हरनाम सिंह
एक पत्रकार और सजग पाठक के रूप में हिंदी साहित्य उसकी परंपरा देशकाल के अनुरूप लेखकों की अभिव्यक्ति उनकी लेखन विधा से परिचय तो रहा ही है लेकिन अपने जिले मंदसौर की साहित्य परंपरा को गहराई से टटोलना का अवसर मिला तो स्वाभाविक रूप से गौरव का भान हुआ कि मैं उसे प्राचीन नगर दशपुर का निवासी हूं जिसे ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में भारत देश की राजधानी होने का गौरव प्राप्त था। इसी दशपुर की गौरव गाथा का बखान दशपुर में ही जन्मे महाकवि कालिदास ने अपनी रचनाओं में मेघदूत, नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम में किया है। विश्व का पहला व्यवसायिक विज्ञापन शिला पर उकेरे गए श्लोक के माध्यम से प्रदर्शित करने का गौरव भी इसी दशपुर नगर को जाता है।
प्राचीन दशपुर नगर जिसे वर्तमान में मंदसौर के नाम से जाना जाता है उसकी साहित्य परंपरा का प्रारंभ चंद्रगुप्त के शासनकाल में ईसवी संवत 385 में माना जा सकता है। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में शक सम्राट चंद्र वर्मन ने दशपुर पर राज्य किया था। जब उसकी बर्बरता बढ़ गई तो इस दौरान चंद्रगुप्त द्वितीय ने जन सहयोग से शकों को परास्त करने में सफलता पाई थी। प्राप्त दो प्राचीन प्रस्तर शिलालेखों में तत्कालीन शासक बंधु वर्मा के कार्यकाल में राजकवि वत्स भट्टी ने दशपुर की काव्य प्रशस्ति 44 श्लोकों में उत्कीर्ण की थी।
हूंण राजा मिहिर कुल को पराक्रम से पराजित करने वाले जैनेंद्र यशोधर्मन द्वारा स्थापित दो विजय स्तंभ आज भी मंदसौर में मौजूद हैं। जिन पर कवि वासुल ने उनका प्रशस्ति गान लिखा है। ब्रह्म लिपि में गोविंद नामक वास्तुकला विशारद ने 40 फीट ऊंचे विशाल पत्थर की लाट पर *अथ जयंती जनेंद्र श्री यशोधर्मन नामा* अंकित किया है।
विजय राजेंद्र सूरी स्मारक ग्रंथ में पंडित मदनलाल जोशी के अनुसार दशपुर निवासी आर्य रक्षित सूरी ने संवत 1561 में “ललितांग चरित्र”नामक रास लिखा जिसमें मालव देश के मांडवगढ़ के शासक बादशाह नासिर के राज्य में श्री पुंज मंत्री का उल्लेख है। पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास हर प्रसाद शास्त्री, डा. केदार एवं अन्य कई विद्वानों की मान्यता है कि कवि कुल शिरोमणि कालिदास दशपुर (मंदसौर) में ही जन्मे थे। उन्होंने अपनी रचना मेघदूत में दशपुर निवासियों, यहां की ललनाओं एवं अपने आराध्य पशुपतिनाथ का विषद वर्णन किया है। यही अष्टमुखी प्रतिमा आज क्षेत्र की विशिष्ट पहचान बन चुकी है। दशपुरवासी महाकवि कालिदास को अपने जिले की साहित्य परंपरा में पुरखे के रूप में मानते हैं।
औपनिवेशिक शासन काल में प्राचीन दशपुर एवं वर्तमान मंदसौर जिले में कई लेखकों का उल्लेख मिलता है, उनमें प्रमुख नाम तत्कालीन रियासत सीतामऊ जो वर्तमान मंदसौर जिले की तहसील है, वहां के शासक नरेश राज सिंह के पुत्र रतन सिंह का है, जो न केवल काव्य में अपितु चित्रकला एवं संगीत विधा में भी पारंगत थे। वे नटनागर के नाम से लिखते थे। उनके ही नाम से सीतामऊ में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त “नटनागर शोध संस्थान है”। जो इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए शोध का प्रमुख केंद्र है। वर्ष 1865 में जन्मे रतन सिंह के नटनागर विनोद नाम से तीन काव्य संस्करण प्रकाशित हुए। वे डिंगल, पिंगल दोनों में ही कविता पाठ करते थे।
