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संघियों के लिए राष्ट्रपति पद जनाक्रोश को शांत करने का साधन

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माफी मांगना और माफी मांगने पर माफ कर देना, यह दोनों ही खतरनाक मानवीय प्रवृत्ति है क्योंकि माफी वही मांगता है जो अपनी लड़ाई हार चुका होता है और अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए जीतने वाले पक्ष से माफी मांगने लगता है. माफी वही दे सकता है जो पक्ष जीत जाता है और पराजित पक्ष को माफी मांगने पर माफ कर देता है. लड़़ाई जब वर्ग संघर्ष की हो तो माफी मांगना और माफ कर देना बेहद ही खतरनाक प्रवृत्ति के रुप में सामने आया है.

विश्व सर्वहारा वर्ग संघर्ष में इस मानवीय प्रवृत्ति ने सर्वहारा वर्ग को भारी नुकसान पहुंचाया है. ख्रुश्चेव से लेकर तेंग श्याओपिंग जैसे गद्दारों ने माफी मांगना और माफी मांगने पर माफ कर देने की मानवीय प्रवृत्ति का उपयोग कर सर्वहारा वर्ग के कोप से अपनी रक्षा भी कर गया और वक्त आते ही सर्वहारा वर्ग के साथ गद्दारी कर सर्वहारा राज्य को ही खत्म कर दिया, जिसके निर्माण में करोडों मेहनतकश आवाम ने अपना खून बहाया था.

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पनपे माफी मांगने और माफ कर देने के इस मानवीय प्रवृत्ति से उभरे कारनामों का भारत में जीता जागता उदाहरण सावरकर और उसके चेलों द्वारा बनाया गया आरएसएस है, जो आज कैंसर की भांति देश को जकड़ लिया है और दिन प्रतिदिन मौत की ओर ले जा रहा है. सावरकर द्वारा अंग्रेजों से बार-बार माफी मांगने के चमत्कारी कारनामों के कारण उसे माफीवीर भी कहा जाता है. कहना नहीं होगा कि माफी मांगने के इसी चमत्कारी कारनामों के कारण भाजपा के शक्ल में आरएसएस आज देश की सत्ता पर काबिज है, वरना गांधी की हत्या के साथ ही आरएसएस को समूल खत्म देना चाहिए था.

आज जब भाजपा के शक्ल में आर एस एस देश की सत्ता पर काबिज है, तब इसने माफी मांगने के तरीकों में भारी बदलाव लाया है. यह बदलाव है रबर स्टाम्प राष्ट्रपति पद पर रीढ़विहीन प्राणी को बैठाना. आरएसएस यह जानता है कि भारतीय संविधान के दायरे में सर्वोच्च होने के साथ ही सबसे निकृष्ट पद राष्ट्रपति का है, इसलिए वह इस पद पर उस समुदाय के सबसे निकम्मे, सबसे भरोसेमंद संघी को बैठाता है, जिससे संघी अत्याचार से व्यथित उस समुदाय के आक्रोश को कम किया जा सके.

गुजरात दंगों में हजारों मुसलमान औरतों, मर्दों और बच्चों की हत्या और क्रूरतम हमलों से उपजे आक्रोश से खुद को बचाने के लिए उसने सर्वाधिक लोकप्रिय वैज्ञानिक अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति पद पर नियुक्त किया, जिससे मुसलमानों के बीच यह संदेश जाये कि ‘देखा, हम तुम्हारा कितना ख्याल रखते हैं !’ लेकिन अब्दुल कलाम एक योग्य व्यक्ति थे, जिस कारण उन्होंने संघियों के कई कानूनी प्रस्तावों को वापस भी लौटा दिये. इससे सबक सीखते हुए संघियों ने अब्दुल कलाम के बाद एक रीढ़विहीन प्राणी कोविंद को राष्ट्रपति बनाया.

विदित हो कि जब रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया गया था, उस समय दलितों पर सवर्णों का अत्याचार चरम पर था, जिसे संघियों का भरपूर न केवल समर्थन ही था अपितु, उसमें उसकी सहभागिता भी थी. दलितों के इस आक्रोश को कम करने के लिए उसने अपने रीढ़विहीन गुलाम रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद पर बैठाया.

बाद में इस रीढ़विहीन प्राणी का हालत यह देखा गया कि वह सर्वोच्च पद राष्ट्रपति की गरिमा को गोबर मैं मिलाते हुए न केवल मोदी, योगी बल्कि संघियों और भाजपा के हर नेताओं का कदमबोसी करता फिरता था, उसके कदमों पर सष्टांग करता था. इसके बाद भी इस दलित भांड को पुजारियों ने मंदिरों से धक्का देकर भगा दिया था. बाद में इस भांड ने यह भी स्वीकार भी किया था कि उसकी सैलरी का बड़ा हिस्सा उसे दिया ही नहीं जाता है, वह सब संघी रख लेता है.

