व्यंग्य …. विवेक मेहता

हमेशा की तरह राजा ने पेड़ पर से लाश को उतारा। पीठ पर लादकर चुपचाप चल पड़ा। लाश में छुपा बैताल राजा से बोला- “राजन, लगता है तुम थक गए हो। चलो तुम्हारी थकान कम करने के लिए कहानी सुनाता हूं- यह कहानी दो अलग-अलग लोगों की, अलग-अलग परिस्थितियों की है। जम्बूद्वीप के एक शहर में एक सीधा-साधा, सज्जन, विद्वान व्यक्ति रहता था। सदाचारी और लोगों की मदद करने वाला। वहां उसके चाहने वाले भी बहुत थे। उसका प्रभाव भी था। लोगों उस से सलाह लेते, उस पर अमल करते । उस व्यक्ति ने अपने प्रभाव का उपयोग कभी भी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं किया। इस कारण उसके बच्चों को अपने बलबूते पर नौकरी तलाशना पड़ी। दूर देश में उनकी नौकरी लगी और वे वहीं बस गए। सज्जन आदमी को बुढ़ापे ने अपनी चपेट में ले लिया। मजबूरन उसे अपने बच्चों के पास जाना पड़ा। एक दिन वही, उसकी मौत भी हो गई। बच्चों ने सीमित परिचितों के बीच उसका दाह संस्कार और अन्य क्रियाएं संपन्न की।
इस किस्से के समानांतर एक कहानी और घटी। जहां उस आदमी की मौत हुई उसी शहर में एक रईस अपने दो नंबर के पैसों से बनाया गया ट्रस्ट छोड़कर मर गया। ट्रस्ट को संभालने की जिम्मेदारी विदेश से रिटायर होकर आए उसके बेटे ने नाक भौं सिकोड़कर संभाली- अरे, यहां तो इतनी गर्मी। इतनी गंदगी। धीरे धीरे संपत्ति से जुड़ी सत्ता का मजा उसके बेटे को आने लगा। कहीं नाम खराब ना हो जाए इस डर से उसने विदेश में पले बढ़े बिगड़ैल बच्चों को अपने पास नहीं बुलाया। वह उन्हें पैसे भेजता रहता। नशा मुक्ति केंद्र का खर्चा उठाता। वहां सुधार न होने पर मजबूरी में अपने पास बुला लिया।
उसकी लड़की नशेबाज और हिप्पी की तरह जिंदगी जीने वाली थी। कभी भी घर छोड़कर लापता हो जाती। कभी इसके साथ तो कभी उसके साथ लिव इन रिलेशनशिप बना लेती । नाम को बनाए रखने, बात को छुपाए रखने के लिए बाप पैसा भेजता रहता। लड़की के व्यवहार के कारण उसे भयंकर बीमारी तो लगना ही थी। वह बीमारी की चपेट में आई। एक दिन मर गई। बाप ने बीमारी का नाम छिपा डाक्टरों पर दोष डाल दिया। उसके दाह संस्कार, अंतिम विधि में भीड़ उमड़ पड़ी। लोग उसका गुणगान करने लगे।”- कहकर बैताल ने कहानी समाप्त की। और हमेशा की तरह प्रश्न दागा- ” पहला व्यक्ति सज्जन था। उसने समाज के लिए काम किया। समाज ने उसे सम्मान नहीं दिया। दूसरी ओर लड़की का व्यवहार समाज में स्वीकृत नहीं था। कलंक समान था मगर समाज उसे सम्मान दे रहा था। ऐसा क्यों? तुम इस प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी नहीं दोगे तो राजन तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।”
” समाज तो स्वार्थी होता हैं। मरने के बाद, मरने वाले के नाम और काम से उसे फर्क नहीं पड़ता। मरने वाले के परिजनों का प्रभावी और पैसे वाला होना मृतक की मौत को सम्मानजनक बनाता है।”
राजा का उत्तर समाप्त होते ही राजा के कंधे पर से लाश को लेकर बैताल फिर पेड़ पर लटक गया।





