अरावली पर्वतमाला लंबे समय से अवैध खनन, रियल एस्टेट विकास और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के कारण गंभीर खतरों का सामना कर रही है।
यह मुद्दा हाल ही में और भी गंभीर हो गया है, क्योंकि पर्यावरण मंत्रालय ने सर्वोच्च न्यायालय में एक प्रस्ताव दिया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया है, जिसमें अरावली पहाड़ियों को एक नई परिभाषा दी गई है।
- नई परिभाषा: इस नई परिभाषा के तहत, केवल वे पहाड़ियाँ जो अपने आस-पास के क्षेत्र से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची हैं, उन्हें ही ‘अरावली’ माना जाएगा।
- परिणाम: पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का तर्क है कि इस परिभाषा के कारण लगभग 90% अरावली क्षेत्र कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा, क्योंकि अधिकांश पहाड़ियाँ 100 मीटर की ऊँचाई से कम हैं।
- कॉर्पोरेट हित: इस कदम से कॉर्पोरेट समूहों के लिए इन क्षेत्रों में खनन, भूमि अधिग्रहण और रियल एस्टेट परियोजनाओं को शुरू करना आसान हो जाएगा, जिससे इस प्राचीन पर्वत श्रृंखला के अस्तित्व पर संकट आ गया है।
इन गतिविधियों से वनों की कटाई, भूजल स्तर में गिरावट और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में प्रदूषण बढ़ने का खतरा है, क्योंकि अरावली इस क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक ढाल है।
उच्चतम न्यायालय के एक आदेश के बाद फरीदाबाद नगर निगम क्षेत्र में सूरजकुंड से सटे खोरी गांव की करीब 60 हजार आबादी चिंता में है। मानवीय नजरिए से भले ही यह बहुत मार्मिक लगे कि एक झटके में 80 एकड़ में फैले शहरी गांव के करीब दस हजार मकान तोड़े जाने हैं, लेकिन यह भी कड़वा सच है कि राजस्थान के बड़े हिस्से, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब को सदियों से रेगिस्तान बनने से रोकने वाले अरावली पर्वत को बचाने को यदि अदालत सख्त नहीं हो तो नेता-अफसर और जमीन माफिया अब तक समूचे पहाड़ को ही चट कर गया होता।
कैसी विडंबना है कि जिस पहाड़ के कारण हजारों किमी में भारत का अस्तित्व बचा हुआ है, उसे बचाने के लिए अदालत को बार-बार आदेश देने होते हैं। वर्ष 2016 में ही पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट अरावली पर अवैध कब्जा कर बनाई गई कालोनियों को ध्वस्त करने के आदेश दे चुका था, उसके बाद फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस आदेश पर मोहर लगाई थी।
अरावली पर कब्जे हटाने के लिए राज्य सरकारों की कभी ईमानदार मंशा नहीं रही, तभी हरियाणा सरकार ने तीन मार्च 2021 को सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दे कर पर्यावरणीय मंजूरी सहित सभी वैधानिक अनुमति के अनुपालन के साथ अरावली पर्वतमाला में खनन फिर से शुरू करने की मांग की थी। सनद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 में अरावली में खनन कार्य पर प्रतिबंध लगा दिया था। तब से हरियाणा से लगते अरावली क्षेत्र में खनन कार्य पूरी तरह बंद है। उसके बाद 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने इको सेंसिटिव क्षेत्र में सभी प्रमुख और मामूली खनन पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। जान लें कि दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान का अस्तित्व ही अरावली पर टिका है और यदि इससे जुड़े संरक्षण के कानूनों में थोड़ी भी ढील दी गई तो भले ही सरकारी खजाने में कुछ धन आ जाए, लेकिन हजारों हेक्टेयर का कृषि और हरियाली क्षेत्र रेगिस्तान में बदल जाएगा। यह भी याद करना जरूरी है कि वर्ष 2019 के 27 फरवरी को हरियाणा विधानसभा में जो हुआ था उसने अरावली के प्रति सरकारों की संवेदनहीनता जाहिर कर दी थी। बहाना था कि महानगरों का विकास करना है, इसलिए लाखों वर्ष पुरानी ऐसी संरचना जो कि रेगिस्तान के विस्तार को रोकने से लेकर जैवविविधता संरक्षण तक के लिए अनिवार्य है, उसे कंक्रीट का जंगल बनने के लिए छोड़ दिया गया।
बीते दिनों हरियाणा विधानसभा ने संबंधित एक्ट में ऐसा बदलाव किया कि अरावली पर्वतमाला की लगभग 60 हजार एकड़ जमीन शहरीकरण के लिए मुक्त कर दी गई। इसमें 16,930 एकड़ गुरुग्राम में और 10,445 एकड़ जमीन फरीदाबाद में आती है। अरावली की जमीन पर बिल्डरों की शुरू से ही गिद्ध दृष्टि रही है। हालांकि एक मार्च को पंजाब भूमि संरक्षण (हरियाणा संशोधन) अधिनियम-2019 पर दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए हरियाणा विधानसभा के प्रस्ताव के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को चेता दिया था कि यदि अरावली से छेड़छाड़ हुई तो खैर नहीं। ऐसा लगता है कि अरावली का अस्तित्व अदालत के बदौलत ही बचा है। राजस्थान सरकार भी अरावली क्षेत्र में अवैध खनन रोकने को लेकर अदालत में बचती दिखी है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की एक रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के लगभग 100 देशों में हरियाली वाली जमीन रेत के ढेर से ढक रही है। उल्लेखनीय है कि यह खतरा पहले से रेगिस्तान वाले इलाकों से इतर है। धीमी गति से विस्तार पा रहे रेगिस्तान का सबसे ज्यादा असर एशिया में ही है। इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ जमा रहा है। इस बात पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं कि भारत के राजस्थान से सुदूर पाकिस्तान व उससे आगे तक फैले भीषण रेगिस्तान से हर दिन लाखों टन रेत उड़ती है और यह हरियाली वाले इलाकों तक नहीं पहुंचे इसकी सुरक्षा का काम अरावली पर्वतमाला सदियों से करती रही है। विडंबना है कि बीते चार दशकों में यहां मानवीय हस्तक्षेप और खनन इतना बढ़ा कि कई स्थानों पर पहाड़ की जगह गहरी खाई हो गई और एक बड़ा कारण यह भी है कि अब उपजाऊ जमीन पर रेत की परत का विस्तार हो रहा है।
गुजरात के खेड़ से आरंभ होकर करीब 692 किमी तक फैली अरावली पर्वतमाला का विसर्जन देश के सबसे ताकतवर स्थान रायसीना हिल्स पर होता है जहां राष्ट्रपति भवन स्थित है। अरावली पर्वतमाला को दुनिया के सबसे प्राचीन पहाड़ों में गिना गया है। ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना का बड़ा हिस्सा बीते चार दशकों में पूरी तरह न केवल नदारद हुआ, बल्कि कई जगह गहरी खाई हो गई। अरावली की प्राकृतिक संरचना नष्ट होने की ही त्रसदी है कि वहां से गुजरने वाली साहिबी, कृष्णावति, दोहन जैसी नदियां लुप्त हो रही हैं। विश्व वन्य संस्थान की एक रिपोर्ट बताती है कि 1980 में अरावली क्षेत्र के 247 वर्ग किमी पर आबादी थी, आज यह 638 वर्ग किमी हो गई है। इसके 47 वर्ग किमी क्षेत्र में कारखाने भी हैं।
वैसे तो भूमाफिया की नजर दक्षिण हरियाणा की पूरी अरावली पर्वत श्रेणी पर है, लेकिन सबसे अधिक नजर गुरुग्राम, फरीदाबाद एवं नूंह इलाके पर है। अधिकतर भूभाग भूमाफिया वर्षो पहले ही खरीद चुके हैं। वन संरक्षण कानून के कमजोर होते ही सभी अपनी जमीन पर गैर वानिकी कार्य शुरू कर देंगे। फिलहाल वे गैर वानिकी कार्य नहीं कर सकते। जहां पर वन संरक्षण कानून लागू होता है, वहां पर सरकार से संबंधित विकास कार्य ही केवल किए जा सकते हैं। ऐसे में अरावली के पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए हमें इसके पर्याप्त संरक्षण के पुख्ता उपायों को अमल में लाना होगा।
रेगिस्तान की रेत को रोकने के अलावा अरावली मिट्टी के क्षरण, भूजल का स्तर बनाए रखने और जमीन की नमी बरकरार रखने वाली कई जोहड़ व नदियों को आसरा देती रही है। लिहाजा अदालत के आदेशों का पालन अनिवार्य करते हुए अरावली को हर हाल में बचाया जाना चाहिए।
अरावली में भूमि उपयोग की गतिशीलता पर हाल ही में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि पहाड़ियों के निरंतर विनाश के परिणामस्वरूप जैव विविधता का महत्वपूर्ण नुकसान, मिट्टी का क्षरण और वनस्पति आवरण में कमी आई है
अरावली पर्वतमाला के संबंध में अध्ययन में किन प्रमुख चुनौतियों को उजागर किया गया है?