उनके ही कुल में जन्मे विख्यात इतिहासकार डॉ रघुवीर सिंह ने भी इतिहास के अलावा साहित्य के क्षेत्र में अनेक पुस्तकें लिखी। वर्ष 1932 से 1960 तक हिंदी अंग्रेजी की पुस्तकों के लेखन के अलावा उन्होंने कई पुस्तकों का अंग्रेजी में भी अनुवाद किया। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में वर्ष 1933 में बिखरे फूल, 1938 में सप्तदीप, 1939 में शेष स्मृतियां, 1949 में जीवन धूली, जीवन कण, 1952 में कहानी नई पुरानी प्रमुख है। डॉ रघुवीर सिंह 1952 से 1962 तक राज्यसभा के सदस्य भी मनोनीत किए गए थे। “मालवा में युगांतर” पुस्तक पर 1945 में उन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक दिया गया। वे 1951 से 1956 तक मध्य भारत राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष भी रहे।
रामपुरा में जन्मे साहित्य रत्न भंवरलाल भट्ट मधुप की कई पुस्तकें प्रकाशित हुई, उनमें गुंजन, मधुकण, संसार का स्त्री समाज, गुरु गोविंद सिंह, महाकाव्य वीर अचल, अस्पृश्यता का कलंक, रामपुर का गौरवशाली इतिहास 1969, देवी अहिल्या महाकाव्य, देवकी 1985 प्रमुख हैं।
जिले के नारायणगढ़ निवासी केशव प्रकाश विद्यार्थी की पहचान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पत्रकार और साहित्यकार की रही है। 1920 में जन्मे श्री विद्यार्थी ने 1940 में बाल पत्रिका कन्या का प्रकाशन किया। उनकी रचनाओं में काव्य संग्रह स्फुर्लिंग 1945 ज्वाला, बाल वाटिका 1957 श्रद्धांजलि, नेता निकुंज 1961 ललकार 1963 बापू की बातें, पावन परिचय, पन्नादाई 1969 बलराम 1987 के अलावा सरल गीता 1969 प्रमुख रचनाएं हैं। जिले के प्रथम दैनिक समाचार पत्र ध्वज का प्रकाशन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजमल लोढ़ा ने किया था। उन्होंने एक बाल पत्रिका कुमार का भी 1943 में प्रकाशन प्रारंभ किया इस के संपादक मदनलाल चौबे थे। यह पत्रिका इंदौर- मंदसौर से एक साथ प्रकाशित होती थी। 1950 में एक साहित्यिक पत्रिका कारवां का प्रकाशन भी मदनलाल चौबे और कालिदास मित्तल ने किया था। डॉ मंगल मेहता के संपादन में दो काव्य संकलन प्रकाशित हुए उनमें 1966 में मौन मुखर तथा 1984 में लेखन- 84 । इन संकलनों में रामविलास शर्मा, प्रशांत शेष चौरडिया, बालकवि बैरागी, शिवकुमार मिश्र, चंद्रोदय सिंह श,हेमेंद्र त्यागी, विमल जगधारी ओम प्रकाश एरन, ओमप्रकाश सिन्हा, डॉक्टर रघुवीर सिंह,शिव नारायण गौड़ ,डॉक्टर दुर्गा शर्मा, नरेश मेहता, डॉक्टर देवेंद्र कुमार शास्त्री की रचनाएं प्रकाशित हुई थी। क्षेत्र के पांच लेखको (मेरी स्मृति के अनुसार) बालकवि बैरागी, बाबूलाल माली विषपायी, डॉ मंगल मेहता, विमल जगधारी, चंद्रोदय सिंह राज ने सरपंच नाम से एक उपन्यास लिखा था। प्रोफेसर रामानुज दास मंत्री की आठ पुस्तकें प्रकाशित हुई। उन्होंने शेक्सपियर के सानेट का हिंदी अनुवाद भी किया था।
#मन्नू भंडारी और सज्जाद हुसैन
मंदसौर जिले के भानपुरा में जन्मी मन्नू भंडारी ने भी हिंदी साहित्य में जिले का नाम रोशन किया। क्षेत्र के जाने-माने लेखक सुख संपत राय के घर में जन्मी मन्नू भंडारी का अंतर्जातीय विवाह प्रसिद्ध साहित्य पत्रिका हंस के संपादक राजेंद्र यादव से हुआ था। उनकी कई पुस्तकों चर्चित रही। मन्नू भंडारी के उपन्यास महा भोज पर रजनीगंधा नामक सफल फिल्म भी बनी थी। वे उज्जैन में प्रेमचंद सृजन पीठ की अध्यक्ष रही।
