शशिकांत गुप्ते
राजनीति में अभीतक पक्ष और विपक्ष के द्वारा एक दूसरें पर घोटाले (Scandal) और Scam मतलब विविध तरह के कांड करने के आरोप लगाए जातें रहें हैं?
फैशनेबल राजनीति में घोटालों और कांड के अरोपप्रत्यारोप करना भी फैशन हो गया है।
बहुत से आर्थिक अपराध,और दूसरे कईं तरह के गम्भीर अपराधीक मामले न्यायायल में विचाराधीन है।
घोटाले और कांड करने के आरोप जबतक सिद्ध नहीं होतें हैं तबतक किसी को भी अपराधी कहा नहीं जा सकता हैं।
राजनीति में बहुत से लोग इसलिए आश्वश्त हैं कि, जब सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का।
आठ वर्ष पूर्व राजनीति में एक अदृश्य वाशिंग मशीन इज़ाद की गई है। यह वाशिंग मशीन साधारण से लेकर जघन्य अपराधों को भी धो देती है।
बजरहल मुद्दा है, घोटाले और कांड का? इनदिनों घोटाले और कांड तो एकतरफ रह गएं हैं,राजनीति में साँड की चर्चा होने लग गई है?
एक लोकोक्ति का स्मरण होता है। साँड की लड़ाई में बाड़ का नुकसान।
एक यह भी कहावत है कि जब बाड़ ही खाने लगे खेत को तब खेत क्या करें?
उत्तर भारत के प्रांतों में आवारा मवेशियों की बहुत गम्भीर समस्या है। ये बेसहारा मवेशी हैं। बेसहारा होने के कारण ये मवेशी आवारा कहलाते हैं।
यदि ये मवेशी इंसान होतें तो निश्चित ही भीख मांगने का व्यवसाय करतें। धार्मिक स्थलों के आसपास डेरा जमा लेतें।
यह भी सीख लेतें कि, कौनसे वार को किस धार्मिक स्थल पर बैठना है।
दुर्भाग्य से ये मवेशी हैं।मवेशी मतलब सभी चौपाया पशु नहीं।
इनमें गाय साँड औए बैल आदि।
साँड को ही चिकित्सीय क्रिया के द्वारा बैल बनाया जाता है। बैल आवारा नहीं हो सकतें हैं। कारण बैल हल और गाड़ियों में जोते जातें हैं।
बैल मतलब नपुसंक साँड ही तो है,फिर भी बैल मानव के लिए उपयोगी पशु है। बैल बनने के बाद बैलों के गले घुंघरू बांधे जातें हैं। यकायक यह पंक्तिया याद आ जाती है।
बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोस दूर हो जाता है खुशियों के कंवल मुस्काते हैं
साँड को बैल बनाकर उसके गले घुंघरू बांध कर कठिन परिश्रम करवाया जाता है। परिश्रम करता है बैल और मनुष्य के गम कोसों दूर हो जातें हैं। यह मनुष्य के स्वार्थी होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
मनुष्य अपने स्वार्थ के पशुओं को विविध तरह की संज्ञा देकर पूजता है। और जब स्वार्थ पूरा हो जाता है तब उन्हें बेसहारा छोड़ देता है।
बेचारे मवेशी बेसहारा होने के अभिषाप के साथ आवारा होने का लांछन भी झेलते हैं।
काश मवेशी अपना संगठन बना पाते। मवेशी अपना कोई नेता चुन पाते, तब मवेशियों द्वारा भी कोई आंदोलन किया सकता था?
यदि ऐसा होता तो इनपर भी विभिन्न तरह के आरोप लगते और इन्हें भी आंदोलनजीवी मवेशी कहा जा सकता था?
मवेशी पढ़ना लिखना नहीं जानतें हैं वर्ना वे भी वादें और दावों के झांसे में आ जातें।
मवेशी जुगाली करतें हैं।जुमला क्या होता है नहीं जानतें हैं।
मवेशियों को आश्वश्त होना चाहिए, देश की जनता के अच्छे दिन आने वाले हैं। जनता के अच्छे दिन आएंगे? तब पशुओं के भी निश्चित ही आएंगे?
वैसे भी गाय को हम माता कहतें हैं। गाय माता ही तो साँड की जननी है।
अभीतक जो Scandal घोटाले हुए हैं जो Scam मतलब कांड हुए हैं। उनके लिए व्यवस्था के पास एक परंपरागत वाक्य है। दोषियों के बख्शा नहीं जाएगा?
बेसहारा और आवारा पशुओं को भी आश्वश्त रहना चाहिए।
बहुत घोषणाएं हो रही है।
अब की बार, पहली बार और बार बार घोषणाएं की जाएंगी?
पशु मूक होता है, सब सहन कर लेता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