ऐसे में अब जब रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति पद का कार्यकाल पूरा होने को है तब संघियों ने एक आदिवासी समाज के एक महिला को इस पद पर बैठाने का जिम्मा लिया है, क्योंकि संघियों के इन आठ साल के कार्यकाल में दलितों के बाद जिस पर सबसे ज्यादा जुल्म ढ़ाया गया है वह है आदिवासी और महिला. बड़े पैमाने पर जुल्मों से तबाह आदिवासी और महिला तबका बेहाल हो चुका है, ऐसे में संघियों के सबसे योग्य रीढ़विहीन उम्मीदवार द्रोपदी मुर्मू ही मिली है.

अपने नाम की उम्मीदवारी की घोषणा होते ही इस आदिवासी महिला ने खुद की रीढ़विहीनता साबित करने के लिए संघियों के सामने सष्टांग हो गई और मंदिर मंदिर में पत्थर की मूर्ति पर सष्टांग लगाने के बाद झाड़ू घुमाने कैमरे के साथ पहुंच गई. लक्ष्मण यादव ट्वीट करते हैं कि ‘आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन को लेकर चल रहे अनवरत आन्दोलनों पर द्रौपदी मुर्मू का क्या स्टैंड रहा ? क्या उनके राष्ट्रपति बनने पर आदिवासियों के संघर्षो से न्याय होगा ? कुल्हाड़ी की बेंत और जंगल की लकडियों का किस्सा जानते हैं न ?’

अपने ट्वीट से आगे लक्ष्मण लिखते हैं कि जितना भला दलितों का रामनाथ कोविंद जी के राष्ट्रपति रहते हुआ, उतना ही आदिवासियों का द्रोपदी मुर्मू जी के राष्ट्रपति बनने से होगा. सामाजिक न्याय का अर्थ जातियों को प्रतिनिधित्व मात्र देना नहीं, वंचित शोषित जातियों की विचारधारा व एजेंडे पर काम करना है. बिना विचार व एजेंडा के कुल्हाड़ी की लकड़ी बनने से अपना ही नुक़सान होता है, वरना ऐसे तो मोदी भी ओबीसी ही हैं.

आदिवासी जनगणना में धर्म के कॉलम में अपनी संस्कृति व धार्मिक मान्यताओं के लिए लड़ रहे हैं. आदिवासी अपनी अलहदा पहचान व संस्कृति के लिए लड़ रहे हैं. मगर आदिवासी पहचान के साथ जिन्हें राष्ट्रपति बनाया जा रहा है, वे नाम प्रस्तावित होने के बाद ख़ुशी में एक हिन्दू मंदिर में झाड़ू लगाते हुए दिख रही हैं. इस क्या समझें? वैचारिक रूप से दिक़्क़त तलब चिंता यही है.

सामाजिक न्याय की राजनीति का अर्थ यह कत्तई नहीं कि हर जगह मेरी जाति, मेरे समुदाय का ही शख़्स हो; भले ही वह वैचारिक व एजेंडे के लिहाज़ से समाज के साझा हितों के विपरीत स्टैंड पर खड़ा हो. हम जब हिस्सेदारी व प्रतिनिधित्व की बात करते हैं, तो वह एक वैचारिक बात है. इस विचार को समझे बिना सामाजिक न्याय की राजनीति दुधारी तलवार बन जाएगी.

भाजपा को जो काम करना था, वह उसमें सफ़ल हो गई. भाजपा के पास सवर्ण वोटर एकमुश्त बरक़रार हैं. सवर्णों के लिए सब कुछ दाव पर लगाकर भी नीतियाँ बन ही रही हैं. अब भाजपा दलितों, पिछड़ों के साथ आदिवासियों को भी साध रही. हर जगह इन्हें सामने रखो, ताकि पीछे इनके विनाश का काम थोड़े कम शोर के साथ आसानी से होता चले. कोई कहे तो मोहरें दिखा दो.

विपक्ष सवर्णों को ख़ुश करने के ज़हालत भरे विचार से अपना सियासी विनाश करता जा रहा. जबकि उसे समझना चाहिए कि जो सवर्ण संघी नहीं हैं, वे उनके साथ हैं ही. संघी सवर्ण कभी उनके न होंगे. वंचित शोषित उनके हो सकते हैं. मगर वैचारिक रूप से खोखले विपक्षी दलों की निर्णय लेने वाली कुर्सियों से यह उम्मीद ही बेमानी होती जा रही है. धिक्कार है.

मैं यह कत्तई नहीं कह रहा कि आदिवासी राष्ट्रपति बनने का विरोध किया जाए या ये मान लिया जाए कि वे पूरी तरह आदिवासियों के लिए रामनाथ कोविंद ही साबित होंगी. संभव है कि इसके परिणाम कुछ बेहतर भी हों. मगर वैचारिक पक्षधरता व साझा हितों पर जारी संघर्षों को किनारे करके केवल अपनी जाति व पहचान पर लहालोट होने वालों से संवाद तो करना होगा. जंगल, कुल्हाड़ी, लकड़ी के रिश्ते में अंततः नुकसान लकड़ियों का ही है.

Ramswaroop Mantri

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