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सारी पोथियां एक तरफ, ढाई आखर प्रेम एक तरफ़

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मृगेन्द्र

आज़ादी को बचाये रखने के लिए भी कुर्बानी देनी पड़ती है’
भिखारी ठाकुर रंगभूमि, गांधी मैदान पटना में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन5 मईपटना। शाम का वक्त सूरज अस्त होने की तैयारी में और हरा-भरा मैदान खिलाड़ियों से भरा हुआ। कोई क्रिकेट खेल रहा है, कोई दौड़ रहा है, कोई लंबी-ऊंची छलांग लगा रहा है, फुटबॉल भी खेली जा रही है, कोई थकान मिटाने के लिए घास पर पसरा हुआ है, कुछ ग्रुप में बतिया रहे हैं, कोई चलते हुए मैदान का चक्कर काट रहा है, मैदान के किनारे लगी कुर्सियों पर कुछ लोग आराम फरमा रहे हैं और नींबू वाली चाय वाला अपनी दुकान लेकर लोगों के पास जा रहा है।
ऐसे माहौल में ‘ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा का संदेश देते पोस्टर, बैनर से सजी बस एकाएक मैदान में प्रवेश करती है। 
बस के रुकते ही युवाओं का एक समूह फुर्ती के साथ बस से उतरता है और तुरंत काम में जुट जाता है।युवाओं का यह छोटा सा समूह यहां खेल-खेलने नहीं बल्कि आज के दौर में कल्पना से परे, प्रेम व संवैधानिक मूल्यों के जज्बे के साथ सुंदर दुनिया की उम्मीद से भरा संदेश देने आया है। मिलजुलकर देश को आगे ले जाने का संदेश, सत्ता से सवाल पूछने का संदेश, देश की साझी विरासत को बचाये रखने का संदेश, साझी शहादत को याद करते हुए देश की साझी संस्कृति पर गर्व करने का संदेश, अपनी आज़ादी को अक्षुण्ण रखने के लिए लगातार संघर्ष करने का संदेश।
शाम ढलने से पहले ही बैनर लगने के साथ ही घास के समतल मैदान पर ही एक घेरा बनाकर मंच का निर्माण। दर्शकों व अतिथियों के बैठने के लिए भी घास की चादर। 
सब कुछ शांति से निहारती अहिंसा और सत्य के प्रतीक गांधी की आदमकद प्रतिमा। 
खुले आसमान के नीचे दर्शकों का हुजूम और इस गर्मी के मौसम में गर्मी के अहसास को मिटाती मंद-मंद बहती ठंडी बयार। 
ऐसा लग रहा था जैसे इस नफ़रत भरे गर्म माहौल में इप्टा प्रेम के झोंके से, प्रेम की बारिश से माहौल को ठंडा कर रही है। सुनने-देखने वालों के दिलों में सुखद अहसास पैदा कर रही है। उसी तरह प्रकृति गांधी मैदान को ठंडी हवा के झोंकों से शीतल कर रही थी।प्रकृति प्रेम का साथ दे रही थी।
इस सुहावने मौसम में जनगीत, नाटक, कविता पाठ और बुद्धिजीवियों का संबोधन। इसके आनंद की कल्पना किसी भव्य आडिटोरियम में भी नहीं की जा सकती और ऐसा मिश्रित दर्शक वर्ग भी नहीं मिलना।
चुनिंदा स्रोता नहीं बल्कि जनता के लिए, जनता का कार्यक्रम। खुले में प्रस्तुतियां वो भी एक खास जनवादी सोच के साथ साहस भरा काम है और इप्टा यह काम बाखूबी कर रहा है।
कार्यक्रम की शुरुआत इप्टा के साथियों द्वारा जनगीतों के साथ हुई।
प्रोफेसर तरुण कुमार ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज़ादी के 75वें साल में अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है और दूसरी तरफ अमृत की जगह विष बांटा जा रहा है। इप्टा इसी विष का समन करते हुए प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा निकाल रहा है। सिर्फ आज़ादी पाने के लिए नहीं, बल्कि आज़ादी को बचाये रखने के लिए भी कुर्बानी देनी पड़ती है।जो इन चुनौतियों से डरते हैं वो न खुद की आज़ादी की रक्षा कर पाते और न ही देश की।यह बातें तरुण कुमार ने भिखारी ठाकुर ‘रंगभूमि’ गांधी मैदान में आयोजित सांस्कृतिक संध्या के दौरान कही। उन्होंने कहा कि हमारी आज़ादी खून से सनी हुई है। इसमें किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी सभी का खून शामिल है। कोई भी देश नफ़रत और घृणा के बल पर आगे नहीं बढ़ सकता। 
इप्टा को शुभकामनाएं देते हुए तरुण कुमार ने कहा कि प्रेम और शांति ही वो ताकत है जो किसी मुल्क में खुशहाली और तरक्की लाता है। इसी प्रेम और मुहब्बत व जज्बे को जगाने के लिए इप्टा का यह जत्था चल रहा है। 
डॉ सत्यजीत ने कहा कि इस दौर में नौजवानों को फिर से याद दिलाना कि सबसे मिलजुलकर रहना है। चाहे जाति धर्म में भिन्नता हो या विचारों से असहमत हों हिंसा को कोई जगह नहीं है। प्रेम से ही सारे मसले हल हो सकते हैं। ऐसा संदेश लेकर इप्टा जनता के बीच जा रहा है, यह बहुत बड़ा काम है।
इप्टा के राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्य शैलेन्द्र कुमार ने कहा कि साथियो हिंदुस्तान की आज़ादी का सपना देखने वाले गांधी, भगत सिंह, नेहरू के सपने के साथ हैं या गोडसे, सावरकर के सपने के साथ, यह आपको तय करना है कि आप किस सपने के साथ हैं।उन्होंने कहा कि आज़ादी के गर्भ से प्रेम, दया, करुणा, समता, बन्धुत्व, न्याय के मूल्य निकले थे, जिन्हें आज नफ़रत, दंभ, उन्माद के नाम पर खत्म किया जा रहा है। इस माहौल में आप कुछ मत करिए लेकिन अपने बच्चों के दंगाई बनने से डरिये।इप्टा संवैधानिक मूल्यों के साथ भक्तिकाल में उपजे प्रेम, दया, करुणा के मूल्यों को लेकर इस यात्रा के माध्यम से देश की आम जनता के सामने जा रहा है।
गांधी मैदान में आयोजित सांस्कृतिक संध्या का संचालन इप्टा के साथी फिरोज अशरफ़ खान ने किया। बिहार इप्टा के साथियों ने अपनी प्रस्तुतियां से दर्शकों को बांधे रखा। राजनीतिक व्यंग्य पर आधारित ‘हंसमुख नवाब’ नाटक के लगभग हर संवाद और अभिनय पर हंसी के ठहाकों से मैदान गूंजता रहा। दर्शकों की उपस्थिति अच्छी खासी रही। ज़मीन पर बैठे दर्शकों की तुलना में खड़े होकर देखने सुनने वालों की तादाद ज्यादा रही।
मृगेन्द्र

Ramswaroop Mantri

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