अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

पिछले सात वर्षों में बैंकों ने किया 10.70 लाख करोड़ रुपये ऋण को एनपीए खातों से हटाए

Share

2021 वित्तीय वर्ष में बैंकों का 2.02 लाख करोड़ रुपये राईट ऑफ कर दिया गया है; पिछले 7 वर्षों में यह राशि कुल 10.7 लाख करोड़ रुपये बैठती है।

इसके साथ ही पिछले 10 वर्षों के दौरान बैंकों के द्वारा कुल मिलाकर 11,68,095 करोड़ रुपये मूल्य के बैड लोन या नॉन-परफार्मिंग एसेट्स (एनपीए) खातों से हटाए जा चुके हैं।

आरबीआई के अनुसार, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (एसबीआई) के नेतृत्व में, पांच बैंकों ने मार्च 2021 के वित्तीय वर्ष के अंत तक 89,686 करोड़ रूपये हटा दिए हैं, जिसमें एसबीआई का हिस्सा 34,402 करोड़ रूपये है।

बैंकों ने मार्च 2021 के अंत तक 2,02,781 करोड़ रूपये के बैड लोन अपने खातों से उस दौरान हटा लिए जब कोविड-19 महामारी ने देश पर कहर बरपा कर रखा था और भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों से कर्जदारों के लिए ऋण स्थगन जैसे राहत उपायों की घोषणा करने की अनुमति दी थी।

इसके साथ ही बैंकों ने पिछले दस वर्षों में कुल 11,68,095 करोड़ रूपये मूल्य के बैड लोन को बट्टे खाते में डाल दिए हैं। इनमें से अधिकांश राइट-ऑफ़ पिछले सात वर्षों में हुए हैं। यह जानकारी आरबीआई ने एक आरटीआई के जवाब में दिए हैं।

यह कुल गैर-खाद्य बैंक अग्रिम 110.79 लाख करोड़ रूपये के तकरीबन 10.54 प्रतिशत के बराबर है, और सरकार के केन्द्रीय बजट वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए प्रोजेक्टेड सकल बाजार उधारी 12.05 लाख करोड़ के लगभग आसपास है।

10 वर्षों में किये गए कुल राइट-ऑफ़ में से, लगभग 10.72 लाख करोड़ रूपये का राइट-ऑफ़ वित्तीय वर्ष 2014-15 के बाद से देखने को मिला है जब से नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता संभाली है। इस राइट-ऑफ़ ने तमाम बैंकों को अपने-अपने खराब लोन पोर्टफोलियो को धो पोंछकर साफ़-सफ्फाक करने में मदद पहुंचाने का काम किया है।

आमतौर पर, बैंकों के द्वारा किसी एनपीए का राइट-ऑफ़ तब किया जाता है जब हर प्रकार से रिकवरी के उपाय खत्म हो जाते हैं और ऋण वापस होने की सूरत नजर नहीं आती है। हालाँकि, बैंकों को अपने खातों से लोन राइट-ऑफ़ कर देने के बाद भी रिकवरी के लिए आवश्यक कदमों को उठाने की छूट होती है। जब किसी ऋण को राइट-ऑफ़ किया जाता है तो इसे लगातार तीन तिमाहियों तक बेअदायगी मोड में रखा जाता है, और इस बीच बैंकों के द्वारा अपने ऋणदाताओं के नामों का खुलासा नहीं किया जाता है।

आरबीआई ने कहा है कि बैंकों ने वित्तीय वर्ष 2019-20 में 2,34,170 करोड़ रूपये, वित्तीय वर्ष 2018-19 में 2,36,265 करोड़ रूपये, 2017-18 में 1,61,328 करोड़ रूपये और 2016-17 में 1,08,373 करोड़ रूपये ख़ारिज कर दिए। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के नेतृत्व में पांच बैंकों ने मार्च 2021 के वित्त वर्ष के अंत तक 89,686 करोड़ रूपये खातों से निकाल दिए थे। वित्तीय वर्ष 2021 में यूनियन बैंक के द्वारा 16,983 करोड़ रूपये, पंजाब नेशनल बैंक ने 15,877 करोड़ रूपये और बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने 14,782 करोड़ रूपये अपने खातों से राइट-ऑफ़ किये गए हैं।

करीब-करीब 75 प्रतिशत राइट-ऑफ़ अकेले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के द्वारा किये गए हैं, जिसके चलते उनकी ऋण खाते और बैलेंस शीट अब काफी साफ़ सुथरी नजर आ रही है। एक राष्ट्रीयकृत बैंक के अधिकारी का कहना था, “एक बार यदि किसी ऋण को राइट-ऑफ़ कर दिया जाता है, तो इसे एनपीए की बुक से बाहर कर दिया जाता है। इससे बैंक को अपना एनपीए कम दिखाने में मदद मिलती है और टैक्स लाभ हासिल होता है। वास्तव में देखें तो डिफ़ॉल्ट लोन अभी भी वजूद में बना रहता है क्योंकि यह एक बुक एंट्री है।”

