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क्या पूंजीवादी राज्य के भीतर समाजवादी प्रयोग मुमकिन हैं?

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सन्तोष परिवर्तक

एक दौर में आचार्य रजनीश ने अमेरिका में खूब प्रसिद्धि कमाई। हम जानते हैं कि भारत सहित तमाम देशों के सभी बड़े और प्रभावशाली धर्म और आध्यात्मिक गुरुओं के सेंटर अमरीका में हैं। अमरीका जानबूझकर ऐसे धर्मगुरुओं  को अपने यहां बुलाता है, उनके माध्यम से सम्बंधित देशों को कंट्रोल करता है। इसके लिए धर्म प्रचार-प्रसार के लिए अमेरिका खूब मदद भी करता है इसीलिए देखते-देखते ओशो अमेरिका के अन्दर राज्य मशीनरी की सहायता से खूब बहुत जल्दी मशहूर हो गए, उनके अनुयायिओं की संख्या दिन दूना, रात चौगुना रप्तार से बढ़ने लगी। अमेरिका सिर्फ ओशो की ही नहीं धर्म के नाम पर कोई भी चला जाए खूब जमकर मदद करता है। पूंजीवादी समाज के खाए-अघाए, खुद से एलिएनेटेड अमीर अमरीकी, ओशो के तार्किक और निरुत्तर कर देने वाले प्रवचन सुनकर, धन सम्पत्ति के बोझ को ओशो के चरणों में न्योछावर करने लगे। एक वक्त ऐसा भी आया जब ओशो के पास उनके अनुयायियों द्वारा भेंट की गईं, बेहद मंहगी, छियान्बे राल्स रायल्स कारें थीं।

यहां तक तो सब कुछ ठीक था मगर उसके बाद ओशो एक क़दम आगे निकल गये। बंजर जमीन के एक टुकड़े पर, दान से जुटाई गई रकम से, वे रजनीशपुरम् नाम का एक छोटा सा नगर विकसित करने लगे। अपनी तरह की समाजवादी व्यवस्था वाला यह नगर, अरविंद घोष के अनुयायियों द्वारा 1968 में बनाए गए तमिलनाडु स्थित ओरोविल नगर की ही तरह करेंसी लेश था। वहां भी जाति, धर्म, ल़िंग, नस्ल और राष्ट्रीयता के आधार पर   कोई भेदभाव नहीं था। किसी की कोई भी निजी सम्पत्ति नहीं थी। कम्यून की सारी सम्पत्ति ओशो कम्यून इंटरनेशनल के नाम से सबकी सामूहिक सम्पत्ति थी और कम्यून के सारे काम छोटे-बड़े के भेदभाव के बिना कम्यून के सभी सदस्य मिल-जुल कर करते थे।

ओशो अरविंदो से ज्यादा लोकप्रिय थे इसलिए बड़ी सम्भावना थी कि वे जल्द ही अमेरिका के  उच्च मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से के साथ-साथ तमाम निम्न पूंजीपतियों को भी अपने इस प्रयोग में शामिल कर लेते। राजनैतिक रूप से प्रभावशाली तमाम अमरीकी तो उनके अनुयायी बन ही चुके थे।

तो मामला पूंजीवाद की नाभि नाल पर हमले का बन गया। यानी पूंजीवाद के आधार सिद्धांतों के ठीक उलट इस प्रयोग का आधार था.. धन सम्पदा एक बोझ है, लालच बुरी चीज है, पैसे से पैसे कमाना गलत है, ईश्वर एक भाववादी मिथक है और ईसाइयत से मुक्त हो।

फिर क्या था..!