उनके पिता सुख संपत राय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने भी कई पुस्तक लिखी। हिंदी से इंग्लिश और इंग्लिश से मराठी शब्दकोषों की रचना भी उन्होंने की थी। वर्ष 1920 में मंदसौर जिले में पहला कांग्रेस कार्यालय उनके घर में ही खुला था।
संगीत के क्षेत्र में सीतामऊ में संगीत प्रेमी मोहम्मद आमिर खान के घर में जन्मे सज्जाद हुसैन ने भारतीय हिंदी सिनेमा जगत में नाम कमाया। वे अनेक वाद्य यंत्रों मंडोलिन, क्लोरो नेट, वायलिन, पियानो, बैंजो बजाने में सिद्धहस्त थे। वर्ष 1944 से 1977 तक उन्होंने 18 हिंदी फिल्मों में संगीत दिया था। सज्जाद हुसैन पर भी देश-प्रदेश और मंदसौरवासियो को गर्व होना चाहिए।
अविभाजित मंदसौर जिले के रामपुरा में जन्मे नंदराम दास बैरागी (बालकवि बैरागी) की भी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई उनमे प्रतिनिधि रचनाएं गौरव गीत,दरद दीवानी दो टूक, भावी रक्षक देश ,दीवट , झर गए पात, गन्ने भाई, जो कुटिलता में जिएंगे, अपनी गंध नहीं बेचूंगा, मेरे देश के लाल, नौजवान आओ रे, सारा देश हमारा, बर्लिन से बब्बू प्रमुख हैं। उन्होंने एक फिल्म का निर्माण भी किया, कई फिल्मों में उनके गीत आज भी चर्चित हैं।वे मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री एवं लोकसभा सदस्य रहे।
इनके अलावा भी ऐसे कई लेखक, कवि जिले में रहे हैं जिनकी रचनाएं समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रही, उनमें रूपलाल चौहान ग्रामिक ,देवी दत्त शर्मा, हरिहर कानूनगो, सुरेश बैरागी, कैलाश चंद्र पांडे, गिरजा शंकर रुनवाल, शिवकुमार मिश्र आदि हैं। दैनिक ध्वज के संपादक सुरेंद्र लोढ़ा, डॉक्टर चंद्रकांत द्विवेदी, आरती तिवारी सौभाग्य मल जैन की पुस्तकें भी प्रकाशित हुई है।
जिले में साहित्य को लेकर दो प्रांतीय स्तर के सम्मेलन हुए। 1987 में मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रांतीय अधिवेशन में पद्म भूषण विष्णु प्रभाकर, डॉक्टर रघुवीर सिंह, पंडित रामनारायण उपाध्याय, भगवत रावत, मायाराम सुरजन, रामविलास शर्मा, प्रोफेसर कमला प्रसाद आदि सम्मिलित हुए।2008 में प्रगतिशील लेखक संघ का राज्य सम्मेलन में भी प्रोफेसर राम पुनियानी, डॉक्टर असगर अली इंजीनियर, डॉक्टर चंद्रकांत देवताले, नरेश सक्सेना, हबीब तनवीर, प्रोफेसर कमला प्रसाद, कुमार अंबुज, विनीत तिवारी, कृष्णकांत नीलोसे, वसंत शिंत्रे, योगेश दीवान, शैलेंद्र शैली सुसंस्कृति परिहार आदि ने शिरकत की थी।
प्रगतिशील लेखक संघ की मंदसौर इकाई द्वारा भी दो कविता संग्रह “ताकि जागे लोग” एवं छूटा हुआ सच “प्रकाशित हुए जिसमें प्रमुख रूप से बाबूलाल माली “विषपायी” दिनेश चंद्र पांडे, डॉक्टर चंद्रकांत द्विवेदी,जिया कमर,कमल जैन , कैलाश जोशी,आलोक पंजाबी असअद अंसारी सहित अनेक स्थानीय कवियों की कविताएं प्रकाशित हुई। डॉ चंद्रकांत द्विवेदी के दो काव्य संग्रह “उलटबांसियों का समय” तथा “शायद सुंकू मिले” चर्चित रही।संगठन द्वारा कविता एवं नाट्य विधा पर प्रशिक्षण पर शिविर भी आयोजित किए गए ।





