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बेटी को पर्याप्त सुरक्षा और संरक्षण दिया जाए

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सुसंस्कृति परिहार
 भारतीय संस्कृति में मां -बाप,भाई- बहिन पति-पत्नी और अनेक नातों  मसलन दादा-दादी , नाना-नानी चाचा-चाची,ताऊ-ताई,फूफा-बुआ,मौसा-मौसी,मामा -मामी का जो व्यापक संजाल है वह दुनिया में कहीं नहीं है। यहां तो धर्म पिता और धर्म भाई के रिश्ते भी मिलते हैं। लेकिन इन अनगिनत रिश्तों के बीच भी औरत जात सुरक्षित नहीं है। बाहर की बात तो फिलहाल छोड़ ही दीजिए। कतिपय लोगों का ख़्याल है कि यह आज की बात नहीं है ये रिश्ते सदियों से कलंकित होने के प्रमाण हैं।ये बात और कि तब स्त्रियां चुपचाप सब सहन कर लेती थीं और बात बाहर तक नहीं पहुंच पाती थी।घर की प्रतिष्ठा  धूमिल ना हो इसलिए घर की स्त्रियां  मिलकर इस बात पर पर्दा डाल देती थीं ।इससे पुरुष की कामुक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला और घर के अंदर स्त्री जात असुरक्षित हो गई ।उस पर दमन चक्र चलता रहा इससे बचाने ही , छोटी उम्र में विवाह की सोच विकसित हुई होगी। लड़की को उसके घर भेजकर लोग आज भी चैन की सांस लेते हैं।
बहरहाल अब जब कम उम्र में विवाह प्रतिबंधित है घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 भारत की संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाना है अौर पीड़ित महिलाऔं को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना है। यह 26 अक्टूबर 2006 से लागू है। स्त्रियों ख़ासतौर से बालिका सुरक्षा हेतु किशोर न्याय  अधिनियम भी लागू है तब भी ऐसी शर्मसार करने वाली घटनाएं बड़ी तादाद में सामने आ रही हैं । सबसे ख़तरनाक बिंदु है अब यह घृणित कृत्य करने के बाद बच्चियों की हत्या कर दी जा रही है।ताजा घटनाक्रम पन्ना जिले के ग्राम मुड़वारी की है जहां चाल चरित्र और चेहरे वाली भाजपा और कथित सांस्कृतिक संगठन संघ के सदस्य सतीश  मिश्रा  ने अपनी ही नाबालिग बच्ची के साथ ये घृणित कृत्य किया ।बच्ची ने थाने पहुंच कर रिपोर्ट लिखाई और अब ख़बर ये मिल रही है फरार आरोपी बाप को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
कहने का आशय यह कि घरों के अंदर बच्चियों पर जो सितम हो रहा है वह बाहर आने लगा है और एक से एक रसूखदार की असलियत सामने आने लगी है।बच्ची की सराहना होनी ही चाहिए जिसने साहस के साथ ये कदम उठाया और अन्य पीड़िताओं को राह दिखाई।आरोपी बाप पर कानून अपना काम करेगा पर इस नाबालिग बच्ची को सुरक्षित रखना समाज और प्रशासन की जिम्मेदारी है क्योंकि वह ख़तरे में रहेगी और आरोपी की पूरी कोशिश उसे ख़त्म करवाने  की होगी ताकि आरोप सिद्ध ना हो पाए।
यदि उसे  बाल सुरक्षा गृह में भेजा जाता है तो उसकी देखभाल का जिम्मा महत्वपूर्ण हाथों में हो उसे जलील ना किया जाए ,उसको घर से ज्यादा प्यार की जरूरत है।यदि वह घर में ही रहती है तो भी उसकी चाक चौबंद व्यवस्था हो उसके सम्मान पर चोट ना पहुंचे।साथ ही साथ उस पर कोई दबाव ना पड़े ।यदि उस बच्ची के साथ आत्मीय व्यवहार किया जाता है तो मुनासिब है इससे समाज की बालिकाओं का हौसला बढ़ेगा और यही हौसला एक दिन स्त्री समाज को इस अकथनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाएगा।
पराया घर और अपने घर की धारणा भी बदलनी होगी संविधान ने स्त्री को पिता की सम्पत्ति में बराबर का हकदार माना है विवाहोपरांत भी वह बराबर हकदार है।जब कोई पीड़िता घर में असुरक्षित महसूस करें तो उसके लिए भी इतर व्यवस्था का प्रावधान होना चाहिए जहां वह मुफीद तरीके से अपना सम्यक विकास कर सके। कहीं कहीं बालिका गृहों को भी यौनाचार का केन्द्र बना दिया जाता है।जिसको पढ़कर स्त्री अपने कदम पीछे कर लेती है । इसलिए यदि इस समस्या का हल तलाशना है तो वह यही है कि पीड़ित बालिकाओं के साथ गलत व्यवहार ना हो उन्हें संबल दिया जाए। उनके साथ सामान्य व्यवहार हो।
पाश्विक वृत्ति के इस दौर में बालिकाओं को हर तरह से मज़बूत कर ही उन्हें बचाया जा सकेगा। सिर्फ़ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ नारे से काम  चलने वाला नहीं । मनोचिकित्सक,सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और जागरुक महिलाओं को ऐसे मामलों पर संगीन नज़र रखनी होगी क्योंकि सरकार और प्रशासन के जिम्मे अकेले उन्हें नहीं सौंपा जा सकता।यह इस घृणित और असंवेदनशील दौर की पुकार है। मुख्यमंत्री से भी अपील है मामा अपनी भांजी को पर्याप्त सुविधाएं , सुरक्षा और संरक्षण प्रदान करें और आरोपी को संघ या पार्टी से मिलने वाली परोक्ष मदद पर रोक लगाई जाए ताकि आपके मुताबिक इस राक्षस को कठोरतम दंड मिल सके।

Ramswaroop Mantri

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