आरबीआई के मास्टर सर्कुलर के अनुसार विवेकपूर्ण आय पहचान पर, बैंक सार्वजनिक जमा राशि के संरक्षक होते हैं और इसलिए उनसे उम्मीद की जाती है कि वे उनकी संपत्तियों के मूल्य की रक्षा के लिए सभी कोशिशों को आजमाएंगे। आरबीआई के मुताबिक, बैंकों को किसी भी खाते को पूरी तरह से या आंशिक तौर पर बट्टे खाते में डालने से पहले सभी उपलब्ध साधनों का उपयोग करते हुए रिकवरी के उपायों को अपनाने की जरूरत होती है।

इसके द्वारा कहा गया है कि, “ऐसा देखने में आया है कि कुछ बैंकों के द्वारा खातों के टेक्निकल राईट-ऑफ के उपायों का सहारा लिया जाता है, जिसके चलते रिकवरी के लिए प्रोत्साहन घट जाता है।” बैंकों के द्वारा आंशिक या टेक्निकल राईट-ऑफ का सहारा लेने से ऋण का बाकी हिस्सा मानक परिसंपत्ति के तौर पर नहीं दिखना चाहिए। इसमें बेहतर पारदर्शिता को लाने के लिहाज से, अब से बैंकों को राईट-ऑफ की पूरी जानकारी को उजागर करना आवश्यक होगा।

बैंक शुरू में ऐसी संपत्तियों पर प्रावधान करेंगे और जब यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो जाये कि उक्त ऋण रिकवर नहीं किया जा सकता है तो फिर इसे राइट-ऑफ करना होगा। इसके बाद ही उक्त ऋण को बैलेंस शीट से हटाया जा सकता है और बैंकों की कर योग्य आय उसी अनुपात में कम हो जाती है।

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है और बड़े डिफॉल्टरों के कर्जों को आमतौर पर बट्टे खाते में डाल दिया जाता है, जबकि अल्पकालिक अवधि के कर्जदारों को बैंकों से कोई छूट नहीं हासिल हो पाती है। एक बैंक के सूत्र से जानकारी प्राप्त हुई है कि बट्टे खाते में डाले गए ऋणों की वसूली 15-20 प्रतिशत से अधिक नहीं है। आरबीआई के एक पूर्व अधिकारी का इस बारे में कहना है, “आम तौर पर, राइट-ऑफ को छोटा होना चाहिए, और कुछ संकट के समय ही होने पर बेहद किफायत से इसे इस्तेमाल में लाया जाना चाहिए। टेक्निकल राइट-ऑफ गैर-पारदर्शिता की स्थिति पैदा करता है, क्रेडिट जोखिम प्रबंधन प्रणाली को नष्ट कर देता है और सिस्टम में सभी प्रकार के गलत कामों को ले आता है।”

उक्त अधिकारी का आगे कहना था, “मैं बट्टे खाते में डाले जाने के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन इसे नीति के भीतर बेहद कम ही किया जाना चहिये, जब पैसे की वसूली के लिए सारे प्रयास आजमाए जा चुके हों। कोई भी ऋण जिसे मूर्त संपत्ति के आधार दिया गया हो, उसे कभी भी बट्टे खाते में नहीं डाला जाता है। दूसरा, आपको इन राइट-ऑफ़ के लिए जांच के अधीन रखा जाना चाहिए। इस बारे में एक नीति होनी चाहिए। आप किसी भी बैंकर से पूछ सकते हैं। उन्होंने विजय माल्या का कर्ज माफ कर दिया है। ऐसे में फिर वे उस पैसे की वसूली कैसे कर पाएंगे? इसे बेहद संयम से इस्तेमाल किये जाने की जरूरत है और जहां यह बेहद आवश्यक हो वहीं इस्तेमाल करना चाहिए। यदि कोई संपत्ति है, तो फिर आप उसे क्यों बट्टे खाते में डाल रहे हैं?”

हालांकि, इस राइट-ऑफ का एक बड़ा हिस्सा अपनी प्रकृति में टेक्निकल है। प्राथमिक तौर पर इसका उद्देश्य बैलेंस शीट को साफ-सफ्फाक रखने एवं कराधान दक्षता हासिल करने से है।

केंद्रीय बैंक ने एक विवरण नोट में कहा है “तकनीकी तौर पर राईट ऑफ” खातों में, हेड ऑफिस में किताबों में ऋणों को राईट ऑफ कर दिया जाता है, किंतु वसूली के अधिकार को छोड़े बिना ऐसा किया जाता है। इसके अलावा, आम तौर पर ऐसे ऋणों के लिए किए गए संचित प्रावधानों के आधार पर राइट-ऑफ किया जाता है। एक बार रिकवरी हो जाने के बाद, उन ऋणों के लिए जिन प्रावधानों को किया गया था, वे बैंकों के प्रॉफिट एंड लास अकाउंट में दिखने लगते हैं।”

रविंद्र पटवाल

(इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित जॉर्ज मैथ्यू के इस लेख का हिंदी अनुवाद लेखक और टिप्पणीकार रविंद्र सिंह पटवाल ने किया है।)

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

Follow us

Don't be shy, get in touch. We love meeting interesting people and making new friends.

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें