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*क्या आप जीवित हैं? जानिए अंगद-रावण संवाद से!*

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~ रीता चौधरी

लंका में पहुंचकर अंगद ने रावण से कहा- तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने का क्या अर्थ?
रावण बोला– मैं जीवित हूँ. मरा हुआ कैसे?
अंगद ने कहा, साँस लेना ही जीवित रहना नहीं. साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती है. तब अंगद ने मुर्दोँ यानी लाशों के ये १४ प्रकार बताए :
कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा।
अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा।।
सदारोगबस संतत क्रोधी।
विष्णु विमुख श्रुति संत विरोधी।।
तनुपोषक निंदक अघखानी।
जीवत शव सम चौदह प्रानी।।
१. कामजीवी :
अत्यंत भोगी, दुराचार की सीमा तक कामवासना में, भोगों में डूबा हुआ व्यक्ति मृत समान है। जिसके मन की बेलगाम इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं, जो इनके अधीन होकर जीता है, वह मृत समान है।
२. वाममार्गी :
जो निर्धारित नियमों से उल्टा चले, हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता रहे, वह मृत है।

३. कृपण : अतिकंजूस व्यक्ति मरा हुआ होता है। जो कल्याणकारी कार्य में अंशदान से हिचकता हो वह भी मृतक समान है।

४. अति दरिद्र :
दरिद्रता भौतिक धन से कम, अभौतिक धन से अधिक संबंधित है. जो व्यक्ति आत्म-विश्वास, सम्मान, साहस, अपनत्व, प्रेम सभी से हीन हो, वह मृत है।
निर्धन का सहयोग करने के बजाए, उसकी उपेक्षा करने वाला इंसान भी मरा हुआ होता है।

५. विमूढ़ :
मूर्ख भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके, यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृतक समान ही है।

६. अजसि :
जिस को उसके कर्मो के कारण बदनामी ही मिलती है, जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत ही होता है।

७. सदा रुग्ण :
जो व्यक्ति निरंतर रोगी बना रहता है, मन से विचलित रहता है, जिस पर नकारात्मकता हावी हो जाती है, जो जीवन के आनंद से वंचित रहता है : वह मृत है.

८. अतिवृद्ध :
अत्यंत वृद्ध व्यक्ति मृत समान होता है, क्योंकि वह शौचआदि तक के लिए अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं।

९. सतत क्रोधी :
नित्य क्रोध में रहने वाला व्यक्ति मृतक है। ऐसे व्यक्ति का नियंत्रण उसके मन और बुद्धि पर नहीं रहता. जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता।

१०. अघमखानी :
जो व्यक्ति पापकर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, मृत है। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।

११. तनु-पोषक :
ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना नहीं रहती, मृतक है।

१२. निंदक :
अकारण निंदा करते रहने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। इसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं, किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।

१३. परमात्म विमुख :
जो ईश्वर विरोधी है, वह भी मृत है। ऐसा व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्त्व है ही नहीं; हम जो करते हैं, वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं।

१४. श्रुति-संत विरोधी : जो संत (संत यानी सत्य में स्थित) और सद्ग्रंथ का विरोधी है, वह मृत है।
श्रुत और संत समाज में अनाचार नियंत्रक (ब्रेक) का काम करते हैं। (चेतना विकास मिशन).

Ramswaroop Mantri

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