हैं?” माँ बस हँस दी थीं, पर उनकी हँसी में जो थकावट थी, वो मेरे जीवन की पहली कविता बन गई।

·        शायद उसी दिन से मैंने ‘नारीत्व’ को समझने की कोशिश शुरू की थी —माँ के थाल से, न कि किसी किताब से।

कृतज्ञता का खंड:

·        इस लेख  में जितने भी किरदार हैं —केवल अनुभव से उपजे हैं, उनमें से कई कल्पना नहीं हैं।

·        कुछ स्त्रियाँ मेरी अपनी ज़िंदगी से आईं —जो बहनों, शिक्षिकाओं, प्रेमिकाओं, मित्रों के रूप में कभी मेरे साथ खड़ी रहीं, तो कभी मेरे अहंकार का आईना बनकर।

·        कुछ पुरुष— जिन्होंने मेरे भीतर के प्रश्नों को सहा या मुझे मौन रहने का मूल्य सिखाया/समझाया।

          मैं उन सबका आभारी हूँ  जिन्होंने यह दिखाया कि “लड़ाई लिंगों की नहीं, सोच की है।” और अंत में : यदि आप इस लेख  के साथ कहीं भीतर तक चले आए हैं, तो मेरा आपसे एक ही विनम्र अनुरोध है कि इस लेख को पढ़कर ही मत छोड़िए अपितु इसे जीकर आगे बढ़ाइए। जो कुछ भी आपने पढ़ा है, उसे किसी के लिए समझ बनने दीजिए। क्योंकि शायद अगली पीढ़ी को ‘देवी’ या ‘डायन’ नहीं, बस ‘मनुष्य’ की पहचान मिल सके।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें