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*लोकतंत्र की चौकियों पर हमला : 1973 से 2025 तक का सफ़र*

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-तेजपाल सिंह तेज

          भारत आज जिस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, वह केवल चुनावी राजनीति या सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक अस्तित्व का संकट है। यह वही भारत है जिसने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोकतंत्र को अपने राष्ट्रीय जीवन का सबसे बड़ा मूल्य माना और संविधान को जनता की आकांक्षाओं का संरक्षक बनाया। लोकतंत्र की आत्मा न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया और संसद जैसी संस्थाओं में बसती है, लेकिन आज इन्हीं संस्थाओं की स्वायत्तता पर सबसे बड़े सवाल उठ रहे हैं।

          न्यायपालिका में वरिष्ठता की परंपरा का टूटना, चुनाव आयोग की निष्क्रियता, मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश और धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति—ये सब संकेत हैं कि भारत की लोकतांत्रिक नींव को योजनाबद्ध ढंग से कमजोर किया जा रहा है। आम नागरिक के अधिकार—बोलने की स्वतंत्रता, निष्पक्ष मतदान और न्याय पाने की उम्मीद—मानो छलावे और दुष्प्रचार के बीच धीरे-धीरे लुटते जा रहे हैं।

          इस संकट को समझने के लिए हमें 1973 की याद करनी होगी जब केशवानंद भारती केस में न्यायपालिका ने संविधान की मूल संरचना की रक्षा की थी। उस समय भी सरकार ने न्यायपालिका की वरिष्ठता पर चोट पहुँचाई और ए. एन. रे को मुख्य न्यायाधीश बनाकर संस्थागत संतुलन को तोड़ा। मगर तब न्यायपालिका और मीडिया ने साहस दिखाया, और यही साहस भारत को आपातकाल के अंधेरे से बाहर लाने में मददगार साबित हुआ। आज फिर वही सवाल सामने है—क्या हमारी संस्थाएँ और जनता वैसा ही साहस दिखा पाएँगे?

          भारत आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। यह मोड़ केवल राजनीतिक नहीं बल्कि लोकतांत्रिक और संवैधानिक अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। जहाँ एक ओर देश विदेशी दबावों के बीच अपनी विदेश नीति को संतुलित करने की चुनौती से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर अंदरूनी हालात लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका और मीडिया तक – लगभग हर संस्था पर राजनीतिक हस्तक्षेप और पक्षपात के आरोप लग रहे हैं। यह स्थिति भारत को उस दिशा में ले जा रही है, जहाँ लोकतंत्र का मूलभूत स्वरूप ही खतरे में पड़ सकता है।

          सत्य हिंदी के विशेष कार्यक्रम, श्रवण गर्ग की खरी-खरी में आपका स्वागत है। यह वह कार्यक्रम है जिसमें देश के जाने-माने पत्रकार श्रवण गर्ग वर्तमान राजनीतिक परिवेश पर अपनी तीखी टिप्पणियाँ करते हुए कहते हैं कि एक तरफ़, हम देख सकते हैं कि हम विदेश नीति की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यह एक बड़ा संकट है। जिस तरह से अमेरिका भारत के साथ व्यवहार कर रहा है, जिस तरह से भारत को चीन के पास जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, वह एक बड़ा संकट है। दूसरी ओर, राजनीतिक माहौल इतना बंटा हुआ है कि अब भारत का वह लोकतंत्र नहीं लगता जिसमें लोग एक-दूसरे की आलोचना तो करते थे, लेकिन एक-दूसरे के प्रति द्वेष की भावना नहीं रखते थे। राहुल गांधी के आक्रामक हमलों के बाद, सरकार या तो हैरान या डरी हुई लग रही है। मैंने पिछले कुछ दशकों में, या कम से कम पिछले 10-12 सालों में, इतना आक्रामक विपक्ष नहीं देखा।

          इस समय आक्रामकता काफ़ी बढ़-चढ़कर देखी जा रही है, और यात्रा के दौरान उन्हें समर्थन भी मिल रहा है। वहीं दूसरी ओर, हम देख सकते हैं कि भाजपा को अपने ही परिवार के नज़रिए से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। और जब हम बाहरी दुनिया की ओर देखते हैं, तो हम एक बड़े संवैधानिक संकट का भी सामना कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या आज जो संस्थाएँ मौजूद हैं, वे वाकई स्वतंत्र हैं? क्या उनकी स्वायत्तता स्थायी है, चाहे वह न्यायपालिका हो, चुनाव आयोग हो या सभी जाँच एजेंसियाँ? ऐसे कई सवाल हैं। श्री श्रवण इस बारे में कहते हैं कि कल या परसों मैंने कहा था कि मोदी और भागवत, दोनों मिलकर, ज़ोर-ज़ोर से देश को बता रहे हैं कि वे एक-दूसरे को बेवकूफ़ बना रहे हैं। या फिर, वे अपनी सारी हरकतें लोकतंत्र के ख़िलाफ़ कर रहे हैं। सार रूप में श्री श्रवण के बयानों को देखा जाए तो अधोलिखित स्थिति सामने आती है–

1. विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव:

भारत का भू-राजनीतिक परिदृश्य जटिल हो चुका है। अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा के बीच भारत को अपना संतुलन साधना पड़ रहा है। अमेरिका भारत पर अपने हितों के लिए दबाव डाल रहा है, वहीं चीन की आक्रामकता और सीमाई तनाव भारत के सामने कूटनीतिक चुनौती है। ऐसी स्थिति में भारत को स्वतंत्र विदेश नीति और संतुलित कूटनीति की सख्त आवश्यकता है।

2. भारतीय लोकतंत्र का बँटता हुआ स्वरूप:

देश के भीतर राजनीतिक माहौल असामान्य रूप से आक्रामक हो चुका है। विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी और क्षेत्रीय दल, सरकार पर तीखे हमले कर रहे हैं। यह आक्रामकता लोकतंत्र का हिस्सा मानी जा सकती है, किंतु समस्या यह है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब व्यक्तिगत वैमनस्य और प्रतिशोध में बदलती जा रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच संवाद और सहिष्णुता की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है।

3. न्यायपालिका की वरिष्ठता पर संकट और लोकतंत्र पर हमला:

          भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाने वाली न्यायपालिका भी विवादों में घिरी है। वरिष्ठता की परंपरा तोड़कर न्यायाधीशों की नियुक्ति ने न्यायपालिका की स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लगाया है। जस्टिस नागरत्ना जैसी महिला जज का असहमति दर्ज कराना इस बात का संकेत है कि अंदरूनी असंतोष गहरा है। 1973 में इंदिरा गांधी द्वारा ए.एन. रे को चीफ़ जस्टिस बनाने के विवाद की यादें फिर ताज़ा हो रही हैं। तब भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बड़ा आघात हुआ था, और आज भी वही परिदृश्य दोहराया जाता दिख रहा है।

          2019 के बाद एक बार फिर न्यायपालिका में वरिष्ठता के नियमों की अनदेखी हुई। जिस न्यायाधीश को हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनना चाहिए था, उन्हें स्थानांतरण करके दूसरे हाईकोर्ट भेज दिया गया, जहाँ उनकी वरिष्ठता चौथे क्रम पर रख दी गई। उन्होंने पुनः कार्यभार संभाला, पर यह पूरी प्रक्रिया न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

          मुझे यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि 1973 की यादें ताज़ा हो जाती हैं। उस समय मैं इंडियन एक्सप्रेस में सक्रिय रूप से काम कर रहा था। आपातकाल से ठीक पहले, इंदिरा गांधी की सरकार ने न्यायपालिका की वरिष्ठता की परंपरा को तोड़ते हुए जस्टिस ए. एन. रे को सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया था। इस नियुक्ति से पहले तीन वरिष्ठ न्यायाधीश—जस्टिस जे. एम. शेलट, जस्टिस के. एस. हेगड़े और जस्टिस ए. एन. ग्रोवर—का अपमान हुआ और उन्होंने विरोध स्वरूप इस्तीफ़ा दे दिया।