पूंजीपतियों का गिरोह तुरंत हरकत में आ गया। यही ओशो का कदम पूंजीवाद के लिए खतरा बन गया और फिर अमेरिका ने अपने औजार यानी राज्य मशीनरी का इस्तेमाल करते हुए उसने न केवल ओशो पर अंट-शंट आपराधिक मुक़दमे दर्ज कर उन्हे आनन-फानन जेल में डाला बल्कि उन्हे अमेरिका से सदा के लिए दफा कर दिया..! वे इतने पर ही नहीं रुके; ओशो को कहीं भी शरण न मिले, इसकी भी पूरी व्यवस्था की। बड़ी मुश्किल से आखिरकार उन्हे भारत में शरण मिली, जहां वे कुछ ही वर्षों में, जेल में दिए गए सिलेनियम के धीमे जहर के असर के कारण, बेहद कष्टकारी  जीवन जीकर मर गए।

आपको याद दिला दूं कि पूंजीवाद के वर्तमान गढ़ अमरीका में हिंसक और खतरनाक अपराधियों को छोड़कर किसी को भी हथकड़ी नहीं लगाई जाती। उसी अमेरिका में ओशो की गिरफ्तारी के बाद अखबारों में ओशो की हथकड़ी लगी हुयी तश्वीरें प्रकाशित हुयीं। 

ईराक को नेस्तनाबूद करने के बाद सद्दाम हुसैन (बाथ सोशलिस्ट पार्टी के मुखिया) की पिंजरे में बंद तश्वीरें भी आपको याद ही होंगी।

दरअसल इसके पीछे एक खाश मकसद था। इसके माध्यम से अमेरिका दुनिया को बार-बार संदेश यह देता है कि उसे पूंजीवाद के दायरे में हर अपराध, यहां तक हत्या, बलात्कार, लूट खसोट, धार्मिक/आध्यात्मिक प्रचार के नाम पर ठगी, आर्थिक धोकाधड़ी तो बर्दाश्त है, पर पूंजीवाद के मूल विचारों से जरा सी भी छेड़़-छाड़ हरगिज बर्दाश्त नहीं। जो भी ऐसा करने की हिमाक़त करेगा, उसका यही हस्र होगा और उसे व्यवस्था के भीतर के अपराधी नहीं, बल्कि व्यवस्था के बाहर के दुश्मन की तरह ट्रीट किया जाएगा।

इस्लाम की हर दकियानूसी बात से उसे कोई आपत्ति नहीं, पर इस्लाम के उन मूल सिद्धाओं से उसे डर है, जिसमें लालच को बुरा कहा गया है, ब्याज खाना हराम कहा गया है और कमाई के एक हिस्से को यूं ही जरूरतमंदों में तक़सीम करना अनिवार्य बताया गया है। इसीलिए, सोवियत रूस को पराजित करने के बाद इस्लाम उसके निशाने पर आ गया है।  इसी बीच अमरीका की आंखों में धूल छोंककर एक बड़ी आबादी और भौगोलिक क्षेत्र वाला चीन भी कब उससे भी ज्यादा ताकतवर बनकर समाजवाद के झंड़े के साथ उसके सामने आकर तन गया उसे पता ही नहीं चला। 

इसलिए आज पूंजीवाद का मुख्य शत्रु और निशाना चीन है; जिस पर लगातार, तरह-तरह के हमले कर वह दरअसल समाजवाद पर हमले कर रहा है।

दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं, जहां समाजवाद के प्रयोगों पर अमेरिका ने हमले न किए हों। वह पूंजीवाद के हर विकल्प का नामोनिशान मिटा देना चाहता है।

अब हम मूल विषय पर लौटते हैं कि क्या पूंजीवादी राज्य के भीतर समाजवादी मूल्य-मान्यताओं पर आधारित कोई भी प्रयोग, सांस्कृतिक परिवर्तन के जरिए सम्भव है..?  उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि कम से कम किसी एक देश में राजनैतिक सत्ता प्राप्त किए बिना सांस्कृतिक बदलाव से किसी मानवतावादी/समाजवाद की स्थापना का सपना देखना बचकाना आदर्शवाद ही है। पूंजीवाद के भीतर हर प्रयोग, हर विचारधारा, हर समर्थन और हर विरोध की जगह है, लेकिन अजायबघर के जानवर की तरह, न कि जंगल के आजाद जानवर की तरह..!

मुक्ति के किसी भी सपने को जीने के लिए पूंजीवादी राज्य की लाश से गुजरना ही होगा।

*सन्तोष परिवर्तक*

Ramswaroop Mantri

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