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खास है अयोध्या की होली :45 दिनों तक खेली जाती है होली, भगवान को रंग लगाते हैं संन्यासी

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 राम की नगरी अयोध्या में होली केवल रंगों का एक दिवसीय पर्व नहीं है, बल्कि यह आस्था परंपरा और भक्ति से जुड़ा ऐसा उत्सव है, जो लगभग 40 से 45 दिनों तक लगातार मनाया जाता है. बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही अयोध्या के मठ-मंदिरों में होली की धूम शुरू हो जाती है. जहां भक्त और भगवान के बीच रंगों का अनोखा संगम देखने को मिलता है. बसंत पंचमी के दिन से ही मठों और मंदिरों में भगवान को अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है. कहीं फूलों से होली खेली जाती है तो कहीं रंगों के साथ फगुआ गीतों की मधुर धुन वातावरण को भक्तिमय बना देती है. यह परंपरा केवल कुछ दिनों की नहीं, बल्कि पूरे एक महीने से अधिक समय तक चलती है.

अयोध्या की होली अपनी 40-45 दिनों की लंबी अवधि, भक्ति और पारंपरिक उल्लास के कारण बेहद खास है। बसंत पंचमी से शुरू होकर यह उत्सव होली तक चलता है, जिसमें रामलला, हनुमानगढ़ी और कनक भवन में भगवान के साथ फूलों और गुलाल से होली खेली जाती है। यहाँ साधु-संत और श्रद्धालु फाग गीतों के बीच अनोखे ढंग से होली मनाते हैं। 

अयोध्या की होली की मुख्य विशेषताएं:

  • लंबा उत्सव: होली का उत्सव बसंत पंचमी से शुरू होकर 40-45 दिनों तक चलता है, जो मठ-मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना के साथ मनाया जाता है।
  • भक्त-भगवान मिलन: रामलला, हनुमानगढ़ी और कनक भवन जैसे प्रमुख स्थानों पर भक्त भगवान के साथ अबीर-गुलाल और फूलों की होली खेलते हैं।
  • रंगभरी एकादशी: इस दिन हनुमानगढ़ी के नागा साधु होली की शुरुआत करते हैं और मठ-मंदिरों में होली का आमंत्रण देते हैं।
  • पारंपरिक फाग गीत: ढोलक, मंजीरा और करताल के साथ फाग गीत गाकर होली का माहौल भक्तिमय बना दिया जाता है।
  • विशेष प्रसाद: रामलला को गुलाल लगाने के बाद पारंपरिक व्यंजन जैसे गुझिया, कचौरी, और खीर का भोग लगाया जाता है। 

राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद, अयोध्या में होली का यह उत्सव अब पहले से कहीं अधिक भव्य और आकर्षक हो गया है।

इस दौरान प्रतिदिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना के साथ होली उत्सव मनाया जाता है. अयोध्या के प्रमुख धार्मिक स्थलों राम जन्मभूमि, हनुमानगढ़ी, कनक भवन सहित अनेक मठ-मंदिरों में इस मौके पर विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं. साधु-संत, संन्यासी और श्रद्धालु भगवान के साथ होली खेलते हुए सनातन संस्कृति की इस प्राचीन परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं.अयोध्या की होली हमेशा से खास रही है. यहां महीनों तक रंग खेला जाता है. बसंत ऋतु के साथ ही मठ-मंदिरों में होली की धूम शुरू हो जाती है. मंदिरों में भगवान को अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है. कहीं फूलों से होली होती है, कहीं रंगों के साथ फगुआ गीत गए जाते हैं. प्रमुख धार्मिक स्थलों राम जन्मभूमि, हनुमानगढ़ी, कनक भवन सहित अनेक मठ-मंदिरों में धार्मिक आयोजन होते हैं. साधु-संत, संन्यासी और श्रद्धालु भगवान के साथ होली खेलते हैं.

राम कचहरी चारों धाम मंदिर के महंत शशिकांत दास बताते हैं कि वसंत ऋतु की शुरुआत होते ही मठ-मंदिरों में होली की धुन सुनाई देने लगती है. बसंत पंचमी से ही भगवान को रंग-गुलाल लगाया जाता है और भक्त लगभग 45 दिनों तक होली का आनंद लेते हैं. यह परंपरा केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है, बल्कि मथुरा और काशी जैसे सनातन परंपरा के प्रमुख केंद्रों में भी इसी प्रकार मनाई जाती है.

कितनी पुरानी

महंत शशिकांत दास के अनुसार, यह परंपरा कई सौ वर्षों पुरानी है और इसका संबंध प्रकृति से भी जुड़ा हुआ है. जब खेतों में नई फसल आती है और बसंत ऋतु का आगाज होता है, तभी से भगवान के साथ होली खेलने की परंपरा प्रारंभ होती है. यही कारण है कि होली से कई दिन पहले ही मठ-मंदिरों में रंग और गुलाल दिखाई देने लगता है. अब राम मंदिर के भव्य निर्माण के बाद अयोध्या आने वाले श्रद्धालु प्रभु श्रीराम के साथ पूरे 45 दिनों तक होली के इस दिव्य और अलौकिक उत्सव का आनंद ले सकेंगे, जो आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है.

Ramswaroop Mantri

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