          इस विवाद की पृष्ठभूमि थी ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामला (1973), जिसमें यह सवाल था कि क्या संसद संविधान की बुनियादी संरचना में परिवर्तन कर सकती है। बहुमत से आया यह निर्णय न्यायपालिका की सर्वोच्चता और संविधान की मूल संरचना को सुरक्षित रखने वाला था। लेकिन चूँकि जस्टिस ए. एन. रे ने इसमें अल्पमत का निर्णय लिखा था, इंदिरा गांधी ने उन्हें पुरस्कृत करते हुए मुख्य न्यायाधीश बना दिया।

          इतिहास हमें बताता है कि जब-जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चोट की गई, तब-तब लोकतंत्र खतरे में पड़ा। आज भी वही स्थिति बनती नज़र आ रही है। बिहार, दिल्ली, नागपुर या असम—हर जगह संवैधानिक संस्थाओं पर एक साथ हमले हो रहे हैं। यह हमला सिर्फ न्यायपालिका तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव आयोग, मीडिया और अन्य संस्थाओं पर भी हो रहा है।

          दुर्भाग्य यह है कि आज बहसें इन बुनियादी मुद्दों से हटकर जीडीपी के आंकड़ों और सतही सुर्खियों तक सीमित हो गई हैं। जैसे सड़क पर पाँच रुपये का नोट फेंककर किसी राहगीर का पूरा सामान लूट लिया जाए, वैसे ही जनता के अधिकार धीरे-धीरे छीने जा रहे हैं—चाहे वह बोलने की आज़ादी हो, वोट का अधिकार हो या संवैधानिक स्वतंत्रता।

          न्यायमूर्ति नागरत्ना द्वारा हाल ही में दिए गए असहमति वाले निर्णय ने यह दिखाया कि न्यायपालिका के भीतर अब भी कुछ आवाज़ें बची हैं, जो इस गिरावट को दर्ज कर रही हैं। लेकिन इन आवाज़ों को अल्पमत में डालकर अनदेखा कर दिया जाता है। यह स्थिति बेहद पीड़ादायक है, क्योंकि यह न्यायपालिका के गौरवशाली इतिहास को धूमिल करती है। अगर हम अपने अतीत को देखें तो पाएँगे कि 1973 का दौर, आपातकाल से पहले का समय, न्यायपालिका और मीडिया के साहस का प्रतीक था। तब न्यायाधीशों और पत्रकारों में इतना साहस था कि वे सत्ता के सामने झुकने से इंकार कर देते थे। आज वही साहस कहीं खोता हुआ दिखाई देता है।

          इसलिए ज़रूरत है कि हम सब “दूसरों के लिए सोचने” की आदत डालें। कुछ लोग जेलों में दूसरों के लिए कष्ट सह रहे हैं, कुछ लोग बोल रहे हैं, और कुछ लोग आंदोलन कर रहे हैं। नागरिक समाज का कर्तव्य है कि वह उनकी आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाए। सत्य हिंदी जैसे मंच इस काम को निभा रहे हैं, और यही कारण है कि आज भी उम्मीद बची हुई है। लोकतंत्र तभी जीवित रहेगा जब जनता जागरूक रहे और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करे।

4. वोट चोरी और चुनाव आयोग पर सवाल:

          लोकतंत्र की सबसे अहम नींव चुनाव आयोग को माना जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में चुनाव आयोग पर पक्षपात और निष्क्रियता के आरोप गंभीर हो गए हैं। विपक्ष बार-बार “वोट चोरी” और “चुनावी धांधली” की बात करता है, पर आयोग अक्सर चुप रहता है। यदि जनता को अपने मताधिकार पर भरोसा न रहे, तो लोकतंत्र की पूरी इमारत ढह सकती है।

5. धार्मिक ध्रुवीकरण और संघ का एजेंडा:

          मथुरा और काशी के मुद्दे उठाकर समाज को धार्मिक आधार पर बाँटने की कोशिशें तेज़ हो रही हैं। अयोध्या के बाद अब काशी और मथुरा को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। भागवत और संघ की रणनीति यह संकेत देती है कि धार्मिक भावनाओं को भड़काकर सत्ता की राजनीति को मज़बूत करने की योजना है। इससे सामाजिक सौहार्द और लोकतंत्र दोनों पर खतरा है।

6. मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला:

          लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया भी अभूतपूर्व दबाव में है। पत्रकारों पर मुकदमे, गिरफ्तारी और उत्पीड़न ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया है। आलोचना करने वाले पत्रकारों को चुप कराने की कोशिशें इस ओर इशारा करती हैं कि सत्ता असहमति को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।

7. जनता का भ्रम और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन:

          आज की स्थिति को श्रवण गर्ग ने सड़क पर रखे नकली नोट से तुलना की है – जनता को छोटे-छोटे लालच दिखाकर उसके बड़े अधिकार छीन लिए जा रहे हैं। नागरिकों के संवैधानिक अधिकार, बोलने की स्वतंत्रता और मतदान का विश्वास – सब कुछ एक साथ कमज़ोर किया जा रहा है। भारत का लोकतंत्र आज अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। विदेश नीति से लेकर न्यायपालिका, चुनाव आयोग और मीडिया तक – हर संस्था पर अविश्वास गहराता जा रहा है। धार्मिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक प्रतिशोध ने सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर दिया है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो भारत अपने लोकतांत्रिक चरित्र को खो सकता है। फिर भी उम्मीद है कि जनता, जागरूक नागरिक और सच्चे लोकतांत्रिक मूल्य रखने वाले लोग, इस अंधेरे दौर को पार कर देश को सही दिशा में ले जाएंगे। लोकतंत्र को बचाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़

नेताओं या संस्थाओं की नहीं, बल्कि हर नागरिक की है। ।https://www.youtube.com/watch?v=lvcUz9dCnF4

          लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की जागरूकता, संस्थाओं की स्वतंत्रता और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी पर आधारित है। आज न्यायपालिका में वरिष्ठता की परंपरा का उल्लंघन कोई सामान्य नियुक्ति का विवाद नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक ढाँचे को मनमानी का औज़ार बनाने का संकेत है। यदि न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी संस्थाएँ कमजोर हो जाएँगी, तो संविधान केवल काग़ज़ का दस्तावेज़ रह जाएगा। राजनीति का धार्मिक ध्रुवीकरण, मीडिया पर दमन, विपक्ष पर हमले और जनता को प्रलोभनों के जाल में फँसाना—ये सब मिलकर लोकतंत्र की आत्मा को खोखला कर रहे हैं। लेकिन इतिहास यह भी सिखाता है कि जब-जब लोकतंत्र पर हमला हुआ, जनता ने संघर्ष कर उसे पुनर्जीवित किया। इमरजेंसी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

आज हर नागरिक को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा केवल अदालतों, पत्रकारों या नेताओं का कर्तव्य नहीं है—यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर हम चुप रहे तो धीरे-धीरे हमारे संवैधानिक अधिकार, हमारी स्वतंत्रता और हमारा भविष्य छीन लिया जाएगा। इसलिए अब समय है कि हम “दूसरों के लिए सोचना” शुरू करें—उनके लिए जो जेलों में कष्ट झेल रहे हैं, उनके लिए जो सच्चाई बोल रहे हैं, और उनके लिए जो लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। यही सोच भारत को सही मायनों में सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाए रखेगी।

Ramswaroop Mantri

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