डॉ. नीलम ज्योति
_राधा कृष्ण के प्रेम में थी। हमने कभी कोई ऐसी घटना या बात नहीं सुनी जिसमे राधा को किसी गुरु के पास जाते या गुरु की खोज करते सुना हो।_ प्रेम मे प्रेमी ही सबसे बडा गुरू होता है। वो ही परमात्मा होता है। लेकिन : हम आज हर प्रेम करने वाले जोड़े को गुरु की खोज करते,तो मंदिरों के चक्कर लगाते देखते हैं। इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है : प्रेम अपनी उचाईयों को न छु पाया. उस में श्रद्धाभाव ना उतर सका। _प्रेम अपनी उचाईयों को छुए इसके लिए आपको जीवंत होना होगा राधा-कृष्ण की तरह : बिचारों से नहीं, भीतर से। श्रद्धा पूर्ण प्रेम काफी है जीवन को खूबसूरत बनाने के लिए।_
पुरूष के बारे में तो हम कोई आश्वासन नहीं दे सकते; क्योंकि- करोणों में किसी एक को अपवाद मान लें तो, पुरूष भीतर से खाली यानी दरिद्र हो चुका है। _आज स्त्री भी बराबरी के चक्कर में ऐसी होने लगी है, लेकिन सौ में से पन्द्रह-बीस।_ अत: मेरे देखे स्त्री प्रेम के सहारे जीवन की हर गहराइयों को, परमात्म को सहज ही महसूस कर सकती है।जहाँ प्रेम छूटा : वो पूजा करेगी बुतों की. परमात्मा पाने को साधु महात्माओं के चक्कर लगायेगी. -ध्यान नहीं करेगी. तर्क वितर्क कुतर्क करेगी._ऐसा करके वो अपना सारा स्त्रीत्व खो बैठती है।_ (चेतना विकास मिशन)
अपील आधी दुनिया से : “बचिए सब गुरूघंटालों से





