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*अगस्त आंदोलन का सजीव चित्रण हुआ नाटक “आजादी के तराने में”*

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इंदौर। देश की आजादी के लिए चले संग्राम में अगस्त माह का विशेष महत्व रहा है। इसे जानने और समझने की जरूरत है। स्वाधीनता आंदोलन में वामपंथीयों की भूमिका को इरादतन गौण कर दिया जाता है।

        ये विचार व्यक्त किया आजादी के पूर्व की पीढ़ी के प्रतिनिधि 90 वर्षीय बीमा कर्मचारी संगठन के नेता सुधाकर उर्धरेश्वर ने। वे भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा ) इंदौर इकाई द्वारा नाटक आजादी के तराने के सफल मंचन पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे। स्टेट प्रेस क्लब के सहयोग से प्रदर्शित नाटक को दर्शकों का उत्साह भरा प्रतिसाद मिला। नाटक में देश की आजादी की घोषणा होते और जोहरा सहगल की भूमिका निभा रही कलाकार राशि मालवीय के नृत्य के साथ दर्शक भी  उत्साह से झूम उठे। श्री  उद्रेरेश्वर जी को स्टेट प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल, रूपांकन के अशोक दुबे एवं इप्टा की संरक्षक शैला शिन्त्रे ने स्मृति चिन्ह  भेंट कर सम्मानित किया।

            8 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में गांधी जी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे के साथ करो या मरो का आवाह्न किया था।

               संपूर्ण आज़ादी मिलने से पहले ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने देश के कई भागों में स्थानीय प्रशासन को उखाड़कर अपना स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी। इनमें महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के चिमूर में सरकारी दफ्तरों और पुलिस थाने पर कब्जा कर लिया। इस विद्रोह को “चिमूर सत्याग्रह” के रूप में पहचान मिली।

               उत्तर प्रदेश के बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में जनता ने ब्रिटिश शासन को हटा कर 19 अगस्त 1942 को बलिया को स्वतंत्र घोषित कर दिया। इस घटना को “बगावती बलिया” के रूप में ख्याति मिली।

                1942 में ही तीसरी बगावत पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के तमलुक क्षेत्र में हुई। जहां ब्रिटिश शासन को चुनौती देते हुए राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया। यह राष्ट्रीय सरकार कई महीनो तक काम करती रही।

               इन तीनों महत्वपूर्ण घटनाओं को जोड़ते हुए भारतीय जन नाट्य संघ  (इप्टा) इंदौर ने 9 अगस्त को अभिनव कला समाज सभागृह में स्टेट प्रेस क्लब के सहयोग से “आजादी के तराने”  नाम से नाट्य प्रस्तुति दी। लगभग सवा घंटे तक चले इस नाटक का प्रारंभ मखदूम मोहिउद्दीन के प्रसिद्ध गीत “ये जंग है जंग-ए-आज़ादी, आजादी के परचम के तले से हुआ। पांच भागों में बंटे इस नाटक में प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका,  मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में आयोजित सभा में जनता की बड़े पैमाने पर भागीदारी का सजीव चित्रण हुआ।

              सूत्रधार दर्शकों को गांधीजी के “अंग्रेजों भारत छोड़ो” के आह्वान को देश के उन भागों में ले गया जिन्हें वर्तमान में भुला दिया गया है।

             नाटक तेलंगाना में किसानों के विद्रोह, बंगाल के तेभागा आंदोलन, महाराष्ट्र के दहाणु, ठाणे इलाके में आदिवासियों, नौसेना के सैनिकों के विद्रोह, बंबई के कपड़ा मिलों की हड़ताल, आजाद हिंद फौज के सिपाहियों पर चले मुकदमे को समेटते हुए देश की आजादी की घोषणा पर आकर समाप्त होता है।

               नाटक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के बारे में आम जन को सतही जानकारी है। इप्टा ने इस नाटक के माध्यम से देशवासियों को स्वतंत्रता संग्राम के भूले हुए नायक-नायिकाओं को याद करने के लिए प्रेरित किया है।

          प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा 15 अगस्त 1947 को जन्मे बच्चों के नाम लिखे पत्र को आधार बनाकर रंग कर्मी जया मेहता, विनीत तिवारी ने पटकथा तैयार की। बेंगलुरु से आई निर्देशक फ्लोरा बोस एवं उनके सहायक गुलरेज खान,सारिका श्रीवास्तव ने मंच संचालन में सहयोग दिया। 

               मंच पर नाट्य प्रस्तुति एवं   एवं पर्दे के पीछे की गतिविधियों में मधु वेद, राघवेंद्र तिवारी, जयश्री भट्ट, उजान बनर्जी, कत्यूशा बेनर्जी, गबरु गोविंदा, गीतांजलि सांवरिया, गुलरेज खान, पी लक्ष्मी, प्रज्ञा सहाय, भास्कर मिश्रा, , राशि मालवीय, लक्ष्य नागर, शब्बीर बोहरा, शर्मिष्ठा घोष, शाहरुख, शुभम प्रजापति और हरनाम सिंह निर्मल जैन ने योगदान दीया।  आभार माना विनीत तिवारी ने। 

हरनाम सिंह

Ramswaroop Mantri

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