पहाड़ियों का क्षरण: 1975 और 2019 के बीच, अरावली पहाड़ियों का लगभग 8% (5,772.7 वर्ग किमी) हिस्सा गायब हो गया है, जिसमें से 5% (3,676 वर्ग किमी) बंजर भूमि में और 1% (776.8 वर्ग किमी) बस्तियों में परिवर्तित हो गया है।
पहाड़ियों के विनाश ने थार रेगिस्तान को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की ओर विस्तार करने में सक्षम बनाया है , जिससे मरुस्थलीकरण में वृद्धि, प्रदूषण में वृद्धि और अनियमित मौसम की स्थिति उत्पन्न हुई है।
खनन क्षेत्र में वृद्धि: 1975 में 1.8% से बढ़कर 2019 में 2.2% हो गई।
तेजी से हो रहा शहरीकरण और अनियंत्रित खनन अरावली पहाड़ियों के निरंतर बिगड़ते हालात के प्रमुख कारण हैं।
अरावली पर्वतमाला का 25% से अधिक हिस्सा और राजस्थान की 31 पर्वत श्रृंखलाएं अवैध खनन के कारण गायब हो चुकी हैं।
एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणों में खनन का योगदान है, विशेष रूप से श्वसनीय कण पदार्थ (आरपीएम) के माध्यम से ।
मानव बस्तियों में वृद्धि: 1975 में 4.5% से बढ़कर 2019 में 13.3% हो गई।
वन आवरण: मध्य पर्वतमाला में 1975-2019 के बीच वन आवरण में 32% की गिरावट आई , जबकि कृषि योग्य भूमि में उल्लेखनीय वृद्धि हुई ।
1999 से 2019 के दौरान, वन क्षेत्र कुल क्षेत्रफल के 0.9% तक कम हो गया।
अध्ययन अवधि के दौरान औसत वार्षिक वनों की कटाई दर 0.57% थी ।
जल निकायों पर प्रभाव: जल निकायों का क्षेत्रफल 1975 में 1.7% से बढ़कर 1989 में 1.9% हो गया था , लेकिन तब से इसमें लगातार गिरावट आई है।
अत्यधिक गहराई तक खनन करने से जलभंडार क्षतिग्रस्त हो गए हैं , जिससे जल प्रवाह बाधित हो गया है, झीलें सूख गई हैं और अवैध खनिकों द्वारा छोड़े गए गड्ढों के कारण नए जल निकाय बन गए हैं।
अरावली में संरक्षित क्षेत्रों का प्रभाव: मध्य अरावली पर्वतमाला में स्थित तोडगढ़-राओली और कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्यों ने पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र पर सकारात्मक प्रभाव डाला है , जिसके परिणामस्वरूप वनों का क्षरण न्यूनतम हुआ है।
उन्नत वनस्पति सूचकांक (ईवीआई): ऊपरी मध्य अरावली क्षेत्र (नागौर जिला) में ईवीआई का न्यूनतम मान 0 से -0.2 तक है – जो अस्वस्थ वनस्पति का संकेत देता है।
भविष्य के अनुमान: 2059 तक, अरावली क्षेत्र का कुल नुकसान 22% (16,360 वर्ग किमी) तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें से 3.5% (2,628.6 वर्ग किमी) क्षेत्र का उपयोग खनन के लिए किया जाएगा।
अरावली पर्वतमाला के सामने आने वाली अन्य प्रमुख चुनौतियाँ:
तेंदुए, धारीदार लकड़बग्घे, सुनहरे सियार और अन्य प्रजातियों सहित वनस्पतियों और जीवों में महत्वपूर्ण गिरावट आई है ।
अरावली पर्वतमाला से निकलने वाली कई नदियाँ, जैसे बनास, लूणी, साहिबी और सखी, अब सूख चुकी हैं।
अरावली पर्वतमाला के किनारे प्राकृतिक वनों के नष्ट होने से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ गया है।
उन्नत वनस्पति सूचकांक (ईवीआई) क्या है?
