आज जब दुनिया के नक्शे पर युद्ध की लपटें दिखाई दे रही हैं, तो अचानक एक सदी पुराने इतिहास के पन्ने पलटने लगे हैं. तब, ब्रिटिश हुकूमत भारत को एक ऐसे मुल्क के तौर पर देखती थी, जिनका इन इलाकों पर प्रभुत्व हो. जेएनयू के प्रोफेसर और कूटनीतिक मामलों के जानकार हैप्पीमन जैकब ने भारत के पूर्व वायसराय लॉर्ड कर्जन के 1909 के भाषण का एक अंश शेयर किया है, जिसमें लॉर्ड कर्जन भारत का रसूख बता रहे हैं.
सन 1909 में लॉर्ड कर्जन ने ‘द प्लेस ऑफ इंडिया इन द एम्पायर’ नाम से एक भाषण दिया था. उस दौर में कर्जन ने भारत की भौगोलिक स्थिति को लेकर जो कहा, वो आज भी किसी का भी सिर चकरा देने के लिए काफी है.
कर्जन ने कहा था, पश्चिम में, भारत को फारस (ईरान) और अफगानिस्तान के भाग्य पर अपना प्रभुत्वशाली प्रभाव बनाए रखना चाहिए; उत्तर में, यह तिब्बत में किसी भी प्रतिद्वंद्वी को ‘वीटो’ कर सकता है; उत्तर-पूर्व और पूर्व में, यह चीन पर भारी दबाव डाल सकता है, और सियाम (थाईलैंड) के स्वायत्त अस्तित्व के संरक्षकों में से एक है. खुले समुद्रों पर, यह ऑस्ट्रेलिया और चीन सागर की ओर जाने वाले मार्गों को कंट्रोल करता है.
कर्जन की इस सोच का मतलब साफ था कि भारत केवल एक देश या कॉलोनी नहीं है, बल्कि यह पूरे एशिया की राजनीति का वह धुरी है, जिसके बिना दुनिया की शक्ति का संतुलन नहीं बन सकता. कर्जन का मानना था कि भारत की सरहदें सिर्फ नक्शे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका प्रभाव ईरान से लेकर चीन और ऑस्ट्रेलिया के समुद्री रास्तों तक फैला हुआ है.
कंवल सिब्बल ने खींची नई लकी
हैप्पीमोन जैकब की ओर से साझा किए गए इस ‘कोट’ पर भारत के पूर्व विदेश सचिव और कूटनीतिक दिग्गज कंवल सिब्बल ने एक बड़ी लकीर खींच दी है. सिब्बल ने कहा, कर्जन जिस ‘शक्ति’ की बात कर रहे थे, वह एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत की ताकत नहीं थी. सिब्बल ने लिखा, वह (कर्जन) स्वतंत्र भारत द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्ति की बात नहीं कर रहे हैं. वह ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति की बात कर रहे हैं, जो उनकी भारतीय कॉलोनी से संचालित होती थी.
सिब्बल का इशारा साफ है कि अंग्रेज भारत को एक ‘किले’ की तरह इस्तेमाल करते थे. उनके लिए भारत एक ऐसा लॉन्चपैड था जहां से वे रूस, चीन और फ्रांस जैसे अपने वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों को डराकर रखते थे. वह भारत की अपनी ताकत नहीं, बल्कि ब्रिटिश बंदूकों और भारतीय संसाधनों का संगम था.
निरुपमा राव ने बोलीं- आज भारत के सामने सवाल अलग
पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने लिखा,कर्जन ने एक रणनीतिक मानचित्र का वर्णन तो किया, लेकिन उन्होंने साम्राज्य की उस मानसिकता को भी उजागर किया जिससे स्वतंत्र भारत ने जानबूझकर दूरी बना ली. आज भारत के लिए असली सवाल अलग है. सवाल यह नहीं है कि वह अपने पड़ोस पर वर्चस्व कैसे स्थापित करे, बल्कि यह है कि खाड़ी से लेकर प्रशांत महासागर तक फैले इस अशांत क्षेत्र में स्थिरता का आधार कैसे बने. इक्कीसवीं सदी में शक्ति का अर्थ ‘बफर स्टेट्स’ पर हुकूमत करना कम, और वैश्विक व्यवस्थाओं को आकार देना ज्यादा है.
इतिहास का वो दौर: जब भारत से चलता था दुनिया का ‘ग्रेट गेम’
- 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में, रूस और ब्रिटेन के बीच एशिया पर कब्जे को लेकर एक होड़ मची थी, जिसे ‘ग्रेट गेम’ कहा जाता था. लॉर्ड कर्जन उसी दौर के सबसे कट्टर खिलाड़ी थे.
- अंग्रेजों को डर था कि रूस ईरान और अफगानिस्तान के रास्ते भारत में घुस सकता है. इसलिए वे चाहते थे कि भारत का प्रभाव इतना मजबूत हो कि ईरान और अफगानिस्तान उनके हाथ की कठपुतली बने रहें.
- कर्जन ने ही 1904 में तिब्बत पर चढ़ाई करवाई थी ताकि चीन और रूस के प्रभाव को वहां से खत्म किया जा सके. वे चीन को हमेशा दबाव में रखना चाहते थे ताकि भारत की उत्तरी सीमाएं सुरक्षित रहें.
- हिंद महासागर पर ब्रिटिश नेवी का जो कब्जा था, उसका केंद्र भारत ही था. उसी के दम पर वे ऑस्ट्रेलिया तक के रास्तों को अपनी मुट्ठी में रखते थे.
आज की हकीकत और कर्जन का साया
आज जब हम 2026 में खड़े हैं और ईरान-इजरायल युद्ध के बीच फंसे हैं, तो कर्जन की बातें फिर से याद आती हैं. आज भी भारत की भौगोलिक स्थिति वही है. आज भी हिंद महासागर में भारत का वही दबदबा है. लेकिन फर्क यह है कि आज भारत किसी साम्राज्य का मोहरा नहीं, बल्कि खुद एक वैश्विक शक्ति है.






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