सुधा सिंह
सुनो मेरे जन्मों के साथी,
न्यायमूर्ति के सामने पेश होने से पहले
तुम्हें आना होगा मेरे बाबा के आँगन में,
आम, जामुन, पलाश से सजे
मण्डप वाले उसी आँगन में
जहाँ तुम अपने बन्धु बान्धवों के साथ आ कर
अपनी अर्द्धांगिनी के रूप में मुझे स्वीकार किया था
तुम्हें पेश होना होगा
धरती, आकाश, जल, अग्नि
और दसों दिशाओं के सामने
जिन्हें साक्षी मान कर
तुमने बड़े प्यार से
मेरा हाथ अपने हाथों में थामा था
कभी न अलग होने के लिए
तुम्हें पेश होना होगा,
चाँदनी में नहाये चाँद और
तारों भरी रात के सामने
जिन्हें साक्षी मान कर
तुमने सात फेरों के साथ साथ
सप्तपदी के सात वचन भी लिये थे
तुम्हें पेश होना होगा
मेरे बाबा के सामने
जिन्हें तुमने
विश्वास दिलाया था कि
उनसे भी ज्यादा प्यार
उनकी बेटी को तुमसे मिलेगा
तुम्हें पेश होना होगा
उस भाई के सामने
जिसने एक पल के लिए भी
जल की धार इसलिए नहीं टूटने दी
कि मेरी बहन की मान, मर्यादा और अधिकार
अब सुरक्षित हाथों में जा कर बना रहे
अब तुम्हीं बताओ साथी
जब मिलन के साक्षी ये सब लोग थे
तो विच्छेद के समय मैं न्यायालय क्यूँ जाऊँ
क्योंकि
हमारे विवाह के साक्षी ना तो न्यायाधीश थे
और ना ही न्यायालय
मुझे हँसी आती है
और तरस भी उस औरत पर
जिसने तुम्हें ले कर
कितनी उम्मीदें लगायी है
कैसे बताऊँ उसे कि
कल तक मुझे पा कर अपने भाग्य पर
इठलाने वाले,
“तुमसे अच्छी औरत कोई हो ही नहीं सकती”
ऐसे जुमले बोलने वाले
तुम गिरगिट से भी ज्यादा
रङ्ग बदलते हो
बस इतनी प्रार्थना है ईश्वर से कि
मेरे विच्छेद के बाद भी
दूसरी औरत कही जाने वाली
उस औरत के बाद
कोई तीसरी ना आये
मैं चाहती हूँ साथी कि
बस एक बार तुम आ जाओ
इस तरह जैसे हम कभी बिछड़ेंगे ही नहीं
और जब जाओ तो ऐसे जाओ
कि जैसे हम मिलेंगे ही नहीं





