अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

आधारभूत चिंतन : धर्मसंस्थापनाय संभवामि युगे युगे

Share

डॉ. प्रिया मानवी
(संयोजिका : चेतना विकास मिशन)

 _श्रीकृष्ण के मत मे धर्म है : अहिंसा,  सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति, कर्म मे कर्तापन का अभाव, दया, किसी की निन्दा न करना, लज्जा और व्यर्थ चेष्टा का अभाव तथा तेज, क्षमा, धैर्य,बाहर भीतर की शुद्धि, किसी से शत्रुता न होना और अपने मे श्रेष्ठता का भाव न होना।_
  अन्यायपूर्वक धन का संग्रह, झूठ, कपट, चोरी, व्यभिचार का अभाव, अपराधी पुरुषों को दंडित करना और सत् शास्त्रों का अध्ययन, यह सब धर्म के अंतर्गत आते हैं। और यही मनुष्य का श्रेःयस है।
हमारे मत मे Spiritual Discipline सबसे बड़ा धर्म है इससे Self Satisfaction मिलता है।

मैथ्यू आर्नल्ड धर्म को भावनामय नैतिकता के अतिरिक्त कुछ नहीं कहते.Nothing but morality touched with emotion.
F.H. Bradley कहते हैं : Morality is led beyond itself into a higher from of goodness. It ends in what we may call religion.
यह Goodness ही श्रेयस है तो जहाँ और जिस कर्म से Goodness की अनुभूति होती है, वह धर्म है।

जो श्रीकृष्ण के मतानुसार धर्म कहा गया है, वैसे आचरण से समाज सुख-शांति और आनंद के वातावरण मे जीवन व्यतीत कर सकता है, ऐसा अनुभव मे भी आता है।
हम चोरी, बेइमानी नही करेंगे तो मन मे भय नही होगा। अहिंसा, दान, दया, दमन का पालन करेंगे तो मानसिक शांति मिलेगी, सौमनस्य, सौहार्द और सद्भाव कायम होगा, यही मनुष्य के जीवन का श्रेय है।

  *उपरोक्त धर्म स्थापित हुआ क्या? यदि नही तो कौन सा धर्म स्थापित हुआ?*
      परीक्षित अभिमन्यु का पुत्र था, उसने निर्दोष ऋषि के गले मे मरा साँप डाल दिया। यह कथा श्रीमद्भागवत् के दशम् स्कंध मे लिखी है। इस तरह की दँतनिपोरी हमलोग गाँव मे जब रामाणय गाते  समय कोई मुँह खोलकर खर्राटे भरने लगता तो मजा लेने के लिए उसके मुँह मे कंकण बीनकर डाल देते थे।
   _ऐसा उत्पात एक राजा और अर्जुन का पौत्र करे तो यह कैसा धर्म? सम्राट अशोक ने कलिङ्गा(वर्तमान उड़ीसा) मे कितना बड़ा नरसंहार किया, शक, हूण और कुषाण भारतीय धर्म को नष्ट-भ्रष्ट करके स्वय़ क्षत्रप बन बैठे, गजनी ने पचास हजार ब्राह्मणों का सिर काट डाला, आगे क्या हुआ सभी जानते हैं कि कौन सा धर्म स्थापित हुआ और वर्तमान मे कौन सा धर्म स्थापित हो रहा है?_
    हो सकता है हमने धर्म को ठीक से न समझा हो, शायद यही धर्म कहाता हो, जो हम कर रहे हैं ,पर हमारे समझ मे कोई धर्म स्थापित नही हुआ।
   _संभवामि शब्द जो है उसका अर्थ प्रतीति है, अवतार नही। श्रीकृष्ण ने गीता के दशम अध्याय मे जिस विभूतियोग का वर्णन किया है, यदि हम गौर से विचार करें तो श्रीकृष्ण जो स्वयं अजन्मा है, वह कैसे प्रकट हो सकता है?_
   जाहिर है कि वेदों ने जो लिखा है : आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च.
~यजुर्वेद (३३/४३)
   _जो आकर्षण नियम की बात करता है, यहाँ भी वही अर्थ प्रमाणित होता है कि,,परमात्मा/आत्मा /श्रीकृष्ण, एक आकर्षण शक्ति का नाम है जो अर्जुन अर्थात् अर्जन करनेवाले के हृदय मे कुछ क्षणों के लिए आकृष्ट हुआ, क्योंकि वह ज्ञानमय तेज,,निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च,,अर्थात् स्वयं प्रकाश आज भी मृत्यु लोक मे अपने प्रकाश को निवेशित कर रहा है और सभी लोकों का पालन-पोषण कर रहा है। तो वह अभी भी विद्यमान है, जिसमे जितनी आकर्षणशक्ति है उतना प्राप्य भी है।_
     युगे युगे : तो यह कौन से युग की गणना है भाई! यदि पृथिवी के युग की गणना होती तो द्विरुक्ति नही होती, और यदि ब्रह्मा के युग की गणना है तो वह हर क्षण अवतार ले रहा है।
  _हर जीव कंकण, पत्थर नित्य बन रहे हैं और उसी काल के गाल मे समा भी रहे हैं, और क्योंकि हमने बुद्धि को ऐसी स्वतन्त्रता दी ही नही है जो पूर्वाग्रहमुक्त हो, उद्वेगरहित हो, पक्षपाती न हो और श्रेष्ठता का भाव न हो, यही धर्म तो बताया है शास्त्रों ने।_
    गीता अध्याय १६/२ और १६/३/ मे कृष्ण ने धर्म की बात की है, जिसका पालन, संचालन और नियंत्रण वह अपने धर्म के अनुसार कर रहा है, केवल हम उसके धर्म के विपरीत चल रहे है और दोष परमात्मा को देते हैं।
     _गीता मे एक बात और कही है,,तदात्मानं सृजाम्यहम्,,(अ०/४/७) क्या अर्थ है इसका? तद्=उस, आत्मानम्=आत्मा (स्वयं को) गीता/१०/२०। सृजाम्यहम्=सृजन कर लेता हूँ, यहाँ,,अहम्=मै यानी श्रीकृष्ण(आकर्षणबल) स्वयं वैसा सृजित हो लेता हूँ। ध्यातव्य यह है कि वही सर्वशक्तिमान् है इसलिए वैसा करने /होने सक्षम है, लेकिन हम तो नही हैं। बृ० उ०/१/२/२/ और तैत्ति०उ०/२/१) मे भी यही बात कही है, कृष्ण जैसा योगेश्वर जिसकी स्तुति हर क्षण देवगण करते हैं, जो स्वयं वेद है, वह वेदविरुद्ध ज्ञान कैसे दे सकता है? और यह  सृष्टि के आदि यानी लगभग दो से पाँच अरब वर्ष की बात है, और जो युगे युगे कहा है वह ब्रह्मा (प्रजापति) के युगों की बात है , यहाँ कृष्ण ने अपने सिस्टम की बात कही है, सृजन का नियम बताया है, न कि अवतार लेने की बात कही है।_
       सृजाम्यहम् शब्द अवतार से ज्यादा व्यापक अर्थ मे है, इसलिए हम मूर्ख आदमी वैसा अर्थ करने मे समर्थ नही है, जैसा अवतारवादी करके संसार को ज्ञान देते हैं।
 _आत्मा केवल पृथिवी ही बल्कि समस्त ब्रह्माण्डों का सृजनहार है।_

[चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें