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अ…….”भूत”….पूर्व

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शशिकांत गुप्ते इंदौर

एक देशी फ़िल्म का यह संवाद बहुत प्रचलित हुआ है, “तारीख पे तारीख, तारीख पे तारीख।”
इसी तर्ज पर एक अनोखा संवाद सुनने और देखने को मिला है।तारीफ पे तारीफ,तारीफ पे तारीफ।तारीफ में बतौर विशेषण एक बहुत दमदार शब्द का प्रयोग हुआ है अभूतपूर्व सरलता से समझने के लिए Unprecedented
देश के प्रमुख ने सूबे के प्रमुख को “अभूतपूर्व” शब्द से नवाजा।
विश्वनाथजी की नगरी से निर्वाचित जनप्रतिनिधि ने सूबे के प्रमुख की तारीफ कर दी।इसपर भी बहुत से आलोचकों ने टिकाटिप्पणी शुरू कर दी।असल में यह तो भावविभोर होने का मुद्दा है।पहली बार देश के प्रमुख ने सूबे के प्रमुख की तारीफ की है।
उत्तरप्रदेश को सलाम है।इतना उदारमना,जमीन से जुड़ा हुआ,सक्षम,सदा सच बोलने वाला प्रधानमंत्री कभी देखा ही नहीं है।प्रधानमंत्री ने सड़क की मरम्मत से लेकर असंख्य परियोजनाओं का उद्घाटन, शिलान्यास किया और करेंगे और करतें रहेंगे।पहली बार सड़क की मरम्मत के कार्य को परियोजना कहा गया?यह भी अभूतपूर्व है।
आलोचकों ने इस अभूतपूर्व कार्य पर टिकाटिप्पणी करते हुए कहा कि, पार्षद और विधायकों के कार्य भी प्रधानमंत्री कर रहें हैं?यह आलोचना का विषय नहीं है, बल्कि प्रशंसा का विषय है।देश के यह पहले प्रधानमंत्री हैं,जिन्होंने छोटे से छोटे कार्य को भी परियोजनाओ में सम्मिलित किया है,और छोटे बड़े का भेद मिटा हुए स्वयं प्रधानमंत्री सड़क की मरम्मत को तवज्जों दे रहें हैं।
सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा तो यह है कि, प्रधानमंत्री ने कोविड़ 19 अर्थात कोरोना जैसी महामारी की दूसरी लहर के दौरान उत्तरप्रदेश में जिस तत्परता से और पूर्ण सामर्थ्य के साथ सूबे के प्रमुख ने कार्य किया वह अभूतपूर्व है।
प्रधानमंत्री के द्वारा की गई सूबे के मुखिया की तारीफ आलोचकों को रास नहीं आई।
टिकाटिप्पणी शुरू कर दी।
प्रधानमंत्री ने सूबे के पवित्र रंग के वस्त्रधारी प्रमुख की तत्परता और सामर्थ्य की तारीफ के साथ प्रमुख को “अभूतपूर्व” विशेषण से भी विभूषित किया।
अभूतपूर्व के पर्यावाची शब्द होतें हैं,निराला,अनोखा,अद्वितीय,
अपूर्व,अनूठा,अद्भुत।
आलोचकों ने अभूतपूर्व शब्द पर शब्दिक विरोध शुरू कर दिया।आलोचकों को यह स्मरण रखना चाहिए कि, प्रधानमंत्री कभी झूठ नहीं बोलतें हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा उत्तरप्रदेश में महामारी का मुकाबला सामर्थ्य के साथ किया गया,इस महत्वपूर्ण वक्तव्य का विरोध करने के लिए आलोचकों को कोई ठोस मुद्दा नहीं मिला तो विरोधियों को गंगा के घाट पर अंतिम संस्कार में प्रतिक्षा रत असंख्य शवों की कतार,नदी में तैरते मृत शरीर,और बालू रेत में दफन आत्माविहीन शरीर रामनामी चादरों ओढ़े दिखाई दिए।
आलोचक यह भूल गए कि,एक हजार पुण्य कमाने वाला ही विश्वनाथ की नगरी में प्राण त्यागता है,और उसे ही मोक्ष मिलता है।सम्भवतः संत कबीर भी विरोधी मानसिकता के संत थे,इसीलिए उन्होंने हजार पुण्य के साथ काशी में देह त्यागने से मोक्ष मिलता है, इस धारणा का विरोध करने के लिए विद्रोह स्वरूप मगहर नामक नगर में अपने प्राण त्यागे।
प्रधान जनसेवक को पंद्रह के अंक से बहुत लगाव है। इसीलिए अपने निर्वाचन क्षेत्र में पंद्रह सौ करोड़ रुपयों की योजनाओं की शुरुआत की।विरोधी पंद्रह के अंक को सीधे लाखों से जोडकर जुमला शब्द रटने लगतें हैं।
मृत शरीर को बालू में दफन करने को लेकर विरोधाभास पैदा हुआ।प्रदेश के एक अखबार ने यह स्पष्टीकरण देतें हुए उक्त विरोधाभास को समाप्त किया कि, हिन्दू धर्म में भी शवों को दफन करने का प्रावधान है। अखबार को उक्त स्पष्टीकरण के बदले पारितोषिक के रूप में आठ करोड़ के शासकीय विज्ञापन
प्राप्त हुए हैं। ऐसा विरोधियों का आरोप है?
उत्तरप्रदेश में जो भी होता है। वह अभूतपूर्व ही होता है।आश्चर्यजनक किंतु सत्य है कि, उत्तरप्रदेश के प्रमुख सन्यासी होते हुए भी उन्होंने आबादी नियंत्रण के कानून को प्राथमिकता दी है।सबसे बडा आश्चर्य का मुद्दा तो यह है कि,केंद्र में स्थित सरकार जिस राजनैतिक दल की है,उस राजनैतिक दल की मातृसंस्था में सभी ब्रह्मचारी पुरुष है।ब्रह्मचारी होते हुए भी इन्हें आबादी नियंत्रण की बहुत चिंता है।
सबकुछ अभूतपूर्व है।अभूतपूर्व ही हो रहा है। इस तरह अभूतपूर्व घटना होते रहने की घोषित समयावधि पचास वर्षोँ की है।
भगवान इस अर्ध शतक को शतक में परिवर्तित कर दे इन्ही कामनाओं के साथ अभूतपूर्व पूर्ण विराम।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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