डॉ. विकास मानव
_देवों क़ो दानवों ने मानव बनाया। साध्यदेवों के जिस सतयुग की बात हमने पीछे की है, उसमें किसी पर किसी तरह का बंधन न था, धर्म अधर्म का विचार न था।_
आचरण, जैसा कि गालव याद दिलाते हैं, पशुओं जैसा था। क्षुधानिवारण और आत्मरक्षा की चिंता भी नैसर्गिक थी और इसके कारण कीटपतंग तक सामूहिकता और अनुशासन का ही नहीं, समुदाय और परंपरा के लिए त्याग, यहां तक कि प्राणत्याग तक आनंददायक हो जाता है।
_यदि ऐसा न होता तो मादा केंकड़ा और बिच्छू अपने अंडों को अपने ही शरीर पर लाद कर न रखतीे, उनसे निकलने वाली संतानें उनको ही खाकर नहीं पलतीं; मधुमक्खियों में रानी के सुख के लिए शेष को मरजीवड़ा (ड्रोन) बन कर आत्मबलिदान न करना पड़ता; शिकारी चीटियों के दल पानी में कूद कर,एक पर प्राण देते हुए ऐसा सेतु न बना देता कि उसकी पीठ पर रेंगती हुई चींटियों का दल कभी न कभी उसे पार करके आगे जा सकें।_
सबसे विचित्र है चीटियों के पर निकलते ही जलती हुई लौ पर जल कर मर जाना जिस पर मुहावरे भी बनते हैं और खुद को कुर्बान करने वाले भी पैदा होते हैं। हम केवल यह याद दिलाना चाहते हैं नैतिकता के दो स्रोत हैं, एक नैसर्गिक और दूसरा दार्शनिक या नैसर्गिक का विवेकसम्मत विस्तार। इसलिए जातीय, सामाजिक गौरव की रक्षा के लिए त्याग और बलिदान को शोषक और शोषित के समीकरण पर कसना यांत्रिकता है, पर स्वार्थी व्यक्तियों द्वारा तैयार किए पाखंड जो मजहबों की विशेषता है उनमें स्वाभिमान को कुचलने और भावना भड़का कर उसका दोहन करने का प्रयत्न किया जाता है।
यहां हम इस खतरे की ओर ध्यान दिला दें कि एक नितांत जटिल समस्या को प्रस्तुत करते समय हमें विवश हो कर सरलीकरणों का सहारा लेना पड़ रहा है। समस्या भी जटिल हो और उसकी प्रस्तुति भी जटिल हो जाय तो जाइरोस्कोपी (Gyroscopic) परिदृश्य उपस्थित हो जाए, सब कुछ आंखों के सामने से गुजरे पर पल्ले कुछ पड़े ही नही, फिर भी सरलीकरण से हम वास्तविकता के आभासिक स्तर से नीचे नहीं उतर पाते।
उदाहरण के लिए प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करने वालों का सामूहिक हित था कि उन स्रोतों को नष्ट न किया जाए, और इस मानी में वे सभी प्राकृतिक संपदा को नष्ट करके कृषिभूमि (उर्वरा) में बदलने वालों के विरोधी थे, यहां तक तो सभी असुर और राक्षस थे, पर सभी दानव (दानी) रहे हों यह जरूरी नहीं। पर वे बहुत भोले रहे हों, या सभी एक जैसे दुष्ट रहे हों, यह मानना भी सरलीकरण होगा।
कुछ इतने पैशाचिक कि, दूसरे जानवरों की तुलना में आदमी का शिकार करना उन्हें अधिक आसान लगता था, दूसरे इतने भीरु कि हिंस्र जानवरों से अधिक दूसरे मानवयूथों से डरते और छिप कर रहते थे और किसी अजनवी को देख कर उस पर प्रहार कर सकते थे। हमें इसका सही ज्ञान तो दूर, पूरा अनुमान तक नहीं हो सकता। शुचिता, सामाजिक आचार, आदि के मामले में भी ऐसी ही भिन्नताएं थीं।