परिचय :
ईवीआई एक उन्नत वनस्पति सूचकांक है जिसे बायोमास, वायुमंडलीय पृष्ठभूमि और मिट्टी की स्थिति के प्रति उच्च संवेदनशीलता के साथ बनाया गया है
इसे नॉर्मलाइज़्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स (एनडीवीआई) का संशोधित संस्करण माना जाता है , जिसमें सभी बाहरी शोरों को दूर करके वनस्पति निगरानी की उच्च क्षमता होती है।
ईवीआई मान सीमा :
इसका मान 0 से 1 के बीच होता है, जिसमें 1 के करीब मान स्वस्थ वनस्पति को दर्शाता है और 0 के करीब मान अस्वस्थ वनस्पति को दर्शाता है।
लैंटाना कैमारा , एक कांटेदार, सुगंधित झाड़ी जो 20 फीट तक ऊंची हो सकती है, ने राजस्थान और दक्षिण दिल्ली में अरावली पहाड़ियों के बड़े क्षेत्रों पर आक्रमण किया है
अरावली पर्वतमाला के बारे में मुख्य तथ्य क्या हैं?
परिचय:
अरावली पर्वतमाला गुजरात से राजस्थान होते हुए दिल्ली तक फैली हुई है, जिसकी लंबाई 692 किमी है और चौड़ाई 10 से 120 किमी के बीच भिन्न होती है
यह पर्वत श्रृंखला एक प्राकृतिक हरित दीवार का काम करती है, जिसका 80% हिस्सा राजस्थान में और 20% हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में स्थित है।
अरावली पर्वतमाला को दो मुख्य पर्वतमालाओं में विभाजित किया गया है – राजस्थान में स्थित सांभर सिरोही पर्वतमाला और सांभर खेतरी पर्वतमाला, जिनका विस्तार लगभग 560 किलोमीटर है।
यह थार रेगिस्तान और गंगा के मैदान के बीच एक पारिस्थितिक तंत्र के रूप में कार्य करता है ।
इकोटोन ऐसे क्षेत्र होते हैं जहां दो या दो से अधिक पारिस्थितिकी तंत्र, जैविक समुदाय या जैविक क्षेत्र मिलते हैं।
इस पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी गुरुशिखर (राजस्थान) की ऊंचाई 1,722 मीटर है।
अरावली का महत्व:
अरावली पर्वतमाला थार रेगिस्तान को भारत-गंगा के मैदानों पर अतिक्रमण करने से रोकती है , और ऐतिहासिक रूप से नदियों और मैदानों के लिए जलग्रहण क्षेत्र के रूप में कार्य करती है
इस क्षेत्र में 300 देशी पौधों की प्रजातियां, 120 पक्षी प्रजातियां और सियार और नेवला जैसे विशिष्ट जानवर पाए जाते हैं।
मानसून के दौरान , अरावली पर्वतमाला मानसूनी बादलों को पूर्व की ओर मोड़ देती है, जिससे उप-हिमालयी नदियों और उत्तर भारतीय मैदानों को लाभ होता है। सर्दियों में, ये पर्वतमाला उपजाऊ घाटियों को ठंडी पश्चिमी हवाओं से बचाती हैं।
यह पर्वत श्रृंखला वर्षा के पानी को अवशोषित करके भूजल पुनर्भरण में सहायता करती है , जिससे भूजल स्तर में सुधार होता है।
अरावली पर्वतमाला दिल्ली-एनसीआर के लिए “फेफड़ों” का काम करती है, जिससे क्षेत्र के गंभीर वायु प्रदूषण के कुछ प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है ।
अरावली पर्वतमाला पर सर्वोच्च न्यायालय के क्या निर्णय और कानूनी अधिसूचनाएँ हैं?
2018 का फैसला: हरियाणा के अरावली पर्वतमाला में अवैध निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया, कांत एन्क्लेव को ध्वस्त करने और निवेशकों को मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।
2009 का आदेश: अरावली पर्वतमाला में खनन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
2002 का आदेश: बड़े पैमाने पर भू-क्षरण के कारण हरियाणा में खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
1996 का फैसला: इसमें यह अनिवार्य किया गया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की अनुमति के बिना बडखल झील के 2-5 किलोमीटर के दायरे में खनन पट्टों का नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है।
एहतियाती सिद्धांत (1996): सर्वोच्च न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि सरकारों को वैज्ञानिक साक्ष्य की प्रतीक्षा किए बिना पर्यावरणीय गिरावट का पूर्वानुमान लगाना चाहिए और उसे रोकना चाहिए (वेल्लोर नागरिक कल्याण मंच बनाम भारत संघ)।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (2010): एनजीटी अधिनियम की धारा 20 के तहत पर्यावरणीय निर्णयों के लिए एहतियाती सिद्धांत को अपनाया ।
MoEFCC अधिसूचना (1992): MoEFCC से पूर्व अनुमति के बिना अरावली पर्वतमाला में नए उद्योगों, खनन, वनों की कटाई और निर्माण पर प्रतिबंध।
सरकार द्वारा उठाए गए अन्य उपाय: क्षेत्र में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए एनसीआर में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग का गठन ।
अरावली में अवैध खनन को रोकने के लिए गुरुग्राम में सात सदस्यीय “अरावली पुनर्जीवन बोर्ड” की स्थापना की गई है ।
आगे का रास्ता
अरावली ग्रीन वॉल परियोजना को लागू करें: अरावली पर्वतमाला के चारों ओर 1,400 किमी लंबी और 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी विकसित करें
हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और दिल्ली में 75 जल निकायों का पुनरुद्धार करें और खराब हो चुकी भूमि को सुधारें ।
अफ्रीका की ‘ग्रेट ग्रीन वॉल ‘ से प्रेरित इस परियोजना का उद्देश्य पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करना और मरुस्थलीकरण से लड़ना है।
सफल पुनर्स्थापन मॉडल अपनाएं: गुड़गांव में जैव विविधता पार्क के सफल उदाहरण का अनुसरण करते हुए, वृक्षारोपण और पर्यावास पुनर्स्थापन के लिए नागरिक समाज, कंपनियों और निवासियों के साथ साझेदारी करें।
अरावली क्षेत्र में आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए पारिस्थितिकीविदों और स्थानीय स्वयंसेवकों को शामिल करें ।
कानूनी और नियामक उपायों को मजबूत करें: अवैध खनन और निर्माण को रोकने के लिए मौजूदा सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों और कानूनी अधिसूचनाओं को लागू करें।
अरावली पर्वतमाला को और अधिक क्षरण से बचाने के लिए पर्यावरणीय नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करें और एहतियाती सिद्धांतों को एकीकृत करें ।
अरावली में आगे अतिक्रमण और अवैध बस्तियों को रोकने के लिए सख्त ज़ोनिंग कानूनों को लागू करें ।
अरावली पुनर्जीवन बोर्ड जैसे निकायों को अवैध खनन के खतरे से निपटने के लिए सशक्त बनाएं।
निष्कर्ष
अरावली पर्वतमाला का भविष्य पर्यावरण के निरंतर क्षरण को रोकने के लिए तत्काल और प्रभावी कार्रवाई पर निर्भर करता है। अनुमानों के अनुसार 2059 तक अरावली पर्वतमाला में 22% की कमी आएगी और खनन एवं शहरीकरण का विस्तार हो रहा है। ऐसे में कानूनी उपायों को सख्ती से लागू करना और अरावली हरित दीवार जैसी व्यापक पुनर्स्थापन परियोजनाओं में निवेश करना अत्यंत महत्वपूर्ण है । नवीन संरक्षण मॉडल लागू करके और न्यायिक निर्णयों का पालन करके हम इस महत्वपूर्ण पारिस्थितिक अवरोध की रक्षा कर सकते हैं, जैव विविधता को बचा सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम कर सकते हैं।





