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*15 साल से बेजुबानों के लिए फरिश्ता बने बैठे हैं आनंद गुप्ता*

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,सतना: सड़क के किनारे तड़पते किसी घायल जानवर के लिए जब कोई रुकता नहीं तब एक झोला, कुछ दवाइयां और करुणा से भरा दिल लेकर आनंद गुप्ता वहां पहुंच जाते हैं. बीते 15 वर्षों से आनंद बिना किसी सरकारी मदद या संस्थागत सहारे के पशु-पक्षियों की सेवा कर रहे हैं. उनके लिए सड़क ही अस्पताल है और झोला ही पूरा मेडिकल सिस्टम. घायल गाय का बछड़ा हो या पंख टूटे कबूतर, आनंद बिना देर किए वहीं इलाज शुरू कर देते हैं. यही वजह है कि मुख्तयारगंज निवासी आनंद गुप्ता आज इलाके में चलता-फिरता पशु अस्पताल के नाम से पहचाने जाते हैं.सड़क किनारे कोई घायल जानवर तड़प रहा हो, लोग देख कर भी आगे बढ़ जाते हों… ऐसे वक्त में एक शख्स झोला उठाकर वहां पहुंच जाता है. नाम है आनंद गुप्ता, जगह है सतना. बीते 15 सालों से आनंद बिना किसी सरकारी मदद, NGO या बड़े संसाधनों के पशु-पक्षियों की सेवा कर रहे हैं. उनके लिए सड़क ही अस्पताल है और झोला ही पूरा मेडिकल सिस्टम.

झोले में दवाएं, दिल में सेवा का जज्बा
लोकल 18 से बातचीत में आनंद गुप्ता बताते हैं कि पशु-पक्षियों को रेस्क्यू करते हुए उन्हें 15 साल हो चुके हैं. इस दौरान वे अब तक 150 से ज्यादा पशु और पक्षियों को नया जीवन दे चुके हैं. उनके पास हमेशा एक झोला रहता है जिसमें प्राथमिक उपचार से जुड़ी दवाइयां, पट्टियां, सिरिंज और जरूरी मेडिकल टूल्स होते हैं. किसी भी घायल जानवर को देखकर वे यह नहीं सोचते कि इलाज कहां होगा बल्कि वहीं सड़क पर उपचार शुरू कर देते है. कई मामलों में प्राथमिक इलाज के बाद वे पशु को पशु चिकित्सक तक भी पहुंचाते हैं ताकि सही और पूरा इलाज मिल सके.

गाय से लेकर चमगादड़ तक, हर बेजुबान की सेवा
आनंद गुप्ता की सेवा किसी एक प्रजाति तक सीमित नहीं है. अब तक वे घोड़े, कुत्ते, बिल्ली, कबूतर, बैल, गाय और उनके बछड़ों के साथ-साथ चमगादड़ जैसे कई पक्षियों को भी रेस्क्यू कर चुके हैं. कुछ गंभीर रूप से घायल गाय के बच्चों को उन्होंने वेंकटेश लोक में रखकर उनकी देखभाल भी कर रहे है. आनंद का मानना है कि दर्द किसी भाषा या प्रजाति का मोहताज नहीं होता इसलिए हर बेजुबान को समान अधिकार और संवेदना मिलनी चाहिए.

खुद के खर्च पर, बिना किसी मदद के जारी सेवा
आनंद की खुद की एक बुटीक सेंटर है जिससे होने वाली आमदनी का बड़ा हिस्सा वे पशु सेवा में लगा देते हैं. वे कहते हैं कि इन 15 सालों में इस काम पर कितना खर्च हुआ इसकी कभी गिनती ही नहीं की. जितना कमाया सब इन बेजुबानों पर लगा दिया. कभी-कभी अस्पताल से सिरिंज जैसी छोटी-मोटी मदद मिल जाती है लेकिन दवाइयों से लेकर पशुओं के खाने तक का खर्च पूरी तरह वे खुद उठाते हैं. आय का कोई अलग साधन न होने के कारण वे वहीं इलाज करते हैं जहां पीड़ित पशु मिल जाता है.

रोजमर्रा की जिंदगी में भी सेवा ही प्राथमिकता
दिन में कम से कम एक घंटा वे आवारा पशुओं को खाना खिलाने जरूर जाते हैं और दुकान बंद करने के बाद भी उनका समय इन्हीं बेजुबानों के नाम रहता है और यही आनंद का डेली रोटीन है. थकान, मौसम की मार या सुविधाओं की कमी उनके जज्बे को कभी कमजोर नहीं कर पाई. क्योंकि उनके लिए यह सेवा कोई शौक नहीं बल्कि जीवन का उद्देश्य बन चुकी है.

 शादी नहीं, अब जीवन सिर्फ पशुओं के नाम
आनंद गुप्ता ने जीवन में शादी न करने का संकल्प लिया है. उनका कहना है कि अब जीवन में शादी का उद्देश्य खत्म हो चुका है और यह जीवन पूरी तरह पशुओं के लिए समर्पित है. इस सेवा में उनकी छोटी बहन भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं. बहन भी जानवरों के प्रति वही लगाव रखती हैं और जहां जरूरत होती है वहां आनंद का साथ देती हैं.

 इंसानियत की मिसाल बने आनंद गुप्ता
आज के दौर में जहां लोग अपने फायदे से आगे सोचने से कतराते हैं वहीं आनंद गुप्ता जैसे लोग इंसानियत की मिसाल बनकर सामने आते हैं. बिना किसी पहचान, पुरस्कार या लाभ की चाह के वे सिर्फ इसलिए सेवा कर रहे हैं क्योंकि किसी बेजुबान की जान बचाना उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है. अधेड़ उम्र के आनंद की कहानी न सिर्फ प्रेरणादायक है बल्कि समाज को यह संदेश भी देती है कि सच्ची सेवा संसाधनों से नहीं बल्कि संवेदना से शुरू होती है.

Ramswaroop Mantri

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