सभी आटविक जनों का सांस्कृतिक स्तर एक नहीे था और जरूरी नहीं कि सभी ने प्रकृति के प्रति एक दार्शनिक दृष्टि अपना रखा हो और सभी को प्रकृति मां जैसी लगती रही हो और उसे किसी तरह की क्षति पहुंचाना समान रूप से वर्जित रहा हो। सभी सर्वदेववादी रहे हों। उनमें से नरभक्षी यूथों ने देवों और मानवों के मन में राक्षसों की वह बीभत्स छवि अंकित की जिसका वर्णन महाकाव्यों में मिलता है।
इसलिए कृषिकर्म से जुड़ा ध्वंस सभी के लिए नैतिक वर्जना या पाप भी माना जाता रहा हो। यदि यह जानने के बाद भी कि कृषि पर निर्भरता अधिक भरोसे की है, सभी आटविक जनों ने कृषिकर्म नहीं अपनाया तो इसका कारण यह नहीं है कि वे सभी कृषि को पाप मानते थे, अपितु प्रधान कारण, जैसा हम देख आए हैं, यह था कि कृषि एक साधना थी, एक तपस्या थी, आत्मसंयम, अध्यवसाय और आदिम स्वच्छंदता को सीमित करने की अपेक्षा करती थी।
प्राकृतिक साधनों पर निर्भर करने वाले मौज-मस्ती के आदी थे, इसलिए दुर्दिनों के अनुभव के बाद भी वे वह झंझट मोल नहीं लेना चाहते थे।
इस नतीजे पर हम इस कारण पहुंचे हैं :
(1) यज्ञ विस्तार के क्रम में जिस समुदाय ने खेती की दिशा में पहल की थी उससे दूसरे अनेक जन जुड़े थे। उनकी ध्वनिमाला और शब्दभंडार ने देववाणी को प्रभावित किया था।
(2) सारस्वत क्षेत्र के लोगों ने कृषकों का विरोध नहीं किया था और बाद में अपनाया था।
(3) ऐतिहासिक काल में या इससे पहले, अनेक आटविक जनों – मल्ल, भल्ल, कोलिय, शाक्य, लिच्छवि, (रीछ) – गणों ने सोच समझ कर, कृषि कर्म अपनाया भी था और क्षत्रिय होने का दावा भी किया था और
(4) आधुनिक काल के आटविक जनों के आचरण से भी इस बात की पुष्टि होती है कि आर्थिक विपन्नता के बाद भी, नए अवसर पा कर अधिक खुशहाल होकर भी वे कुछ समय बाद, अनुशासित जावन से ऊब कर अपनी आटविक स्वच्छंदता में वापस लौटने को लालायित रहते थे।
सार यह कि पहले खेती से बचने और बाद में किसानी करने वालों की शर्त पर काम करने को बाध्य होने वाले, पहले पापबोध के कारण ही नहीं, अध्यवसाय की कमी के कारण खेती की दिशा में पहल न कर सके थे और बाद में और कोई चारा न रह जाने पर वे सभी काम करने को तत्पर न हुए थे। ऐसा खेती को पाप या वर्ज्य मानने की दशा में संभव न होता।
अब यह टकराव दो प्रबुद्ध समुदायों के बीच होता है जिनमें एक प्रकृति की रक्षा के लिए धर्मदृष्टि की भिन्नता के कारण किसी सीमा तक जा सकता है और दूसरा मनुष्यता को दुख दारिद्र्य और कुपोषण से मुक्त कराने के लिए किसी सीमा तक जा सकता है।
प्रतिस्पर्धा इन दोनों प्रबुद्ध जनों के बीच है. इनका भी सामान्यीकरण करने के अपने खतरे हैं।
इस बात पर ध्यान देना चाहिए देव युग से मानव युग का यह युगांतर एक झटके में घटित नहीं हुआ। लंबे समय तक देव और मनुष्य (मर्त्य) दोनों संज्ञाओं का व्यवहार होता रहा। इसके बाद यह कहा जाने लगा कि मनुष्यों ने उन्हीं बातों की नकल करना आरंभ किया जो उनसे पहले देव किया करते थे, अर्थात् उनके पूर्वज किया करते थे।
मनुष्य ने धरती को इसलिए जोतना आरंभ किया कि पहले देवों ने ऐसा किया था। परंतु यह आंशिक रूप में ही सही है।
देवों के दैवीकरण की एक प्रक्रिया है जो कम जटिल नहीं है। देवों के मर्त्य हो जाने के बाद भी किसी असाधारण उपलब्धि के कारण उन्हें लोकोत्तर कहा जाता है।
अंगिरा तो मनुष्य है, धातुविद्या के विशेषज्ञ होने के कारण चमत्कारी पुरुष हैं जिसके कारण अथर्वांगिरस का वेद – अथर्ववेद- जादू, चमत्कार, मंत्रों और ओषधियों और उपचारों का संग्रह मान लिया जाता है इसलिए इसे वेद होने का गौरव भी प्राप्त नहीं होता फिर भी ऋग्वेद में ही वह ऋषि भी मान लिए जाते हैं।
यहां तक तो ठीक है, पर उन्हें दिवस्पुत्र – द्युलोक या स्वर्गलोक से अवतरित मानना – दिवस्पुत्रा अंगिरसा भवेम (हम स्वर्गलोक से अवतरित अंगिरस जैसे बनें) – कहना एक संक्रमण का परिचायक है। इसी के चलते वैदिक वैदिक काल के भूपति – भूसंपदा पर अधिकार करने वाले देव भी स्वर्ग को पहुंच जाते हैं और प्राचीन ऋषि भी आकाश के नक्षत्र बन जाते हैं।
परंतु यह उत्कर्ष भी एक झटके में संभव नहीं होता, और इसलिए हमारे प्राचीन स्रोत ग्रंथ भी विचारणीय हो जाते हैं। उनके अनुसार सभी देव धरती छोड़ कर एक साथ स्वर्ग चले गए। यह यात्रा भी कई चरणों में घटित हुई। आरंभ में पारस्परिक सहायता या सामुदायिक संगठन जरूरी था। साध्यदेव युग की तरह सब कुछ सबका था।
इसी में अस्तित्व रक्षा के लिए कार्य विभाजन हुआ जिसने आगे चलकर वर्ण विभाजन का रूप लिया। इतिहास हजारों साल का है इसलिए अपनी निजी सूझ, उद्यम और पहल का पूरा लाभ उठाने वालों द्वारा निजी संपत्ति ही नहीं कायम हुई और देव समाज के भीतर ही बड़े-छोटे का भाव न उत्पन्न हुआ. अपितु बड़े भूस्वामियों बढ़ती आकांक्षओं के चलते अपनी संपत्ति पर अधिकार जताते हुए भी समृद्धि के नए साधनों की तलाश आरंभ हुआ।
यहां हमें फिर सरलीकरण से काम लेना पड़ रहा है, क्योंकि कुछ भी एक साथ नहीं हुआ। जब कुछ समुदायों ने स्थायी बस्तियां बसा ली थीं, तब भी शेष वनेचर थे और कुछ उनसे भी पहले के महापथों के अनुगामी थे और वहां की विशिष्ट और सहजलभ्य वस्तुओं को जुटा कर चलते थे और इनके बदले उनको उन क्षेत्रों के उत्पाद मिल जाते थे।
यदि ऐसा नहीं होता तो स्थायी बस्ती बसने के साथ ही सुदूर देशों के उपादान क्यों मिल जाते?
बाद में व्यापार, विशेषतः सुदूर व्यापार के क्रम में विदेश में बसे अड्डों के सेठों को इन्द्र और इनके निवासियों को देव और प्राकार वेष्ठित बस्तियों को स्वर्ग माना जाता रहा, अन्यथा सात, नव स्वर्गों की और जल ओर स्थल मार्गों से नियत दूरियों पर बसे स्वर्गों की बात न की जाती।
[लेखक चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं)





