
डॉ. विकास मानव
(मनोचिकित्सक, ध्यानप्रशिक्षक, निदेशक : चेतना विकास मिशन)
*पूर्व कथन :*
आप गर्भ में नहीं थे तो कहाँ थे? शुक्राणु में. उसके पहले? शून्य में. शून्य से पहले मनुष्य या किसी अन्य योनि में. अब ये शरीर आपका साथ छोड़ देगा तब आप कहां होंगे? जन्म और बचपन से कफ़न तक का यह शरीरों की यात्रा जीवन की यात्रा हुई या मृत्यु की?
आप जो कुछ किये, कर रहे हो, करोगे : सब अपने या गैर के इस शरीर के लिए और शरीरों की पहचान से बने संबंधों के लिए. आप खुद के लिए कुछ क्यों नहीं करते? सबसे पहले तो आप हैं कौन : जी हाँ, आप शरीर में हैं, शरीर नहीं हैं. तो खुद के प्रति सक्रियता आपका पहला कर्तव्य है. जो खुद का नहीं हो सकता, वो किसी का नहीं हो सकता. ध्यान आपको आपसे मिलाता है, आप परमानंद अर्जित करते हैं. यही चाहिए ना सबको? तो अर्जित करें, तभी तो दे सकेंगे. यह हुई एक बात.
दूसरी बात यह की ध्यान लेखन, भाषण, प्रवचन या ऑनलाइन नौटंकी का सब्जेक्ट नहीं है. ध्यान वैयक्तिक और एकांतिक साधना का सब्जेक्ट है. सतगुरु जग्गीबसुदेव, ओशो, बाबा रामदेव या किसी को भी ले लो : चंद दिनों का चार्ज बीसियों हजार. धर्म, ध्यान,भगवान तक को बेचने वाले ऎसे सैतान मूलतः अपनी व्यापारिक इंडस्ट्री ही तो ख़डी करते हैं? आज तक किसी को वह स्टेज इनसे मिला — जो ध्यान से मिलता है? नहीं मिला. प्रतिभागी के तन, मन, धन, आबरू पर बट्टा जरूर लगा. ध्यान विद्या का काम तमाम करके अपने नयस्थ स्वार्थ का मुकाम साधते हैं ये लोग.
ध्यान में निःसंदेह किसी सिद्धहस्त हस्ताक्षर के शक्तिपात से साधक/साधिका को गुजरना होता है, उसकी ऊर्जा लेनी होती है : लेकिन क्या व्यापारी और भोगी-बिलासी के पास यह शक्ति, यह ऊर्जा है? हम निःशुल्क सुलभ हैं. व्हाट्सप्प 9997741245 पर अपॉइंटमेंट लेकर केवल 15 दिन का हमारा शिविर अटेंड करें, इस दौरान खुद को सिर्फ़ मुझे दें. मंज़िल की, पूर्णत्व की, परमतृप्ति की चाबी लें — बिना कुछ भी दिए.
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_ध्यान एक यौगिक/प्रयोगिक प्रक्रिया है। ध्यानयोग की चरम उप्लब्धि है–समाधि यानी परम आनंद या मोक्ष। बिना समाधि को उपलब्ध हुए अन्तर्जगत् में प्रवेश नहीं किया जा सकता। अंतर्जगत का मतलब है–सूक्ष्म जगत। जब तक सूक्ष्म जगत में प्रवेश कर सूक्ष्म शरीर द्वारा साधना शुरू नहीं होती , तब तक अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। स्थूल शरीर से हज़ारों वर्ष साधना करते रहना कोई उपलब्धि नहीं है।_
केवल अपने को भ्रान्ति में डाले रहना है कि हम साधना कर रहे हैं। साधना करना और साधना करने का भ्रम पालना अलग-अलग है। जो व्यक्ति यह कहता है कि वह साधना करते हुए उस उच्च अवस्था को प्राप्त हो चुका है, जिसे समाधि की अवस्था कहते हैं, तो बहुत कुछ सम्भव है कि वह साधना-साधना कह कर साधना की मादकता में डूब जाने को ही साधना समझता हो।
_साधना और साधना समझने की मादकता में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। बहुत से साधक जो विद्वान नहीं है, केवल अन्ध- विश्वासी ही हैं, वह भजन- कीर्तन, पूजा-उपासना को ही साधना समझते हैं और उसी में मस्त रहते हैं।_
पूजा-उपासना, भजन-कीर्तन का अपना महत्त्व अवश्य होता है पर वह सब साधना नहीं होती। साधना होती है शरीर को साधना, प्राणों को साधना, मन को साधना और अन्त में आत्मा को साधना। सूक्ष्म शरीर से साधना करने को ही सही मायने में आध्यात्मिक साधना करने की शुरुआत कहते हैं।
_सूक्ष्म शरीर से साधना करते समय साधक का सूक्ष्म जगत के विभिन्न आयामों में प्रवेश स्वतः हो जाता है। सूक्ष्म जगत में प्रवेश होने पर साधक के भौतिक शरीर का अतिक्रमण हो जाता है। साधक को भारहीनता का बोध होना शुरू हो जाता है। इसका एकमात्र कारण है–भूतत्व (पृथ्वी तत्व) का अतिक्रमण होना।इस स्थिति में साधक का समय का बोध लुप्त हो जाता है। कब सवेरा होता है, कब साँझ होती है, कब क्या होता है–इन सबकी प्रतीति नहीं होती है ध्यानकर्ता को।_
भौतिक जगत का अस्तित्व साधक के लिए न के बराबर हो जाता है। सारा जीवन अंतर्मुखी हो जाता है। ध्यान की सीमा और अवधि बढ़ती जाती है। अन्त में एक ऐसी अवस्था आती है जब पूर्णतया समाधिस्थ हो जाता है वह। अब पहली बार सूक्ष्म शरीर में अपने अस्तित्व का बोध करता है साधक। स्थूल शरीर भी है और स्थूल जगत का भी है अस्तित्व–इन दोनों की स्मृति का अभाव हो जाता है उसके लिए, कारण कि स्मृति, बुद्धि और मन की परिधि में होती है और मन माइनस हो जाता है, एक प्रकार से लुप्त ही हो जाता है।
_मन की चार अवस्थाएं हैं–चेतन मन की अवस्था, अर्धचेतन मन की अवस्था, अचेतन मन की या अवचेतन मन की अवस्था और अ-मन की अवस्था। सारे अनुभव सारे बोध मन की तीन अवस्थाओं में ही होते हैं। जब मन की ‘अ-मन’ अवस्था उपलब्ध होती है तो मन का अस्तित्व लुप्त हो चूका होता है। मन के अस्तित्व के लुप्त होते ही सारे बोध समाप्त हो जाते हैं, सारी स्मृतियाँ भी अस्तित्व खो देती हैं। जब साधक की समाधि टूटती है तो उस समय आत्मा द्वारा की गयी सारी अनुभूतियाँ मन के सहयोग से मन के धरातल पर आकर स्मृतियों का रूप धारण कर लेती हैं._
मन के विभिन्न आयामों की सीमा में जो बोध होते हैं, उन्हें अनुभव कहा जाता है लेकिन आत्मा के द्वारा जो बोध होते हैं, उन्हें ही हम अनुभूतियों की संज्ञा दे सकते हैं। यह ही अन्तर है मन के अनुभवों में और आत्मा के द्वारा की गयी अनुभूतियों में।
_आत्मा द्वारा जो भी अनुभूतियाँ होती हैं, उन सब का वर्णन कर पाना बुद्धि और मन के वश की बात नहीं है, फिर भी जो कुछ जितना भी सामर्थ्य मन में होता है, उसी के अनुसार आत्मा द्वारा की गयी अनुभूतियाँ मन के पटल पर स्मृति के रूप में अंकित हो जाती हैं जिनका वर्णन साधक अपने शब्दों में एक सीमा में कर देता है।_
समाधि की अवस्था में उपलब्ध रहस्यमय और अप्रकट ज्ञान भण्डार को वाणी का रूप देना सम्भव उसी के लिए है, जिसने सभी आध्यात्मिक विषयों का जीवन में गहनतम अध्ययन, चिन्तन और मनन किया हो। जो व्यक्ति केवल भक्ति मार्ग से समाधि को उपलब्ध होता है, ज्ञानमार्ग का उसने जीवन में कभी अनुसरण नहीं किया है, उसे समाधि में सारे बोध तो होंगे लेकिन समाधि भंग होने की स्थिति में समाधि की अनुभूतियों का वर्णन वह अपनी वाणी द्वारा नहीं कर सकता।
_अब तक इस संसार में जितने भी गूढ़, गोपनीय और रहस्यमय विषय अवतरित हुए हैं, वे सब समाधि की अवस्था में ही अवतरित हुए हैं जिन्हें ‘ऋतम्भरा’ वाणी द्वारा सर्वप्रथम ऋषियों ने सूत्रों का रूप दिया था._
इन्हें समझ पाना सर्वसाधारण के वश की बात नहीं है, लेकिन आपके वश की बात है. इसलिए की आप हमसे जुड़े होने के कारण असाधारण हैं।
*शरीर में तीन महत्वपूर्ण केंद्र :*
_योग-साधना स्थूल शरीर से शुरू होकर आत्मा तक की अंतरंग साधना-यात्रा है और वह भी एक जन्म में नहीं पूरे चौदह जन्म लग जाते हैं पूर्ण होने में उसे। मनुष्य शरीर में तीन महत्वपूर्ण केंद्र हैं। उन्हीं से आत्मा का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है और उसी से जीवन हर पल संचालित रहता है। यदि उन केंद्रों का ज्ञान साधक को नहीं है तो वह क्या खाक साधक है ? किस बात का साधक है वह ? उसकी साधना कभी भी सफल नहीं हो सकती–यह निश्चित है और यह भी निश्चित है कि साधक कभी भी आत्म-तत्व को उपलब्ध नहीं हो सकता।_
स्थूल शरीर में उन महत्वपूर्ण केंद्रों में पहला केंद्र है–‘मस्तिष्क’। वैसे यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो मस्तिष्क का सम्बन्ध ‘मन’ से है। मन का कार्यक्षेत्र मस्तिष्क है। मस्तिष्क के लिए मन महत्वपूर्ण है। मन के माध्यम से मस्तिष्क का सम्बन्ध आत्मा से है। मस्तिष्क और आत्मा के बीच मन है।
_ह्रदय दूसरा केंद्र है। प्राणों के माध्यम से ह्रदय का सम्बन्ध आत्मा से है। ह्रदय और आत्मा के बीच ‘प्राण’ हैं।_
तीसरा केंद्र है–नाभि। नाभि से आत्मा का सम्बन्ध सीधा है। उन दोनों के बीच किसी की मध्यस्थता नहीं है। मानव शरीर को जीवन-प्रवाह जहाँ से मिलता है, वह है–नाभि और यही कारण है कि नाभि केंद्र सबसे पहले विकसित होता है शिशु का।मानव शरीर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण बिन्दु नाभि है। गर्भावस्था में इसी बिन्दु से शिशु का सम्बन्ध माता के प्राणों से, चेतना से और जीवन से जुड़ा हुआ रहता है।
*ज्ञान, कृपा, करुणा, प्रेम, स्नेहादि का जन्म :*
मस्तिष्क और मन के संयोग से ज्ञान, बुद्धि, विवेक, प्रज्ञा और विचार का जन्म होता है। ह्रदय और प्राणों के संयोग से प्रेम, स्नेह, दया, कृपा, करुणा, अनुकम्पा आदि का जन्म होता है ह्रदय में और यही एकमात्र कारण है कि मनुष्य मस्तिष्क और ह्रदय पर सर्वाधिक बल देता रहता है।
_जितनी भी शिक्षाएं हैं, वे सब मस्तिष्क की शिक्षाएं है। सारा ज्ञान मस्तिष्क का ज्ञान है। नाभि पर किसी का ध्यान नहीं जाता और जाता भी है तो बहुत कम। अन्य केंद्रों से सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र नाभि को मानते हैं योगी और साधकगण। सभी प्रकार के लोगों का जीवन मस्तिष्क में हीे उलझा हुआ रहता है। मस्तिष्क की ही परिक्रमा करता रहता है वह।_
नाभि सम्पूर्ण शरीर का केंद्र-बिन्दु है। योगी और साधकों की साधना धारा सर्वप्रथम मस्तिष्क से प्रारम्भ होकर ह्रदय केंद्र पर आती है और वहां से आती है नाभि- केंद्र पर। नाभि-केंद्र एक ओर तो आत्मा से जुड़ा हुआ है और दूसरी ओर जुड़ा हुआ है ह्रदय से भी। मनुष्य को प्राण-ऊर्जा प्राप्त होती है नाभि से।
_इसलिए कि नाभि का आतंरिक सम्बन्ध ह्रदय से है। गर्भस्थ शिशु की नाभि से निकल कर एक नाड़ी जिसे योग की भाषा में ‘पीयूष नाड़ी’ कहते हैं, माता के ह्रदय से जुडी हुई रहती है। इसी रहस्यमयी नाड़ी के द्वारा शिशु प्राण-शक्ति और उस प्राण-शक्ति के माध्यम से जीवनी-शक्ति बराबर प्राप्त करता रहता है।_
मानव सभ्यता जैसे-जैसे विकसित होती गयी, वैसे-ही- वैसे मनुष्य मस्तिष्क को अधिक-से-अधिक महत्त्व देता चला गया। मस्तिष्क उसके लिए मुख्य हो गया।
शरीर का मूल्य कम तथा मस्तिष्क का मूल्य सर्वाधिक हो गया उसकी दृष्टि में लेकिन मनुष्य को यह समझना चाहिए कि मस्तिष्क को मुख्य मानना और उसे महत्त्व देना सर्वाधिक घातक सिद्ध हो रहा है वर्तमान समय में उसके लिए–इसमें सन्देह नहीं।
*मस्तिष्क के अत्यधिक विकास का परिणाम :*
_वर्तमान समय में एक पूर्ण योग्य और पूर्ण विवेकशील व्यक्ति का दर्शन दुर्लभ हो गया है और यही एकमात्र कारण है कि आज का प्रत्येक व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर है, उद्भ्रान्त है और है– तनावग्रस्त। वह क्या करना चाहता है और कर क्या रहा है–इसका होश उसे नहीं और यही एकमात्र कारण है कि इस समय जितने भी रोग और जितनी भी व्याधियां हैं, उनमें अस्सी प्रतिशत मन से सम्बंधित हैं, शरीर से नहीं। यदि भविष्य में भी ऐसी ही स्थिति रही तो एक दिन ऐसा आएगा जब सौ प्रतिशत लोग मानसिक रूप से रुग्ण हो जायेंगे।_
महाभारत काल में तीनों केंद्रों का उपयोग होता था समय-समय पर। उसके बाद मानव जीवन, मानव सभ्यता और मानव संस्कृति में भारी परिवर्तन हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि मनुष्य का ध्यान नाभि केंद्र से हट गया और केंद्रित हो गया मस्तिष्क केंद्र और ह्रदय केंद्र पर। इसके फलस्वरूप आध्यात्मिक उन्नति हुई और अध्यात्म से सम्बंधित योग, तंत्र आदि का विकास हुआ और उन पर आधारित हज़ारों ग्रन्थों की भी रचनाएँ हुईं।
_कालान्तर में सर्वाधिक भक्ति और प्रेम रस का भी विकास हुआ जिसका परिणाम यह हुआ कि रस, प्रेम, श्रृंगार, सौंदर्य, त्याग आदि का आश्रय लेकर विभिन्न प्रकार के काव्यों की रचना कवियों ने की लेकिन नाभि केंद्र का उपयोग बहुत कम होता गया। इसका भी परिणाम सामने आना ही था और वह आया पतंजलि, बुद्ध, महावीर आदि जैसे कुछ ही योगी प्रत्यक्ष रूप में संसार को अपने-अपने ज्ञान से प्रकाशित कर सके, इससे अधिक नहीं।_
*मस्तिष्क के विकास का परिणाम :*
पिछले 500 वर्षों में मनुष्य ने सर्वाधिक उपयोग मस्तिष्क का किया है और अभी भी कर रहा है जिसके परिणामस्वरुप प्रबल रूप से ज्ञान-विज्ञान का विकास हुआ और उसके प्रत्येक क्षेत्र की उन्नति हुई। लेकिन मनुष्य को यह ज्ञात होना चाहिए कि मस्तिष्क अत्यन्त नाजुक अंग है और ऐसे नाजुक अंग पर पिछले 500 वर्षों से इतना भार बराबर दिया जा रहा है कि अब तक मस्तिष्क के तन्तु टूटकर बिखरे क्यों नहीं ?–यह आश्चर्य की बात है।
_सोचने की बात है कि मानव मस्तिष्क पर कितना भार पड़ता है–दुःख का भार, कष्ट का भार, चिन्ता का भार, शोक का भार, रोग का भार, शिक्षा का भार, ज्ञान का भार यहाँ तक कि सम्पूर्ण जीवन का भार।_
मस्तिष्क में अरबों-खरबों कोशिकाएं हैं और लगभग सात करोड़ सूक्ष्म तन्तु हैं। इसीसे समझ लेना चाहिए कि मस्तिष्क कितना नाजुक है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि उन सात करोड़ तन्तुओं से पृथ्वी को नापा जाय तो पूरी पृथ्वी का व्यास उसके अन्दर आ जायेगा। इतने सूक्ष्म हैं वे तन्तु।
_मस्तिष्क पर सर्वाधिक भार विचारों का पड़ता है ।विचारों का भार जब अपनी सीमा से अधिक हो जाता है तो मनुष्य को पागल बनने में देर नहीं लगती। अत्यधिक विचार करने पर जीवन की जो धारा है वह मस्तिष्क के चारों ओर घूमने लगती है। एक साधक उसी जीवन-धारा को अपनी विशेष साधना-बल से नीचे उतारने का प्रयास करता है। लेकिन यह तभी सम्भव है जब वह शरीर- विज्ञान से सम्बंधित आवश्यक ज्ञान प्राप्त किये हुए होता है।_
*शरीर के प्रति दो दृष्टियां हैं :*
वे दो दृष्टियां हैं–भोग दृष्टि और त्याग दृष्टि। जो इन दोनों से ऊपर उठ जाता है अर्थात्–न भोग और न त्याग, वही साधक सफल होता है।
_जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, जो भी महत्वपूर्ण है और जो भी उपलब्ध करने योग्य है, उसका मार्ग शरीर के भीतर है और जो उस मार्ग से भली– भांति परिचित है, वही जीवन- धारा को नाभि-केंद्र तक ले जा सकने में समर्थ है।_
*ध्यान, प्रेम और शान्ति :*
साधना के सम्बन्ध में बहुत-सी ऐसी बातें हैं जिनसे बहुत ही कम लोग परिचित हैं। पहले मस्तिष्क को ही ले लें–यह पहला केंद्र है। मस्तिष्क हर वक्त तनावग्रस्त रहता है यहाँ तक कि निद्रा-काल में भी। मनुष्य पूरे दिन जो भी कार्य करता है, वही कार्य वह निद्रा-काल में भी करता है। पूरे दिन का प्रतिविम्ब रात्रि है।
_दिनभर मानस-पटल पर विचारों की, भावों की, कार्यों की और अनुभवों की जो छाया बराबर पड़ती रहती है, उसीकी प्रतिध्वनि अथवा प्रतिच्छाया निद्रा-काल में बराबर उभरती रहती है। मनुष्य का जो काम दिन में पूरा नहीं हुआ रहता है, उसे मन निद्रा-काल में पूरा करने का प्रयास करता है। दिनभर व्रत-उपवास रखने वाला व्यक्ति निद्रा-काल में स्वप्न में भोजन करता है।_
दिन के अभाव की पूर्ति इस प्रकार निद्रा-काल में हो जाती है। नारी-सुख से वंचित मनुष्य स्वप्नावस्था में नारी-सुख प्राप्त कर अपने को संतुष्ट कर लेता है। जाग्रत अवस्था में जिस वस्तु का अभाव रहता है, उस अभाव की पूर्ति स्वप्नावस्था में स्वयं हो जाती है।
_अब ह्रदय को लीजिये। मस्तिष्क की तरह वह भी हर समय तनावग्रस्त रहता है। हर समय वह घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष आदि से भरा रहता है। प्रेम क्या है, स्नेह क्या है, दया क्या है, करुणा क्या है ?–इन सबको एक प्रकार से मनुष्य जानता ही नहीं। उनसे विपरीत जो कुछ भी है, उनसे वह परिचित है।_
ह्रदय एक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र है। उसमें एक ही काल में और एक ही अवस्था में एक ही वस्तु रह सकती है, दूसरी नहीं–या तो प्रेम रहेगा या घृणा रहेगी। लेकिन मनुष्य अपने एक ही ह्रदय में दोनों काम करता है। कभी प्रेम करता है वह तो कभी घृणा। वह भली-भांति न प्रेम से परिचित है और न तो पूर्णरूप से घृणा से ही। यदि पूर्णरूप से वह प्रेम से परिचित होता तो उसके ह्रदय में कभी घृणा उत्पन्न नहीं हो सकती।
_प्रेमपूर्ण ह्रदय में घृणा का भाव कभी रह ही नहीं सकता। जरा सोचने की बात है ऐसा क्या कोई ह्रदय है जो प्रेम भी करे और घृणा भी। सच्चा ह्रदय बस एक को जानता है–प्रेम को या फिर घृणा को। यदि वह दोनों को जानता है तो वह ह्रदय नहीं है, पशु है। पशु के पास ह्रदय नहीं होता। ह्रदय का वास्तविक गुण है–प्रेम। प्रेम के वृक्ष पर ही दया, कृपा, करुणा, प्रेम, स्नेह आदि के सुगन्धित फूल खिलते हैं समय-समय पर।_
जिसको मनुष्य प्रेम समझता है, वह वास्तव में प्रेम नहीं होता। सच तो यह है कि मनुष्य के ह्रदय में प्रेम नाम की वस्तु है ही नहीं। घृणा के भाव के कम हो जाने को ही वह प्रेम समझता है। आजकल जो प्रेम दृष्टिगोचर होता है, वह प्रेम नहीं, वासना है। सच्चे प्रेम में वासना, कामना, स्वार्थ की भावना लेशमात्र भी नहीं रहती।
_प्रेम कुछ पाना नहीं चाहता, सदा देना ही चाहता है। प्रेम में हमेशा दूसरे का ध्यान रहता है, स्वयं का नहीं। ऐसे प्रेमपूर्ण ह्रदय में घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष रह ही नहीं सकते।_
प्रेम के बाद है आनन्द। मनुष्य ने अपने जीवन में क्या कभी आनन्द का अनुभव किया ? यह कहना कठिन है कि किसी ने प्रेम और आनन्द का कभी अनुभव किया है और कभी किया है शान्ति का अनुभव ? मनुष्य अब तक जिसको जानता-समझता आया है, वह है अशान्ति।
_अशान्ति की मात्रा जब कभी जीवन में कम हो जाती है, उसे ही वह शान्ति समझ लेता है। लेकिन वह वास्तविक शान्ति है ही नहीं। इसी प्रकार वह घृणा को जानता है, प्रेम को नहीं। वह ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध को जानता है, प्रेम, करुणा, दया और शान्ति को नहीं। एक परम योगी का ह्रदय ऐसा ही होता है–स्नेह, प्रेम, करुणा, दया, आनन्द और शान्ति से परिपूर्ण और उनकी सुगंधों से भरा-भरा।_
*मस्तिष्क और ह्रदय तनाव से मुक्त कैसे हो :*
एकमात्र ध्यान से ही मस्तिष्क और ह्रदय तनावमुक्त रह सकते हैं। जैसे-जैसे ध्यान गहन से गहनतम होता जायेगा, वैसे-ही-वैसे दोनों केंद्रों के तनावों से मुक्त होता जायेगा।
_मस्तिष्क और ह्रदय दोनों स्वच्छ और निर्मल होते जायेंगे। अन्त में एक ऐसी अवस्था आ जायेगी जब व्यक्ति का मस्तिष्क और ह्रदय एक परमयोगी का मस्तिष्क और ह्रदय बन जायेगा।_
*नाभि का विकास आवश्यक :*
नाभि सबसे महत्वपूर्ण है और इसलिए महत्वपूर्ण है कि शिशु नाभि से जन्म लेता है और इसलिए कि जीवन का जो परम सत्य है, उसमें प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग नाभि ही है। जीवन के वास्तविक सत्य से परिचित होने के लिए एकमात्र साधन नाभि को ही बतलाया गया है।
_मनुष्य दिनभर फेफड़े से श्वास लेता है लेकिन रात्रि में सोने के बाद वह श्वास लेता है नाभि से। जरा यह समझने की बात है। दिन में फेफड़े से श्वास लेने के कारण मनुष्य की छाती सिकुड़ती-फैलती है, जबकि निद्रावस्था में नाभि से श्वास लेने के कारण पेट फूलता-पिचकता है। कहने के लिए तो हम हमेशा यही कहते-समझते हैं कि मनुष्य फेफड़े से ही सदैव श्वास लेता है पर कुछ बातें मनुष्य के अधिकार में नहीं होतीं।_
मनुष्य के शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं जिन पर साधारण मनुष्य का अधिकार नहीं होता। फेफड़े दिन-रात कार्य करते हैं, मस्तिष्क दिन-रात कार्य करता है, उसका हृदय दिन-रात कार्य करता है, उसका पाचन-तंत्र और आंतें दिन-रात कार्य करती हैं और इसी तरह उसकी नाभि भी दिन-रात कार्य करती रहती है।
_मनुष्य के मस्तिष्क का अधिकार उसके हाथ, पैर, नेत्र, जीभ, मुख, कान आदि इन्द्रियों पर तो है, पर कुछ वस्तुएं उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। वह जब चाहे नेत्र बंद कर सकता है, जब चाहे , नेत्र खोल सकता है। वह जब चाहे हाथ-पैर आगे बढ़ा सकता और जब चाहे पीछे को उल्टा चल सकता है। लेकिन मनुष्य के शरीर के कुछ अंग ऐसे हैं जिन पर मनुष्य का अधिकार नहीं है।_
उन पर अधिकार है प्रकृति का। तो जब मनुष्य रात्रि को निद्रा में बेहोश होता है, उस समय उसका श्वास प्रकृति की संचालन शक्ति(आत्मचेतना) चलाती है जिसका माध्यम होती है–नाभि।
_बच्चा अपने जन्म से लेकर पांच वर्ष की आयु पर्यन्त नाभि से ही श्वास लेता है। पांच वर्ष के बाद उसके श्वास की गति धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठने लग जाती है और उसी के अनुसार उसकी नाभि का कम्पन कम होने लगता है और फेफड़े का कम्पन बढ़ने लगता है। प्रकृति के कार्य में त्रुटि नहीं होती है। जब तक शिशु प्रकृति के अधीन है और वह नाभि से श्वास लेता है तब तक उसके श्वास के लेने की प्रक्रिया सही रहती है।_
लेकिन धीरे-धीरे मनुष्य जब बड़ा होने लगता है तो नाभि का प्रयोग घटता जाता है और फेफड़े का प्रयोग बढ़ता जाता है और इसीलिए यदि देखा जाय तो मनुष्य आलसवश ठीक से श्वास फेफड़ों में नहीं भरता है। उसकी स्वाभाविक श्वास छोटी होती है। श्वास के द्वारा हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) अपने भीतर खींचते हैं जिससे हमारा जीवन चलता है। शरीर, उसकी असंख्य धमनियाँ, अरबों-खरबों कोशिकाएं ऑक्सीजन के द्वारा शुद्ध होकर अपना कार्य सुचारु रूप से करती रहती हैं।
_लेकिन मनुष्य है कि वह ठीक से श्वास भी नहीं लेता। आधा-अधूरा श्वास भरता है वह फेफड़ों में जिसका परिणाम यह होता है कि पहले तो प्राणवायु पूरे फेफड़ों में नीचे तक नहीं पहुँच पाता और फेफड़े अस्वस्थ होकर रुग्ण रहने लगते हैं। फेफड़े रुग्ण होने पर वे ह्रदय द्वारा अशुद्ध रक्त को ठीक से साफ नहीं कर पाते हैं। परिणाम यह होता है कि मनुष्य के शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम होते जानेे से वह सदैव रुग्ण रहने लगता है।_
शरीर में शुद्ध रक्त-संचालन होता रहे, सारे अंगों में, धमनियों में, कोशिकाओं में शुद्ध रक्त पहुँचता रहे–इसके लिए आवश्यक है सहज श्वास, दीर्घ श्वास। हमारे योगियों ने, ऋषियों ने इसीलिए प्राणायाम का महत्व बतलाया है।
*नाभि का कम्पन :*
नाभि का कम्पन उस समय बढ़ जाता है जिस समय मनुष्य भयभीत होता है, अचानक डर जाता है, अचानक कोई संकट सामने आ जाता है, अचानक मृत्यु की आशंका उपस्थित हो जाती है, किसी दुर्घटना का आभास लग जाता है। उस समय सबसे पहले नाभि के स्थान पर ‘धक्’ की ध्वनि के साथ कम्पन बढ़ जाता है। मनुष्य के डर का, भय का, वासना का स्थान नाभि ही है।
_अतः नाभि के कम्पन बढ़ जाने से ह्रदय का भी संचालन तेज होने लगता है। दिल ‘धक्-धक्’ कर तेज-तेज धड़कने लगता है और उसी के साथ मनुष्य का मस्तिष्क भी प्रभावित हो जाता है। कभी-कभी तो मस्तिष्क का सन्तुलन भी बिगड़ जाता है। यदि वह इस समय किसी वाहन को चला रहा है तो दुर्घटना की आशंका बढ़ जायेगी। इसके कारण के पीछे है–नाभि का अधिक कम्पन।_
जैसे मस्तिष्क और ह्रदय को स्वच्छ, निर्मल और विकसित करने के लिए ध्यान आवश्यक है, इसी प्रकार नाभि को विकसित करने के लिए और उसके द्वारा अधिक-से-अधिक आत्म-चेतना ग्रहण करने के लिए भी साधन है और वह साधन है सभी प्रकार के भय से मुक्ति अर्थात् ‘अभय की साधना’।
_मनुष्य जितनी अभय की साधना करेगा, उतना ही वह भय से मुक्त होता जायेगा, और उतनी ही उसकी नाभि विकसित होती जायेगी। जितनी उसकी नाभि विकसित होगी, उतना ही वह गहराई में प्रवेश करता जायेगा और उतना ही वह आत्म-चेतना को भी होगा उपलब्ध। इन तीनों केंद्रों की साधना कैसे सम्भव है ? एकमात्र ध्यान से।_
*ध्यान के तीन चरण :*
_तीनों केंद्रों से सम्बंधित ध्यान के तीन चरण हैं :_
*प्रथम चरण-*
प्रथम चरण में अपनी दोनों भौंह के मध्य नीलज्योति का ध्यान करना चाहिए। नीलज्योति का सम्बन्ध मस्तिष्क से है। जौ के आकार की नीलज्योति की कल्पना करके उसी पर मन को केंद्रित करना चाहिए। इस ध्यान का सम्बन्ध रात्रि के अन्धकार से। रात्रि का समय हो, एकान्त स्थान हो, हल्का-हल्का अँधेरा हो।_
उस समय मस्तिष्क में किसी भी प्रकार के विचारों को न आने दें क्योंकि विचारों के कारण ही मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न होता है। विचारों को उत्पन्न न होने देना या न आने देना अत्यन्त कठिन कार्य है। इसके अभ्यास के लिए कुछ दिन दीर्घ श्वास जोर-जोर से भरना चाहिए और जोर से छोड़ना भी चाहिए। इसका परिणाम यह होगा कि आप थक जायेंगे।
_थकने से आपके मस्तिष्क की मांसपेशियां, स्नायु तन्तु और नस-नाड़ियां शिथिल हो जाएँगी और जब मस्तिष्क शिथिल होगा तो वह अपने अन्तराल में, अपने आप डूबने लगेगा। ध्यान के समय मस्तिष्क को हल्का और शिथिल छोड़ना आवश्यक है। जब आपका अभ्यास हो चुकेगा तो इसे आप बंद कर सकते हैं।_
मस्तिष्क को शिथिल कर ध्यान का यह प्रथम चरण पूरे एक वर्ष नित्य करना चाहिए। हाँ, एक बात का ध्यान रहे– ध्यान के स्थान और समय में परिवर्तन नहीं होना चाहिए।(इसके पीछे एक रहस्य है और वह रहस्य यह है–जिस समय आप ध्यान करते हैं और गहराई में डूबते हैं, उस समय आपके मस्तिष्क से कुछ विद्युत् चुम्बकीय तरंगे निकलती हैं जो आपके ध्यान के स्थान पर चारों और बिखरती रहती हैं।
_उन विद्युत् चुम्बकीय तरंगों से आपके मस्तिष्क का सम्बन्ध होता है, इसलिए जब उस स्थान पर आप दुबारा ध्यान लगाने बैठते हैं तो पूर्व से बिखरी हुई तरंगों के संयोग से शीघ्र ही आपका मस्तिष्क ध्यानस्थ हो जाता है)।_
ध्यान के समय शरीर पर हलके नीले रंग का वस्त्र हो, आसन भी नीले रंग का ऊनी हो और चौकोर हो। आसन को भूमि पर रखकर उस पर बैठना चाहिए। अच्छा हो यदि आसन के नीचे एक चौकोर चौकी हो, इससे आपके और भूमि के बीच थोड़ी दुरी बढ़ जायेगी और भूमि का गुरुत्वाकर्षण बल आपके शरीर की ऊर्जा को आकर्षित नहीं कर पायेगा। निस्तब्ध वातावरण हो, किसी भी प्रकार की कोई आवाज़ न हो।
_मस्तिष्क जितना शिथिल होगा, उतना ही वह संवेदनशील होगा। जैसे-जैसे काल्पनिक नीलज्योति पर आपका ध्यान प्रगाढ़ होता जायेगा, वैसे-ही-वैसे आप अपने भीतर अनिर्वचनीय शान्ति का अनुभव करने लग जायेंगे। कुछ ही अवधि के बाद वह काल्पनिक नीलज्योति साकार हो उठेगी आपके भ्रूमध्य में। जौ के आकार में वह नीलवर्णा ज्योति प्रज्ज्वलित दिखलायी देने लगेगी ध्यानावस्था में।_
*द्वितीय चरण :*
ध्यान के दूसरे चरण में ह्रदय के मध्य पीले रंग की जवाकृति ज्योति की कल्पना कर उस पर ध्यानावस्था में मन को केंद्रित करना चाहिए। ध्यान के समय ह्रदय को हल्का और शिथिल रखना चाहिए। किसी भी प्रकार का भाव वहां नहीं रहना चाहिए। जिस प्रकार मस्तिष्क में तरह-तरह के विचार होते हैं, उसी प्रकार हृदय में भी तरह तरह के भाव होते हैं। ध्यान के समय किसी भी प्रकार का भाव न रहे। जैसे-जैसे काल्पनिक पीली ज्योति पर ध्यान एकाग्र होगा, वैसे-ही- वैसे मन प्रगाढ़ होगा और उसी के साथ एक विशेष प्रकार के आनंद की अनुभूति ह्रदय में होगी।
_उसी अनिर्वचनीय आनंद को ‘सहजानन्द’ की संज्ञा दी गयी है योग में। समय आने पर ध्यान की परिपक्वावस्था में वह काल्पनिक ज्योति भी जवाकृति रूप में प्रज्ज्वलित हो उठेगी जिसका वर्ण पीला होगा।_
*तृतीय चरण :*
ध्यान के तृतीय चरण में नाभि केंद्र जवाकृति शुभ्रज्योति का ध्यान करना चाहिए। जैसे- जैसे मन की एकाग्रता बढ़ती जायेगी और ध्यान गहरा होता जायेगा, वैसे-ही-वैसे ध्यान का विकास होता जायेगा आत्म-चेतना के भीतर और जब प्रत्यक्ष रूप से यह अनुभव होने लगे कि काल्पनिक शुभ्रज्योति साकार होकर प्रज्ज्वलित हो गयी है तो समझ लेना चाहिए कि तीसरे नाभिकेंद्र की साधना पूरी हो गयी है।
_लेकिन ध्यान बराबर होते रहना चाहिए क्योंकि एक समय ऐसा आएगा कि वही ध्यान पूर्णतया प्रगाढ़ होकर समाधि में परिवर्तित हो जायेगा जिसे योग की भाषा में ‘सहज समाधि’ कहते हैं।_
सहज समाधि वास्तव में ध्यान का ही प्रगाढ़ रूप है। योग के अनुसार सहज समाधि की अवस्था को उपलब्ध होते ही साधक का सीधा सम्बन्ध ‘चैतन्य’ से स्थापित हो जाता है। जैसे ध्यान का अभ्यास करते-करते वह सहज हो जाता है, वैसे ही वह समाधि भी सहज हो जाती है। इसीलिए तो उसे ‘सहज समाधि’ कहते हैं। सहज समाधि न समय देखती है और न देखती है स्थान। वह कभी भी और किसी भी अवस्था में लग जाती है।
_सहज समाधि की अवस्था में साधक की बाह्य चेतना कुछ समय के लिए लुप्त हो जाती है और अंतर्चेतना हो उठती है जाग्रत। उस समय वह जिस आनंद की अनुभति करता है, उसे कहते हैं–‘आत्मानंद’।_
योग अति दुर्लभ और रहस्यमय वस्तु है लेकिन उसके गम्भीर रहस्य से कुछ ही लोग परिचित हो पाते हैं। वास्तव में योग अंतर्जगत का द्वार है वे द्वार उपर्युक्त तीनों केंद्र हैं जिनमें प्रवेश कर लोक-लोकान्तर ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व-ब्रह्माण्ड की भी यात्रा इसी स्थूल शरीर में रहते हुए की जा सकती है।
*कामवासना की आग का केंद्र नाभि :*
योग के अनुसार वास्तव में काम का केंद्र एकमात्र ‘नाभि’ है क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी ऊर्जा ‘काम-ऊर्जा’ है। इससे बड़ी ऊर्जा और कोई नहीं है विश्व में। इसी ऊर्जा से जन्म है, जीवन है और जीवन का विकास है। लेकिन हमारी नाभि अविकसित है। इसलिए दूसरे केंद्र से हम उसका काम लेना शुरू कर देते हैं। पशुओं में काम है लेकिन कामुकता नहीं है।
_मनुष्य का ‘काम’ कामुकता है और इसीलिए उसमें एक कुरूपता है क्योंकि वह काम चिन्तन का विषय बन गया है, मन में प्रवेश कर गया है। काम का स्थान नाभि होते हुए भी मन में प्रवेश कर गया। इसीलिए उसमें कुरूपता आ गयी है।_
जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है कि तीन केंद्र हैं–मस्तिष्क केंद्र, हृदय केंद्र और नाभि केंद्र। जीवन का केंद्र नाभि है। भावों का केंद्र हृदय है। विचारों का केंद्र है–मस्तिष्क। सबसे ऊपर है विचार का केंद्र, उससे गहरा केंद्र है भाव का और उससे भी गहरा केंद्र है प्राणों का।
_सैकड़ों वर्ष से मनुष्य ने जीवन का आधार बना लिया है–मस्तिष्क। सोचना-विचारना जीवन का एकमात्र आधार बन गया है। विचित्र बात है। धर्म कहता है–सोचना-विचारना जीवन का आधार नहीं बल्कि सोचने विचारने से मुक्त हो जाना अर्थात् निर्विचार हो जाना जीवन का आधार है। लेकिन हम हैं कि सोच-विचार से ही जीते हैं। वास्तव में हम मार्ग से भटक गए हैं।_
सोचने-विचारने से भोजन नहीं पचता, नाड़ियों में खून नहीं बहता, हृदय नहीं धड़कता, साँस नहीं चलती। कहने की आवश्यकता यह है कि जीवन की कोई महत्वपूर्ण क्रिया हमारे सोचने-विचारने से सम्बद्ध नहीं है। यदि गंभीरता से सोचा जाय तो जीवन की समस्त क्रियाएँ ज्यादा सोचने-विचारने से अवरुद्ध हो जाती हैं।
_गर्भावस्था में शिशु की नाभि से माता की नाभि के बीच एक विशेष प्रकार की विद्युतधारा प्रवाहित रहती है। वह विद्युतधारा क्या है ?–आज तक कोई समझ न सका। अपने जीवन में वह शिशु जब भी किसी ऐसी स्त्री के समीप पहुंचेगा जिसमें वैसी ही विद्युतधारा प्रवाहित हो रही हो जैसी उसकी माँ से प्रवाहित होती थी तो अनायास ही वह अनजाने सम्बन्ध से उस स्त्री से जुड़ जायेगा। वह अनजाना संबन्ध क्या है ? वह नाता-रिश्ता कैसा है ?_
कौन-सी है वह चीज़ जो दोनों को आपस में बांधती है। सच पूछा जाय तो उस अनजाने और अनदेखे सम्बन्ध का ही नाम ‘स्नेह’ है, प्रेम है, वात्सल्य है। यह सब हमारी समझ में नहीं आता। इसीलिए हम प्रेम को अँधा कह देते हैं। निश्चय ही प्रेम अँधा होता है। जैसे कान अँधा है, नाक अंधी है, जीभ अन्धी है और आँख बहरी है, वैसे ही प्रेम भी अँधा है।
_प्रेम का तल अत्यन्त गहरा है और वह गहरा तल क्या है ?–यह लोगों की समझ की सीमा के बाहर है। हमारे लिए यह समझना कठिन है कि प्रेम क्यों उत्पन्न होता है ? दो लोगों के बीच आकर्षण क्यों उत्पन्न होता है ? जैसे यह बात किसी को ज्ञात नहीं है, वैसे ही यह बात भी किसी को नहीं पता है कि दो लोगों के बीच विकर्षण क्यों पैदा हो जाता है ? क्यों आकर्षण है और क्यों विकर्षण है ?–इसका कारण बहुत खोजने पर भी दोनों को नहीं मिल पाता।_
*इसका कारण यह है :*
नाभि को प्रभावित करने वाली जो अज्ञात और रहस्यमस्यी विद्युतधारा यदि सजातीय है तो दोनों में अपने आप एक दूसरे के प्रति आकर्षण उत्पन्न हो जायेगा। वह आकर्षण स्वाभाविक होगा जिसके गर्भ से शुद्ध और निर्मल प्रेम का जन्म होता है। इसमें न कामना रहती है और न तो रहती है वासना ही।
_निश्चय ही वह प्रेम शरीर के तल का नहीं, मन के तल का भी नही, बल्कि आत्मा के तल का होता है। यदि वही विद्युतधारा सजातीय न होकर विजातीय है तो भयंकर विकर्षण उत्पन्न होगा। प्रेम की तो बात छोड़िये, जो जन्म लेगा वह होगी–वासना जिसे हम वसनाजन्य प्रेम भी कह सकते हैं जिसका परिणाम होगा–कलह, क्लेश, विद्रोह और अशान्ति।_
*तीन प्रकार के सम्बन्ध :*
मनुष्य के जीवन में तीन प्रकार के सम्बन्ध होते हैं :
1–बुद्धि के सम्बन्ध जो बहुत गहरे नहीं होते, शीघ्र टूट जाते हैं। गुरु और शिष्य में ऐसे ही सम्बन्ध होते हैं।
2– प्रेम के सम्बन्ध जो बुद्धि से अधिक गहरे होते हैं। ह्रदय के सम्बन्ध माता-पुत्र में, भाई-भाई में और पति-पत्नी में इसी प्रकार के सम्बन्ध होते हैं जो ह्रदय से उठते हैं।
3–इन सबसे अधिक गहरे सम्बन्ध होते हैं जो नाभि से उठते हैं।
_नाभि से उठने वाले सम्बन्ध को हम मित्रता या मैत्री कहते हैं। मैत्री प्रेम से भी अधिक गहरी होती है। प्रेम कभी टूट सकता है लेकिन मैत्री किसी भी स्थिति में टूट नहीं सकती। आज जिसे हम प्रेम करते हैं, कल उससे घृणा भी कर सकते हैं। लेकिन जो मित्र(सच्चा मित्र) है, वह कभी शत्रु नहीं हो सकता। मित्रता का सम्बन्ध नाभि से है।_
इसलिए भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों से यह कभी नहीं कहा कि प्रेम करो। उन्होंने सदैव यही कहा कि मैत्री करो। बुद्ध ने कहा–हमारे जीवन में मैत्री होनी चाहिए। मैत्री प्रेम से भी अधिक गहरी है। प्रेम भंग हो सकता है लेकिन मैत्री नहीं। प्रेम बांधता है, लेकिन मैत्री मुक्त करती है। यदि मित्रता किसी भी प्रकार टूट भी जाय तो समझो वह मित्रता नहीं थी। मित्र शत्रु बन जाय तो यह समझा जायेगा कि शत्रुता पहले से ही छिपी थी मित्रता के पीछे।
_मित्रता का सम्बन्ध नाभि से है जो गहरे लोक से सम्बंधित है। इसलिए बुद्ध ने कहा–मैत्री। प्रेम इसलिए बांधता है क्योंकि उसमें प्रेमियों का आग्रह होता है। एक व्यक्ति के हज़ारों मित्र हो सकते हैं क्योंकि मित्रता बड़ी गहरी और व्यापक अनुभूति है। जीवन के सबसे गहरे केंद्र से वह उत्पन्न होती है। इसलिए मित्रता अन्त में परमात्मा की ओर ले जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण मार्ग बन जाती है। प्रेमी का अनुरोध होता है कि जिससे वह प्रेम करता है उससे फिर और कोई प्रेम न करे।_
केवल वही करे, दूसरा नहीं। लेकिन मित्रता करने वालों की भावना ऐसी नहीं होती। उनकी तो भावना होती है–सम्पूर्ण मानव जाति से मित्रता। उनका कोई शत्रु नहीं, कोई पराया नहीं। सभी मित्र हैं, सभी अपने हैं। मित्रता में यही उदात्त भावना होती है जिसके अनुसार पूरा विश्व एक परिवार की तरह है–“वसुधैव कुटुम्बकम्।” मित्रता की यही परम पवित्र भावना एक-न-एक दिन विश्वनाभि से उसका सम्बन्ध जोड़ देती है।
_विश्वनाभि से तात्पर्य है–समूचे विश्व में ब्रह्माण्ड की नाभि जिसे वेद में जगत परमात्मास्वरूप विष्णु की नाभि कहा गया है जिससे ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई है। यह विश्वनाभि परम शून्य स्थान है, वह सम्पूर्ण विश्वब्रह्मांड का केंद्र-बिन्दु है। उसमें व्याप्त परम शून्य शिव स्वरूप है और है–परमेश्वरी।_
विश्वनाभि में प्रवेश हो जाने पर वहां से बाहर निकलना असम्भव है और इसी अवस्था को कहते हैं–‘ब्रह्माण्ड मुक्ति’ या ‘परम मोक्ष’। मनुष्य के शरीरों में एक शरीर है–कॉस्मिक बॉडी जिसे ब्रह्माण्ड काया या ब्रह्म शरीर भी कहते हैं। इस काया के द्वारा विश्वनाभि से साधक का सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।
_सम्बन्ध स्थापित होने के बाद की जो स्थिति है, वह है विश्वनाभि में प्रवेश की स्थिति। जिस काया द्वारा साधक प्रवेश करता है, वह है निर्वाण काया._
*अ-मन में जीवन की एकता का बोध :*
मन की चार अवस्थाएं है–चेतन मन की अवस्था (State of Conscious Mind), अर्धचेतन मन की अवस्था (State of Sub-Conscious Mind), अचेतन मन की अवस्था (State of Unconscious Mind) और अ-मन की अवस्था (State of No-Mind) ।
_चेतन मन की अवस्था हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। मन की जिस अवस्था में हम दिन-रात काम करते हैं, व्यवसाय करते हैं, नौकरी करते हैं, उठते-बैठते, चलते-फिरते, जागते हैं, वह है–चेतन मन की अवस्था। अर्धचेतन मन की अवस्था में व्यक्ति चेतन अवस्था से ज्यादा सच्चा और ईमानदार हो जाता है, वह बेहोशी में कुछ बडबडाता है, नशे की स्थिति में कुछ बोलता है–जो अधिकतर सच्चाई के निकट का होता है।_
ऐसी बेहोशी या नशे की दशा से मुक्त होने पर उसे कुछ भी स्मरण नहीं रहता क्योंकि उसका बोलना और कुछ करना उसके sub-conscious state of mind के क्षेत्र का विषय होता है जो होश की स्थिति में गायब हो जाता है। इसके पीछे का कारण यह नहीं है कि वह झूठ बोल रहा है, बल्कि यह है कि उसके मन का आयाम ही बदल गया है। होश में आने पर उसके मन का आयाम चेतन हो जाता है।
_अचेतन या अवचेतन मन की अवस्था यदि और गहरी और बड़ी हो जाती है तो व्यक्ति कोमा में जा सकता है। ऐसी स्थिति में फिर उसके चेतन अवस्था में लौटने की संभावना नाममात्र की ही रह जाती है। जब कोई व्यक्ति किसी को बहुत गहराई के अन्तराल में सम्मोहन विधि द्वारा ले जाता है तो वह अपने जीवन के पीछे की अवस्था में चला जाता है, युवावस्था, किशोरावस्था, शैशवास्था यहाँ तक कि जन्म के समय की भी अवस्था।_
ज्यादा सावधानी के द्वारा तो वह पिछले जन्म में और कई जन्म पीछे चला जाता है। लेकिन अर्धचेतन मन की अवस्था से ज्यादा कहीं गहरी अवस्था होती है अचेतन मन की अवस्था।
मन की एक विशेषता या कहें कि कमी यह है कि वह किसी वस्तु को देखता है तो उसे तोड़कर देखता है। मन की इस प्रक्रिया में जीवन खण्ड-खण्ड हो जाता है।
_हमारा मन जिस वस्तु को देखता है, चाहे वह बडी हो या छोटी हो, उसे दो हिस्सों में बांटकर ही देखता है। एक साथ एक वस्तु को कभी नहीं देख पाता। वह देखेगा तो एक हिस्सा छिपा रहेगा। आज तक किसी व्यक्ति के मन ने किसी भी वस्तु को सम्पूर्णता में नहीं देखा। इसलिए जहाँ भी मन होगा, अपूर्ण अनुभव ही होगा क्योंकि मन की एक सीमा होती है। सीमा से परे जाकर वह कोई कार्य नहीं कर सकता। उसका अनुभव अपूर्ण होगा, विचार अपूर्ण होगा, अपूर्ण ही दृष्टि होगी। इसलिए मन के द्वारा हम जो निर्माण करते हैं, वह निर्माण काल्पनिक हो जाता है।_
हम लोग जो फेसबुक पर बात करते हैं, चर्चा करते हैं, जो लिखते हैं, पढ़ते हैं, वहस करते हैं और दावा करते हैं हम सही हैं, तुम गलत हो। हम अ-मन की अवस्था में हैं, हम आत्मा का साक्षात्कार कर चुके हैं, हम सूक्ष्म शरीर से सूक्ष्म जगत और लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करते हैं। हमारी विधि सही है, उसमें अमुक विशेषता है। तुम्हारी विधि अपूर्ण है, उसमें अमुक कमी है, मैं तुम्हारी विधि से सहमत नहीं हूँ।
_उनसे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। अरे ! इसमें कौन-सी खास बात कह दी आपने ? जब शास्त्रों में एकता नहीं है, दर्शन में एकता नहीं है, तो व्यक्ति की बात में एकता कैसे हो सकती है ? साम्य कैसे हो सकता है। अरे भाई ! विषमता ही तो सृष्टि की विशेषता है, असमानता ही तो विश्व की जान है। विभिन्नता ही, मतभिन्नता ही तो प्रकृति का अस्तित्व है।_
जहाँ भिन्नता समाप्त हुई, वहीँ प्रलय निश्चित है। त्रिगुणात्मिका प्रकृति की साम्यावस्था में ही तो प्रलय होती है। हम सब जानते हैं–हमारे विचार एक-से नहीं हो सकते, हमारे कार्य-आचरण एक-से नहीं हो सकते, हमारे मन एक-से नहीं हो सकते। यहाँ तक कि हमारे शरीरों की बनावट भी एक-सी नहीं हो सकती। हमारे चेहरे एक-से नहीं हो सकते, नाक, कान, नेत्र, हाथ, पैर सब अलग- अलग होते हैं, तो दो व्यक्तियों के विचार, सिद्धान्त सोचने-विचारने के आयाम भी एक- से कैसे हो सकते हैं ?
_इसलिए मन से निर्मित संसार में जितने भी शास्त्र हैं, जितने भी दर्शन हैं, वे एक तरह से व्यर्थ हैं, पूर्णता की ओर ले जाने वाले नहीं हैं।_
संसार में दो प्रकार के लेखन हुए हैं–पहला वह जो उन लोगों के वचन हैं जिन्होंने मन के अस्तित्व से अलग होकर आत्मा द्वारा पूर्ण को जाना है। दूसरा वह है जो उन लोगों के वचन हैं जिन्होंने मन को व्यवस्थित कर, शिक्षित कर, अध्ययन से, विचार से, चिंतन-मनन से, तर्क से, अनुभवों से मन को विकसित किया है और फिर जगत और माया को लिपिबद्ध किया है। पहला लेखन ‘धर्म’ कहलाया और दूसरा लेखन ‘दर्शन’ या ‘शास्त्र’ कहलाया।
_धर्म और दर्शन में यही अन्तर है और यही कारण है कि जितने भी शास्त्र हैं, वे सब अधूरे हैं। वे कितनी भी ऊँची बात कहें, लेकिन होगी वह ‘मन की ही बात’।_
अरस्तू कितना ही कहे, प्लेटो कितना ही कहे, कांट और हीगल भी कितना ही कहें, वे सब उनके विचार हैं, निष्कर्ष हैं, अनुभव है, लेकिन अनुभूति नहीं। मन से जन्म लेता है–‘दर्शन’ और मन के ऊपर उठ जाने पर अर्थात्–अ-मन की अवस्था में जो उत्पन्न होता है, वह–‘धर्म’। अ-मन की स्थिति में जो घटित होता है–वह है आत्मा की क्रिया और मन की उपस्थिति में जो घटित होता है–वह है–प्रतिक्रिया।
_प्रतिक्रिया क्रिया को देखकर जानबूझ कर की जाती है, इसलिए उसमें दुर्भावना आ जाती है, उसके उद्देश्य और प्रयोजन कलुष से भर जाते है।_
भारत का सनातन धर्म मन से ऊपर उठकर अ-मन की अवस्था में उत्पन्न हुआ है। जबकि संसार के अन्य धर्म (उन्हें तो सही मायने धर्म ही नहीं कहा जा सकता) क्रिया की प्रतिक्रया स्वरुप उत्पन्न हुए हैं। इसलिए वे सब लड़ाते हैं। सनातन धर्म जोड़ता है–मानव से मानव को, मानव से प्राणिमात्र को और मानव से जड़ वस्तु को भी। सनातन धर्म के अनुसार कण भी व्यर्थ नहीं है, कण-कण में ईश्वर है। अन्य धर्म आपस में लड़ते रहते हैं, लड़ाते रहते हैं, अपनी बात मनवाने के लिए शास्त्र नहीं, शस्त्र उठा लेते हैं।
_दर्शन में संघर्ष है, शास्त्रों में संघर्ष है, विचारों में संघर्ष है, क्रियाओं में संघर्ष है क्योंकि ये सब मन के धरातल से जन्मे हैं।_
धर्म उसी व्यक्ति के द्वारा जन्म लेता है, जिसका मन खो गया है, जो पूर्णत्व को जानता है। लेकिन जो धर्म को समझने वाले लोग हैं, वे मन से समझते हैं। उनके पास इसके आलावा और कोई मार्ग नहीं है। यही कारण है कि मन से समझा जाने वाला धर्म सांप्रदायिक युद्ध का कारण बनता है।
_धर्म के स्वरूप और वास्तविक ध्यान के स्वरूप को जानने-समझने के लिए अ-मन की स्थिति को उपलव्ध होना अनिवार्य है।_
*’मन’ को बीच से हटाने का उपाय है, केवल ‘मन’ :*
धर्म जब जन्मता है तो पूर्ण रहता है लेकिन जब उसे लोगों द्वारा प्रचारित किया जाता है, तो वह अपूर्ण प्रचारित होता है क्योंकि प्रचार-प्रसार मन के माध्यम से होता है इसलिए वह अधूरा हो जाता है और अधूरा होते ही धार्मिक वक्तव्यों में संघर्ष शुरू हो जाता है। बुद्ध और कृष्ण के बीच कोई संघर्ष नही है, मोहम्मद और महावीर के बीच भी कोई संघर्ष नहीं है लेकिन हिन्दू और मुसलमान के बीच संघर्ष है, मुसलमान और ईसाई के बीच संघर्ष है और ईसाई और हिन्दू के बीच भी संघर्ष है।
_जैन और बौद्ध के बीच भी यही स्थिति है। यही कारण है कि आज का मानव धर्म और संप्रदाय के नाम पर बट गया है जिसका परिणाम हुआ है–सांप्रदायिक संघर्ष।_
जब मन का अस्तित्व नहीं रह जाता है तो स्थिति में वस्तु के भीतर जो छिपा हुआ ‘अस्तित्वगत रहस्य’ है, वह प्रकट हो जाता है और उस वस्तु का ‘सम्पूर्ण स्वरूप’ सामने आ जाता है। जहाँ मन है, वहां एक वक्तव्य, एक विचार ही सत्य है और शेष वक्तव्य और विचार असत्य हैं क्योंकि मन विभक्त करके देखता है। इसलिए मन की यह पहली अड़चन है।
_मन की दूसरी अड़चन इससे भी ज्यादा कठिन है और वह यह कि मन विरोध में विभक्त कर देखता है। मन जब भी दो चीजों को तोड़ता है तो दोनों के बीच उसे विरोध दिखलायी देता है। जैसे जीवन है, यदि जीवन को मन देखेगा तो उसे जीवन में दो भाग दिखलायी देंगे–जन्म और मृत्यु। मन कैसे मानेगा, कैसे स्वीकार करेगा कि जन्म और मृत्यु जो दो दीखते हैं, दरअसल एक ही हैं। दोनों बिलकुल विपरीत हैं, एक कैसे हो सकते हैं ? कहाँ जन्म और कहाँ मृत्यु ? यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो जीवन में कोई कष्ट या दुःख है ही नहीं।_
जीवन में जन्म और मृत्यु एक ही वस्तु के दो नाम हैं। एक ही वस्तु का विस्तार है जो जन्म से शुरू होता है और मृत्यु में समाप्त होता है। जन्म और मृत्यु तो दो पड़ाव हैं, जो विस्तार है, उसी का नाम जीवन है। अगर जीवन का प्रारम्भ जन्म है तो मृत्यु उसकी पूर्णता है। जन्म और मृत्यु के बीच में यदि मन को न लाएं तो किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है।
_लेकिन मन को कैसे हटायें, उसके लिए साधारण व्यक्ति के पास कोई उपाय नहीं है। यदि कोई उपाय है तो वह केवल ‘मन’ ही है। अच्छा और बुरा एक ही चीज़ का विस्तार है लेकिन इसे मन स्वीकार नहीं करेगा। दरअसल यह दो की (‘द्वैत’ की) उपस्थिति दिखाई देती है, वह वास्तव में मन की प्रतीति है। इसी प्रतीति को हटाने का उपाय, इसी प्रतीति को मिटाने की प्रक्रिया ही तो ‘साधना’ है, यही तो ‘ध्यान’ है।_
ध्यान के माध्यम से मन के परे जाने पर यह प्रतीति नष्ट हो जाती है और किसी भी वस्तु के वास्तविक स्वरूप के साक्षात्कार हो जाते हैं।
_सभी वस्तुएं एक ही अस्तित्व के साथ हैं लेकिन दो भागों में दृष्टिगोचर होना सृष्टि की लीला के दो छोर हैं।_
*मन की अर्थवत्ता*
मन का अर्थ है–मनन, चिन्तन, विचार जो दिखलायी दे। उसके साथ चिन्तन की धारा को जोड़ दे। इसे हम इस प्रकार से समझ सकते हैं। हम एक फूल देखते हैं। जब तक देखते हैं तब तक हमारे मन से फूल का सम्बन्ध नहीं है। लेकिन जैसे ही हम कहते हैं –फूल बहुत ही सुन्दर है, सुगंधमय है, उसी पल मन से फूल का सम्बन्ध जुड़ जाता है तथा हमारे और फूल के बीच अस्तित्व अनिवार्य हो जाता है।
_इसी प्रकार जब हम कहते हैं कि फूल बेकार है, उसमें सुगन्ध तो है ही नहीं। तब भी मन हमारे और फूल के बीच आ जाता है। कहने का मतलब यह है कि अच्छे और बुरे–दोनों ही स्थितियों में मन की उपस्थिति अनिवार्य है। फूल के बारे में अच्छी और बुरी धारणा यदि कोई बनाता है तो वह है–मन। हम मन के अधीन हो जाते हैं।_
मन विचार, भाव, शब्द आदि को आविर्भूत करने वाला एक यंत्र है। वह इन सबका मूल स्रोत है।
*अ-मन की अवस्था के दो प्रकार :*
मनुष्य अ-मन की अवस्था में दो प्रकार से हो सकता है। पहली है–गहन बेहोशी की अवस्था और दूसरी है–समाधि की अवस्था। पहली अवस्था में आत्मा के नीचे चला जाता है मन। समाधि की अवस्था में मन अपने केंद्र के अन्तराल में समाहित हो जाता है और आत्मा मन से रहित होकर सूक्ष्म जगत और लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करने के लिए तत्पर हो जाती है। पहली बार आत्मा इस जीवन और जगत को बिना मन के माध्यम से देखती है और इसके वास्तविक स्वरूप का दिग्दर्शन करती है।
*ध्यान की संकल्पना :*
सूर्योदय का समय है। वृक्षों पर बैठे पक्षी चहचहा रहे हैं। चारों ओर प्रकृति की मनोरम छटा बिखरी हुई है। भगवान बुद्ध एक वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ बैठे हुए हैं। उसी समय उनके परम शिष्य महाकश्यप ने आकर उनसे पूछा–क्या आपको यह प्राकृतिक वातावरण सुन्दर प्रतीत हो रहा है ?
_तथागत ने कोई उत्तर नहीं दिया। मुस्कराते हुए अपने शिष्य की ओर देखने लगे वह। फिर सिर घुमाकर चारों ओर देखकर बोले–तुमने मुझे बड़ी कठिनाई में डाल दिया महाकश्यप। यदि मैं यह कहूँ–सब कुछ सुन्दर है तो मैं कुरूप किसको कहूँगा ?_
क्योंकि जब भी सुन्दर कहा जाता है तो कुरूप की धारणा सुनिश्चित हो जाती है। मेरे लिए न कोई सुन्दर है और न तो कोई है कुरूप। जो जैसा है, वैसा ही रह गया है अब मेरे लिए।
_यह मन के बाहर से देखा गया जगत है। जो जैसा है, वैसा ही मुझे दिखलायी देता है। क्योंकि मन जो सुन्दर और असुंदर का निर्णय करता था, वह मन अब मेरे पास नहीं है।_
ध्यान का अर्थ है–मन का खो जाना। ध्यान का अर्थ है–विचार का, भाषा का, शब्द का खो जाना, तिरोहित हो जाना। इसका अर्थ यह नहीं है कि जो व्यक्ति ध्यान में प्रवेश करेगा, तो वह बोलेगा नहीं।
_विचार का, शब्द का, भाषा का उपयोग नहीं करेगा। वह करेगा। वह बोलेगा, लेकिन तब उसका बोलना, ‘बोलना’ होगा। उपयोग, ‘उपयोग ‘ होगा। उसके बोलने में, उसके उपयोग करने में मन ही नहीं होगा। वह ‘अ-मन’ की स्थिति में बोलेगा और बोलने में भाषा का, विचार का और शब्द का उपयोग भी करेगा।_
इसी को योगीगण ‘ऋतंभरा वाणी’ कहते हैं। ‘ऋतम्भरा वाणी’ वह है जो मन से नहीं सीधे आत्मा से निकलती है।
ध्यान की अवस्था में आपके चारों ओर कुछ भी न हो, किसी भी प्रकार की स्मृति न हो, किसी भी प्रकार की कल्पना न हो। ऐसी अवस्था में न आकाश होगा और न होगा समय और जिस क्षण कुछ भी नहीं होता, सभी का अभाव हो जाता है, वही अवस्था है–शून्यावस्था। शून्यावस्था में सब कुछ मिट जाता है। ऐसे ही व्यक्ति को पूर्ण ध्यानस्थ कहा जाता है।
_भूत, भविष्य, वर्तमान, कल्पना, स्मृति से शून्य और आकाश तथा समय में लीन हो जाना ध्यान की चरमावस्था है। यही है निर्विचार, मौन समाधि की अवस्था को उपलव्ध हो जाना।_
ल ध्यान चेतना की अन्तर्यात्रा है जिसमें चेतना बोधपूर्वक बाहर से भीतर की ओर, परिधि से केंद्र की ओर, दृश्य से दृष्टा की ओर गमन करती है। ध्यान को साधने से चेतना निर्बन्ध और निर्ग्रन्थि, अखण्ड, असंग और असीम अवस्था को उपलब्ध होती है। तात्पर्य यह कि ध्यान, समाधि और अनन्त आत्मबोध का परमात्मा का द्वार बनता है.
_योग के अनुसार ध्यान से अधिक कोई मूल्यवान वस्तु नहीं है। आत्मा की जितनी अवस्थाएं हैं, वे ध्यान द्वारा ही उपलब्ध हो सकती हैं।_
ध्यान कठिन नहीं है जितना कि लोग सोचते हैं। जैसे हमारे घर के सामने फूल खिले हों और हमने दरवाजा बन्द कर रखा हो। हम उसे न खोलें। हमारे सामने खजाना हो और हम आँखें बन्द किये बैठे हों। बस यही कठिनाई है। हम दरवाजा खोलेंगे, तभी तो हमें फूल दिखाई देंगे।
_हम आँखें खोलेंगे तभी हम खजाना देख सकेंगे। यही बात ध्यान के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए। ध्यान प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता है। क्षमता ही नहीं, प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है। परमात्मा ध्यान के साथ हर व्यक्ति को जन्म देता है। इसलिए ध्यान से परिचित होना कठिन नहीं। प्रत्येक व्यक्ति के लिए ध्यान का मार्ग खुला है।_
स्वयं ‘बीज’ को अपनी संभावना का ज्ञान नहीं होता। वह यह नहीं जानता कि उसके भीतर विशाल वृक्ष छिपा है। ऐसा ही मनुष्य है। स्वयं उसे पता नहीं है कि वह वास्तव में क्या है और क्या हो सकता है ? बीज तो अपने भीतर झांक नहीं सकता। लेकिन मनुष्य तो झांक ही सकता है और इसी भीतर झांकने का नाम ध्यान है।
_ध्यान में उतरें– गहरे और गहरे। जब पूरी तरह गहराई में उतर जायेंगे तो उस गहनतम गहराई के दर्पण में संभावनाओं का प्रतिबिम्ब उपलब्ध हो जाता है और जो हो सकता है, वह होना शुरू हो जाता है। शक्ति, समय और संकल्प सभी ध्यान को समर्पित हो जाता है। ध्यान स्वयं को स्वयं से परिचय कराता है।_
फिर एक समय ऐसा आता है कि व्यक्ति चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते, पूजा, प्रार्थना, अर्चना करते भी ध्यान में डूबा रह सकता है। ज्ञान भी ध्यान, भक्ति भी ध्यान, कर्म भी ध्यान और सन्यास भी ध्यान। ध्यान का अर्थ है–चित्त का मौन, निर्विचार, शुद्धावस्था को प्राप्त हो जाना। ध्यान आप किस विधि से उपलब्ध हो सकते हैं–यह महत्वपूर्ण नहीं है। बस, ध्यान को उपलव्ध होना ही महत्वपूर्ण है।
_ध्यान में प्रवेश करने के लिए अनेक रास्ते हैं। सभी रास्ते एकाग्रता के गलियारे से होकर गुजरते हैं। अर्थात्– ध्यान करने में मन की, चित्त की, बुद्धि की एकाग्रता की आवश्यकता पड़ती है। मन को एकाग्र करने के लिए कई उपाय हैं। प्रारम्भ में कोई किसी प्रतिमा को नेत्रों के समक्ष रखकर उस पर ध्यान एकाग्र करते हैं।_
कोई अग्निशिखा (ज्योति) का सहारा लेकर ध्यान केंद्रित करते हैं। ऐसी किसी भी विधि से जब ध्यान में एकाग्रता घटित होने लगे तो व्यक्ति को और आगे बढ़ना चाहिए। अपनी ही साँस को आते-जाते देखना भी एक अच्छा प्रकार है ध्यान को केंद्रित करने का। कुछ लोग मूलाधार पर ध्यान करने को बताते हैं तो कुछ लोग ह्रदय पर। कुछ लोग भ्रूमध्य पर जहाँ आज्ञाचक्र है, वहां पर ध्यान एकाग्र करते हैं तो कुछ लोग हैं जो नाभि को केंद्र बिन्दु मानकर ध्यान की बात करते हैं।
_कुछ लोग मंत्रजप करते हुए मन्त्र की देवी या देवता के विग्रह पर ध्यान करने को कहते है। कोई ॐ का जप करते हुए ध्यान करते हैं।_
मेरे अनुभव के अनुसार सबसे पहले हमें दो बातों पर ध्यान केंद्रित कर लेना चाहिए। हमारे परिवार में, कुल में वह कौन देव या देवी हैं जिन्हें इष्ट माना गया है।
बिना इष्ट को पकडे कोई भी ध्यान सफल नहीं हो सकता। इष्ट को पूजना, इष्ट को संतुष्ट रखना सर्वप्रथम आवश्यक है ध्यानी के लिए। इसके बाद दूसरी सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात है कि व्यक्ति के ग्रह-दशा पर विचार कर यह देखना चाहिए कि किस शक्ति या किस तत्व की साधना वह ध्यान के माध्यम से करे।
_जो तत्व या जो शक्ति उसके सबसे अनुकूल होगी, उसे साधने में उसे शीघ्र सफलता मिलने की संभावना होती है। विपरीत शक्ति या तत्व की साधना करने में सिवाय विफलता के और कुछ नहीं मिल सकता।_
*खुद में ख़ुदा : ध्यान और स्वयं की खोज :*
ईश्वर के दर्शन नहीं हो सकते। लेकिन चाहो तो स्वयं ईश्वर अवश्य हो सकते हो। ईश्वर को पाने और जानने की खोज बिलकुल ही अर्थहीन है। जिसे खोया ही नहीं है, उसे पाओगे कैसे? और जो तुम स्वयं ही हो, उसे जानोगे कैसे?
_वस्तुत: जिसे हम देख सकते हैं, वह हमारा स्वरूप नहीं हो सकता। दृश्य बन जाने के कारण ही वह हमसे बाहर और पर हो जाता है। परमात्मा है हमारा स्वरूप और इसलिए उसका दर्शन असंभव है। वास्तव में, परमात्मा के नाम से जो दर्शन होते हैं, वे हमारी ही कल्पनाएं है।_
मनुष्य का मन किसी भी कल्पना को आकार देने में समर्थ है। किन्तु इन कल्पनाओं में खो जाना सत्य से भटक जाना है। सत्य को जानने के पूर्व स्वयं को जानना तो अनिवार्य ही है। और स्वयं को जानते ही जाना जाता है कि अब कुछ और जानने को शेष नहीं है।
_आत्मज्ञान की कुंजी के पाते ही सत्य का ताला खुल जाता है। सत्य तो सब जगह है। समग्र सत्ता में वही है। किन्तु उस तक पहुंचने का निकटतम मार्ग स्वयं में ही है। स्वयं की सत्ता ही चूंकि स्वयं के सर्वाधिक निकट है, इसलिए उसमें खोजने से ही खोज होनी सम्भव है।_
और जो स्वयं में ही खोजने मेंअसमर्थ है, जो निकट ही नहीं खोज पाता है तो दूर कैसे खोज पाएगा? दूर की खोज का विचार.. निकट की खोज से बचने का एक उपाय भी हो सकता है। संसार की खोज चलती है ताकि स्वयं से बचा जा सके और फिर ईश्वर की खोज चलते लगती है।
_क्या स्वयं के अतिरिक्त शेष सब खोजें स्वयं से पलायन की ही विधियां नहीं है? भीतर देखें कि वहां क्या दिखता है …अंधकार, अकेलापन, रिक्तता? क्या इस अंधकार, इस अकेलेपन, इस रिक्तता से भागकर ही हम कहीं शरण लेने को नहीं भागते रहते हैं?_
किन्तु इस भांति के भगोड़ेपन से दुख के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं लगता है। स्वयं से भागे हुए के लिए विफलता ही भाग्य है। क्योंकि जो खोज स्वयं से पलायन है, वह कहीं भी नहीं ले जा सकती है। और दो ही विकल्प हैं : स्वयं से भागो या स्वयं में जागो।
_भागने के लिए बाहर लक्ष्य होना चाहिए और जानने के लिए बाहर के सभी लक्ष्यों की सार्थकता का श्रम—भंग। ईश्वर जब तक बाहर है, तब तक वह भी संसार है, वह भी माया है, वह भी मूर्च्छा है। उसका आविष्कार भी मनुष्य ने स्वयं से बचने और भागने के लिए ही किया है।_
इसलिए ईश्वर, सत्य, निर्वाण, मोक्ष—यह सब न खोजें। खोजें उसे जो सब खोज रहा है। उसकी खोज ही अन्ततः ईश्वर की, सत्य की और निर्वाण की खोज सिद्ध होती है। ज्ञान की पूर्ण शुद्धावस्था का नाम ही है आत्मज्ञान। और भी उचित है कि हम उसे ज्ञान ही कहें।
क्योंकि वहां न कोई आत्म है और न अनात्म। आत्मानुसंधान के अतिरिक्त और कोई खोज धार्मिक खोज नहीं है। लेकिन, ‘आत्म ज्ञान’, ‘आत्म दर्शन’, आदि शब्द बड़े भ्रामक हैं। क्योंकि, स्वयं का जान कैसे हो सकता है? ज्ञान के लिए द्वैत चाहिए, जहां दो नहीं हैं, वहां ज्ञान कैसे होगा?
_दर्शन कैसे होगा? वास्तव में, ज्ञान, दर्शनादि सभी शब्द द्वैत के जगत के हैं। और जहां अद्वैत है, जहां एक ही है, वहां वे एकदम अर्थहीन हो जाते हों तो कोई आश्रर्य नहीं। कहि न कही , ‘आत्म दर्शन’ शब्द ही असंगत है। जो जाना जा सकता है, वह स्व कैसे होगा?_
वह तो पर ही हो सकता है। जानना तो पर का ही हो सकता है। स्व तो वह है जो जानता है। जहां ज्ञान है, वहां कोई ज्ञाता है, कुछ ज्ञेय है। स्व अनिवार्य रूप से ज्ञाता है। उसे किसी भी उपाय से ज्ञेय नहीं बनाया जा सकता। हम सबको जान सकते है लेकिन उसी भांति स्वयं को नहीं।
_शायद इसीलिए आत्मज्ञान जैसी सरल घटना कठिन और दुरूह बनी रहती है। फिर इस ज्ञान को पाने की विधि ,मार्ग क्या है ? उदाहरण के लिए एक घर तो बड़ा था, किन्तु सामान की अधिकता से बिलकुल छोटा हो गया था। वहां सामान ही सामान था और घर था नहीं।_
क्योंकि घर तो दीवारों से घिरे रिक्त स्थान का ही नाम है। गृहपति कहता है कि ‘घर में जगह बिलकुल नहीं है, लेकिन जगह लाएं भी कहां से। वास्तव में, रिक्त स्थान घर में पर्याप्त है। वह यहीं है, और कहीं गया नहीं, केवल सामान से आपने उसे ढांक लिया है।
_सामान हटावें और वह अभी और यहीं है। आत्म- ज्ञान की विधि भी यही है।सोते -जागते, उठते -बैठते, सुख में, दुख में …मैं तो हूं ही। ज्ञान हो, अज्ञान हो, मैं तो हूं ही। मेरा यह होना असंदिग्ध है। सब पर संदेह किया जा सके, लेकिन स्वयं पर तो संदेह नहीं किया जा सकता है।_
मेरा होना ,मेरा अस्तित्व और मेरी जानने की क्षमता ,मुझमें ज्ञान का होना, इन दोनों के आधार पर ही मार्ग खोजा जा सकता है। मैं हूं लेकिन ज्ञात नहीं कौन हूं? अब क्या करूं? ज्ञान जो कि क्षमता है, ज्ञान जो कि शक्ति है, उसमें झांकूं, और खोजूं। इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प ही कहां है?
_ज्ञान की शक्ति है, लेकिन वह ज्ञेय से,विषयों से ढंकी है। एक विषय हटता है, तो दूसरा आ जाता है। एक विचार जाता है तो दूसरे का आगमन हो जाता है। ज्ञान एक विषय से मुक्त होता है तो दूसरे से बंध जाता है, लेकिन रिक्त नहीं हो पाता। ज्ञान जहां ज्ञेय से ,विषय से मुक्त है, वहीं वह शुद्ध है।_
और वह शुद्धता ,शून्यता ही आत्मज्ञान है। चेतना जहां निर्विषय है, निर्विचार है, निर्विकल्प है, वहीं जो अनुभूति है, वही स्वयं का साक्षात्कार है। किंतु यहां इस साक्षात्कार में न तो कोई ज्ञाता है, न ज्ञेय है। यह अनुभूति अभूतपूर्व है। उसके लिए शब्द असम्भव है।
_वास्तव में सत्य के संबंध में जो भी कहो, वह कहने से ही असत्य हो जाता है। ज्ञान है शब्दातीत। किन्तु सत्य के संबंध में किए गए अधूरे इंगितों को पकड़ लेने से बडी भ्रांति हो जाती है। आत्मज्ञान की खोज में जो व्यक्ति आत्मा को एक ज्ञेय पदार्थ की भांति खोजने निकल पड़ता है।_
वह प्रथम चरण में ही गलत दिशा में चल पड़ता है। आत्मा ज्ञेय नहीं है और न ही उसे किसी आकांक्षा का लक्ष्य ही बनाया जा सकता है, क्योंकि वह विषय भी नहीं है।
_वस्तुत: उसे खोजा भी नहीं जा सकता क्योंकि यह खोजने वाले का ही स्वरूप है।_
खोज में खोज और खोजी भिन्न नहीं है। इसलिए आत्मा को केवल वे ही खोज पाते है, जो सब खोज छोड़ देते है और वे ही जान पाते हैं जो सब जानने से शून्य हो जाते हैं। स्वप्न खोते ही सत्य उपलब्ध है। स्वप्न जहां नहीं है, तब जो शेष है, वही है स्व-सत्ता, वही है सत्य, वही है स्वतन्त्रता।
_मैं जिसे नहीं खौ सकता हूं वही तो है स्वरूप , वही तो है परमात्मा। और जो सदा है, सनातन है, वही तो है सत्य। रूप खोते ही सत्य उपलब्ध है। जिसे खोया जा सकता है, उस सबको खोकर ही वह जान लिया जाता है, जो सत्य है। विस्मरण हमारी आदत नहीं है और सब कुछ हमें स्मरण है।_
सिर्फ एक बात स्मरण नहीं है। इसलिए हम कपड़े भी ठीक से पहन लेते हैं और जूते भी, और घर भी ठीक से बसा लेते हैं, लेकिन जीवन हमारा ठीक नहीं हो पाता है। जो जीवन में केंद्रीय है उसकी हमें कोई स्मृति नहीं। हम सभी एक दूसरे को वस्त्रों से ही पहचानते हैं।
_लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि हम अपने को भी अपने वस्त्रों से पहचानते हैं। अपनी आत्मा का ,अपने स्वरूप का तो हमें तो कोई बोध नहीं। हम जो वस्त्र पहने हुए हैं वे सारे धन के, पदवियों के, पदों के, सामाजिक प्रतिष्ठा के, अहंकार के, उपाधियों के, वस्त्र हैं।_
और उनसे ही हम अपने को भी पहचानते हैं। वस्त्रों से जो अपने को पहचानता है उसका जीवन यदि अंधकारपूर्ण हो जाए, दुख से ,पीड़ा और विपन्नता से भर जाए, तो आश्चर्य नही है क्योंकि वस्त्र हमारे प्राण नहीं हैं, और वस्त्र हमारी आत्मा नहीं हैं।
लेकिन हम अपने को अपने वस्त्रों से ही जानते हैं। उससे गहरी हमारी कोई पहुंच नहीं है। जीवन में सारा दुख और सारा अंधकार इस आत्म-अज्ञान से पैदा होता है। अपने स्वयं के केंद्र पर अंधकार होता है और हम सारे रास्तों पर दीये जलाने की कोशिश करते हैं।
वे सब दीये काम नहीं पड़ते क्योंकि हमारे भीतर अंधकार होता है । तो हम जहां भी जाते हैं अपने साथ अंधकार ले जाते हैं। जब तक हम स्वयं को नही जानते तब तक अंधकार ही हैं। जीवन में एक-एक व्यक्ति उतने अंधकार में है और सारे लोग अपने-अपने अंधकार को लिए फिरते हैं।
_हम सब जहां इकट्ठे हो जाते हैं वहाँ अंधकार बहुत घना हो जाता है। अपने भीतर सुगंध को जीवन की, जीवन की धन्यता को, कृतार्थता को कोई अनुभव नही करता है। एक अर्थहीनता, हमें पकड़े है। लेकिन किसी भांति हम कल की आशा में जीए जाते हैं।_
शायद कल सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जिसका आज गलत है उसका कल कैसे ठीक होगा? क्योंकि कल तो आज से ही निकलेगा, आज से ही पैदा होगा। तो यदि आज दुखी हैं तो जान लें कि कल भी दुखी रहेंगे। कल की आशा में, कल की आशा में आज के दुख को झेला तो जा सकता है।
_लेकिन कल के सुख को निर्मित नहीं किया जा सकता है। इसलिए आनंद है केवल आशा और जीवन है दुख ऐसा हमारे सबके अनुभव में है। यह कोई सिद्धांत की बात नहीं है। जो भी अपने जीवन को थोड़ा सा खोल कर देखेगा उसे यह दिखाई पड़ेगा।_
जीवन के संबंध में पहला तथ्य यही है कि जिस भांति हम उसे जी रहे हैं उस भांति कहीं कोई, कहीं आनंद का फूल उसमें नहीं लगता है और ना लग सकता है। इसीलिए कल ठीक हो जाएगा, कल आने वाले वर्ष या आने वाली जिंदगी में, परलोक में, पुर्नजन्म में सब ठीक हो जाएगा ।
ये सब आशा का विस्तार है। कोई सोचता हो कि इस जन्म के बाद अगले जन्म में सब ठीक हो जाएगा। वह उसी तरह की भ्रांति में है जिस तरह की भ्रांति में जो सोचता है आज दुख है कल शांति, कल सुख हो जाएगा। कोई सोचता हो मोक्ष में सब ठीक हो जाएगा तो भ्रांति में है।
_क्योंकि कल मुझसे पैदा होगा। आने वाला जन्म भी, मोक्ष भी, जो भी होने वाला है वह मुझ से पैदा होगा। और अगर मेरा आज अंधकारपूर्ण है तो कल मेरा प्रकाशित नहीं हो सकता। तो फिर क्या हम निराश हो जाएं और कल की सारी आशा छोड़ दें ?_
लेकिन इससे निराश होने का भी कोई कारण नहीं है। आज के प्रति आशा से भरा जा सकता है। आज को परिवर्तित किया जा सकता है। मैं जो हूँ उस होने में क्रांति लाई जा सकती है। मैं कल क्या होऊंगा इसके द्वारा नहीं बल्कि जो मैं अभी हूँ उसके ज्ञान, उसके बोध उसके प्रति जागरण से।
_आत्म स्मृति से क्रांति उत्पन्न हो सकती है। यदि हम स्वयं को जान सके तो वह दीया उपलब्ध हो जाएगा जो जीवन से अंधकार को नष्ट कर देगा और स्वयं को जाने बिना न कोई दीया है और न प्रकाश है, न कोई आशा है। ये जान लेना स्वयं को जानने के प्रति पहला चरण है।_
कोई सोचता हो कि मैं स्वयं को जानता हूँ तो स्वयं को जानने के प्रति द्वार बंद हो जायेंगे और धर्म की बहुत सी शिक्षाओं ने, संस्कृति ने इधर हजारों वर्ष से दोहराए गए सिद्धांतों ने, आत्मा और परमात्मा की बातों ने हम में से बहुतों को यह भ्रम पैदा कर दिया है।
_हम अपने को जानते हैं। इस भ्रम ने हमारे आत्म-अज्ञान को गहरा किया है। स्वयं को जानने के भ्रम से बड़ा, आत्म-ज्ञान में और कोई दूसरा अटकाव कोई दूसरी दीवाल, कोई दूसरा अवरोध नहीं है। छोटे से बच्चे भी जानते हैं कि हम आत्मा हैं और बूढ़े भी दोहराते हैं कि हम आत्मा हैं।_
यह सत्य है, यह सत्ता का अनुभव हो तो जीवन बिलकुल दूसरा हो जाएगा। ये सिद्धान्त हैं, ये स्वयं की प्रतीति और साक्षात हो तो जीवन नया हो जाए और जीवन आनंद से भर जाए।
_लेकिन अज्ञान में इन शब्दों से पैदा हुए झूठे ज्ञान को हमने बहुत तीव्रता से पकड़ा है । उसे छोड़ने में भी भय मालूम होता है। इसलिए जैसे-जैसे व्यक्ति मृत्यु के करीब पहुंचता है वैसे-वैसे इन शब्दों को और जोर से पकड़ लेता है।_
*ध्यान में कैसे करे स्वयं की खोज :*
जैसे-जैसे व्यक्ति मृत्यु के करीब पहुंचता है वैसे-वैसे वह मंदिरों के द्वार खटखटाने लगता है। और साधु-संन्यासियों के सत्संग में बैठने लगता है ताकि इन शब्दों को जोर से पकड़ ले, ताकि आती हुई मौत के विरोध में कोई सुरक्षा का उपाय बना ले।
_इसलिए जितने लोग मृत्यु से भयभीत होते हैं वे सभी आत्मा की अमरता में विश्वास कर लेते हैं। उनका यह विश्वास उनका ज्ञान नहीं है। कोई विश्वास कभी ज्ञान नहीं होता। सब विश्वास अज्ञान होते हैं। जीवन के प्रति जो भी हम माने हुए बैठे हैं वह सब हमारा अज्ञान है।_
और उस मानने के कारण ज्ञान तक जाने का सारा द्वार बंद है। हमारे विश्वास बाधा हैं। और जो व्यक्ति जितने ज्यादा विश्वासों से ग्रसित हो जाता है उसके जीवन में विवेक के अवतरण का और जगने की संभावना का, उतना ही उसी मात्रा में ह्रास हो जाता है।
_यह बात असंभव हो जाती है कि हम स्वयं को जान सकें। क्योंकि स्वयं को जानने के सिद्धांत हमें यह भ्रम पैदा कर देते हैं कि हम जानते हैं और ये भ्रम बहुत तलों पर हैं। इस ‘मैं’ का तो हमें कोई भी पता नही है। तो या तो हम अपने नाम को, अपने घर को, अपने परिवार को समझते हैं।_
यह मेरा होना है, अगर किसी भांति इससे हमारा छुटकारा हो जाए और ये हम जान सकें कि मेरा नाम, मेरा घर, मेरा वंश, मेरा राष्ट्र, मेरी जाति, मेरा धर्म यह मेरा होना नहीं है अगर किसी भांति यह बोध भी आ जाए तो फिर हम तोतों कि भांति उन शब्दों को दोहराने लगते हैं।
_जो ग्रंथों में लिखे हैं और शास्त्रों में कहे हैं। तब हम दोहराने लगते हैं कि मैं आत्मा हूँ ,मैं परमात्मा हूँ. अहं-ब्रह्मास्मि और-और न मालूम क्या-क्या हम दोहराने लगते हैं। जिस भांति यह कहा गया है कि आप का यह नाम है और आपने पकड़ लिया है, उसी भांति यह भी कहा गया है।_
आपके भीतर परमात्मा है और आपने यह भी पकड़ लिया है। इन दोनों बातों में कोई फर्क नहीं है। जब तक हम बाहर से आए हुए शब्दों को पकड़ते हैं तब तक हम स्वयं से परिचित नहीं हो सकेंगे वे शब्द चाहे पिता ने दिए हो, चाहे समाज ने, चाहे ऋषियों , संतों ने किन्हीं ने भी वे शब्द दिए हों।
_जब तक बाहर से आए हुए परिचय को हम पकड़ेंगे तब तक उस परिचय का जन्म नहीं हो सकेगा जो हमारा परिचय है। तब तक हम उसे नहीं जान सकेंगे। तब तक उसे जानने का कोई मार्ग नहीं है। तुम्हारा नाम, धन, तुम्हारा पद और प्रतिष्ठा तुम्हारा परिचय नहीं है।_
तुम जिस दिन स्वयं को पा लोगे उस दिन उसे भी पा लोगे जो सबके भीतर है। क्योंकि जो मेरे भीतर है और जो किसी और के भीतर है और जो सबके भीतर है, वह बहुत गहरे में संयुक्त है, और एक है और समग्र है। ज्ञानी होने में अहंकार की खूब तृप्ति है।
_जितना ये ज्ञान की बातें करने वाले लोग अहंकार से पीड़ित हो जाते हैं उतना तो कोई और अहंकारी नहीं होता। कुछ शब्दों ,कुछ विचारों को इकट्ठा करके हमें यह खयाल पैदा होता है कि हमने जान लिया है। वास्तव में, जानते तो हम कुछ भी नहीं, हमारा ‘मैं’ जरूर मजबूत होता है और भर जाता है।_
जिस चीज से भरने लगता है उसको हम इकट्ठा करने लगते हैं। कोई धन इकट्ठा करने लगता है क्योंकि धन के इकट्ठे करने से अहंकार भरता हुआ मालूम पड़ता है। कोई बड़े महल बनाने लगता है, ताजमहल बनाने लगता है, कोई कुछ और करने लगता है क्योंकि उससे अहंकार भरता है।
कोई त्याग करने लगता है क्योंकि उससे अहंकार भरता है और हमारा अहंकार बड़ा सूक्ष्म है। वह निरंतर अपने को भरने की कोशिश करता है। अगर त्याग को प्रशंसा मिलती हो आदर मिलता हो तो हम त्याग कर सकते हैं, उपवास कर सकते हैं, धूप में खड़े रह सकते हैं।
_सिर के बल खड़े रह सकते हैं, शरीर को सुखा सकते हैं। अगर चारों तरफ जय जयकार होता हो तो हम मरने को राजी हो सकते हैं, नहीं तो कोई शहीद मरने को राजी होता लेकिन अहंकार को अगर तृप्ति मिलती हो तो हम सूली पर भी लटकते वक्त मुस्कुरा सकते हैं और प्रसन्न हो सकते हैं।_
जो परिचय बाहर से मिलता है वह आत्म-परिचय नहीं है। इसलिए यह बात जितनी झूठी है कि मेरा नाम मैं हूँ उतनी ही यह बात भी झूठी होगी अगर मैं बाहर से सीखू कि मैं आत्मा हूँ , परमात्मा हूँ , मैं अविनाशी हूँ , मैं कुछ हूँ । पहली बात झूठी है यह तो हमें समझ में आ जाती है।
_क्योंकि ये बात हजारों वर्ष से दोहराई गई है, लेकिन दूसरी बात भी झूठी है इसे समझने में थोड़ी कठिनाई होती है। क्योंकि तब हम एक अटल अंधकार में छूट जाते हैं और अज्ञान में छूट जाते हैं। क्योंकि अगर सांसारिक परिचय भी हमारा परिचय नहीं है।_
तथाकथित आध्यात्मिक परिचय भी हमारा परिचय नहीं है तो फिर हमारा परिचय क्या है? तब हम एक अज्ञान में और अंधकार में छूट जाते हैं और अज्ञान से भय मालूम होता है। इसलिए हम कोई न कोई परिचय तो मान लेना चाहते हैं।
_गृहस्थ का एक परिचय है और संन्यासी का एक परिचय है ये दोनों परिचय झूठे हैं। इनमें से किसी एक को हम पकड़ कर तृप्ति कर लेना चाहते हैं तो गृहस्थी से कोई छूटता है तो संन्यासी हो जाता है और संन्यास में पकड़ जाता है।_
एक तरह के वस्त्रों से छूटता है तो दूसरे तरह के वस्त्रों को स्वीकार कर लेता है और एक तरह के नाम से छूटता है तो दूसरा नाम ग्रहण कर लेता है। हम संन्यासी का नाम बदल देते हैं .. उसे दूसरा नाम दे देते हैं । कपड़े बदल देते हैं, उसे दूसरे वस्त्र दे देते हैं।
उसका ढंग बदल देते हैं… उसे दूसरा ढंग दे देते हैं। लेकिन उस रिक्त स्थान में छूटने को कोई राजी नहीं है जहां हमारा कोई परिचय नहीं है… न सांसारिक और न आध्यात्मिक। उस खाली जगह में खड़े होने को कोई राजी नहीं है। जो उस खाली जगह में खड़े होने को राजी हो जाता है।
_वही केवल स्वयं को जान पाता है। जो अपने सब परिचय छोड़ देता है और अपरिचय में खड़ा हो जाता है। जो अपने संबंध में सारे ज्ञान छोड़ देता है और अज्ञान में खड़ा हो जाता है उसी अज्ञान में, उसी क्रांति के क्षण में, वह परिवर्तन घटित होता है जहां स्वयं के बोध का जन्म होता है।_
जब तक हम किसी भी परिचय को पकड़ते हैं; तब तक उस बोध के पैदा होने की भूमिका खड़ी नहीं होती। जब तक कोई भी सहारा है ; तब तक उसके गिरने का कोई कारण पैदा नहीं होता जो हमारे भीतर सोया है।जब आपकी कोई सुरक्षा नहीं रह जाएगी, कोई सहारा नहीं रह जाएगा।
_कोई परिचय, कोई ज्ञान और आप निपट अज्ञान में और बेसहारा खड़े होने का साहस करेंगे, उसी क्षण, उसी क्षण केवल वह जागता है जो हमारे भीतर सोया है। उसी क्षण वहां कोई बीज टूटता है और अंकुरित होता है। उसी क्षण वहां कोई अंधकार टूटता है ओरज्योति जागती है ..उसके पहले नहीं।_
पहले बिलकुल असंभव है क्योंकि उसके पहले हम कोई न कोई पूरक ,कोई न कोई सब्स्टीट्यूट खोज लेते हैं। हम खोज लेते हैं उसे जो सोया है उसे जागने का कोई कारण नहीं रह जाता। हम कोई न कोई परिचय पकड़ लेते हैं, कोई न कोई वस्त्र पकड़ लेते हैं।
कोई न कोई रूप, कोई न कोई नाम, कोई न कोई शब्द, कोई न कोई सिद्धांत, पकड़ लेते हैं.. अज्ञान ढक जाता है और ज्ञान के जन्म का कोई कारण नहीं रह जाता। ज्ञान के आगमन के लिए पहला द्वार स्वयं के भीतर अपने समग्र अज्ञान की स्वीकृति है।
_ज्ञानी बनना बहुत आसान है। अपने अज्ञान को जानना और स्वीकार कर लेना बहुत दुःसाहस की बात है। क्योंकि ज्ञानी बनने में अहंकार की सहज तृप्ति होती है अज्ञान को स्वीकार करने में अहंकार के खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती।_
जिन प्रश्नों के उत्तर नहीं मालूम हैं अगर वे खड़े हो जाएं तो जीवन में एक नये प्रभात की शुरुआत होती है, एक नया मंगल प्रारंभ होता है। उसकी तरफ आंखें उठनी शुरू होती हैं जो सत्य है,सुंदर है, शिव है, उसकी तरफ, जो परमात्मा है। उसकी तरफ जो हमारा वास्तविक होना है।
_उसे जान कर जीवन का सारा दुख वैसे ही विर्सजित हो जाता है जैसे किसी अंधकारपूर्ण गृह में कोई दीया जला दे। और सारा अंधकार विलीन हो जाए। कैसे यह दीया जल सकता है …प्रश्न में ही उत्तर छिपा है। बाहर मत खोजें। और बाहर के किसी उत्तर को स्वीकार न करें._
पूरे-पूरे वेग से प्रश्न को आने दें कि वह सारे प्राणों के रंध्र-रंध्र को भर दे, श्वास-श्वास भर दे। हृदय की धड़कन-धड़कन उससे भर जाए। प्रश्न ही रह जाए और कुछ न हो। तब वहीं, बिलकुल वहीं प्रश्न के साथ ही उत्तर है। वह उत्तर बाहर से नहीं आता, वह उत्तर भीतर से उपलब्ध होता है।
_वह उत्तर उपलब्ध होगा लेकिन प्रश्न आपको पूछना पड़ेगा। ध्यान अस्तित्व के साथ एक हो जाने का नाम है। हमारी सीमाएं हैं–उन्हें तोड़ कर असीम के साथ एक हो जाने का नाम। हम जैसे एक छोटी सी बूंद हैं और बूंद जैसे सागर में गिर जाए और एक हो जाए।_
ध्यान कोई क्रिया नहीं है बल्कि कहें अक्रिया है, क्योंकि क्रिया कोई भी हो उससे हम बच जाएंगे पर अक्रिया में ही मिट सकते हैं। ध्यान एक अर्थ में अपने ही हाथ से मर जाने की कला है। और जो मर जाने की कला सीख जाते हैं वही केवल जीवन के परम अर्थ को उपलब्ध हो पाते हैं।
_ध्यान में श्वास का सर्वाधिक महत्व है। जीवन में भी है। श्वास चल रही है तो आदमी जीवित है और श्वास खो गई तो आदमी खो गया। जीवन में श्वास हमारा संबंध है। और शायद इस बात पर कभी खयाल न किया होगा कि मन का जरा सा परिवर्तन भी श्वास पर शीघ्रता से प्रतिफलित होता है।_
आप क्रोध में हों तो श्वास और तरह से चलती है, आप शांत हैं तो और तरह से चलती है, आप बेचैन हैं तो और तरह से चलती है। श्वास पूरे समय मन की खबरें देती रहती है।अगर आदमी की श्वास समझी जा सके तो आदमी के भीतर का सब कुछ समझा जा सकता है।
_ध्यान में तो श्वास बहुत कीमती है, सर्वाधिक कीमती। क्योंकि ज्यों-ज्यों आप लीन होंगे विराट में वैसे-वैसे श्वास रूपांतरित होगी। इससे उलटा भी होगा, अगर श्वास रूपांतरित हो तो आप विराट में लीन होना शुरू हो जाएंगे। जैसे अगर कोई आप से कहे कि श्वास शांत रखो और क्रोध करो।_
तो आप बहुत मुश्किल में पड़ जाएंगे। श्वास शांत रख कर क्रोध करना असंभव है। एकदम असंभव है। श्वास में रूपांतरण अनिवार्य है। इसलिए आप छोटे सा प्रयोग करके कभी देख लें। जब भी क्रोध आए तो क्रोध की फिकर मत करना और श्वास को धीमा करना।
तब आप अचानक पाएंगे कि क्रोध असंभव हो गया। श्वास धीमी हो तो क्रोध असंभव हो जाएगा। क्रोध असंभव हो रहा हो तो श्वास धीमी होती चली जाएगी। अगर बुद्ध और महावीर की मूर्तियां देखें, तो क्या ऐसा नहीं लगता कि ये लोग श्वास ले रहे हों। श्वास ठहरी हुई मालूम पड़ती है।
_वह रुक गई। मूर्तियों की वजह से ऐसा नहीं है। मन पूरी तरह शांत होगा भीतर सारे उपद्रव मन के लीन हो जाएंगे और व्यक्ति विराट के साथ एक होगा। तो श्वास आमूल रूपांतरित होती है। हम अपने को खोकर वह जो हमारे चारों ओर विस्तार है उसके साथ एक होने का प्रयास करें।_
ध्यान की प्रक्रिया के पहले केवल दो छोटी सी बातें खयाल कर लें। एक तो स्थान खुला हो क्योंकि इस प्रयोग में बहुतों को बीच में लगेगा कि लेट जाएं, तो उन्हें लेट जाना है। जैसा लगे वैसा हो जाने देना है। कोई चिंता नहीं करनी है कि कोई दूसरा मौजूद है।
_और कोई भी मौजूद हो तो भी आप अकेले ही हैं, वह दूसरा भी अकेला है।हम श्वास से ही शुरू करेंगे। पहली बात यह कि ध्यान में आंख बंद करके बैठेेंगे लेकिन आंख ऐसे बंद नहीं करनी है कि आंख पर दबाव पड़े। आंख को ढीला छोड़ देना है और आंख अपने से बंद हो जाए।_
इसलिए आंख पर दबाव जरा भी न हो क्योंकि आंख हमारे मस्तिष्क का सर्वाधिक संवेदनशील हिस्सा है। अगर आंख पर जरा भी दबाव है तो भीतर के मस्तिष्क के शांत होने में बड़ी कठिनाई होगी। तो सबसे पहले तो आंख की पलकों को धीरे से छोड़ दें।
_बीच-बीच में भी आपको आंख खोल कर देखने की जरूरत नहीं है क्योंकि देखने हम भीतर जा रहे हैं और भीतर आंख के खुले होने की कोई जरूरत नहीं। आंख को बंद कर लें ढीला छोड़ दे और शरीर को भी शिथिल कर लें ताकि शरीर से आपको कोई बाधा न रहे।_
शरीर को भी ढीला छोड़ दें। आंख बंद कर ली है, शरीर ढीला छोड़ दिया है। जिसने लेटना हो वह चुपचाप लेट जाएं। अब ध्यान श्वास पर ले जाए। भीतर देखें श्वास जा रही है.. आ रही है। श्वास को देखें। जैसे ही श्वास को देखना शुरू करेंगे वैसे ही उस जगह खड़े हो जाएंगे जहां से घर खुलता है।
बहुत बारीक सी है, गौर से देखेंगे भीतर तो दिखाई पड़ने लगेगी। दिखाई पड़ने लगेगी मतलब अनुभव होने लगेगा कि श्वास भीतर जा रही है, श्वास बाहर जा रही है। अगर किसी को अनुभव न हो रहा हो, तो थोड़ी सी गहरी श्वास लें ताकि उन्हें फीलिंग साफ मालूम पड़ने लगे।
_थोड़ी सी धीमी व गहरी श्वास लेकर देख लें ताकि पता चल जाए यह रही श्वास। यह श्वास भीतर आ रही है, श्वास बाहर जा रही है, श्वास भीतर आ रही है, श्वास बाहर जा रही है। देखें भीतर अनुभव करें श्वास भीतर जा रही है, श्वास बाहर जा रही है।_
दस मिनट तक गहरी श्वास लेते रहें और देखते रहें, श्वास भीतर आ रही है, श्वास बाहर जा रही है। बस एक ही काम खयाल में रह जाए कि मैं श्वास को देख रहा हूं। श्वास को बिना देखे भीतर न जाने दूंगा, बिना देखे बाहर न जाने दूंगा। श्वास को देखते-देखते ही मन शांत होना शुरू हो जाएगा।
_बस श्वास रह जाए–आप रह जाएं एक दृष्टा की भांति। किसी को भी इस बीच लगे कि लेट जाना है तो चुपचाप लेट जाए। शरीर कंपने लगे तो रोकें नहीं कंपने दें। आंख से आंसू बहने लगें तो रोकें नहीं बहने दें। जो भी हो रहा हो उसे होने दें और आप एक ही काम करें कि श्वास को देखते रहें।_
अब अनुभव करें कि बहुत शीघ्र वह जो विराट हमारे चारों ओर उपस्थित है उसमें हम लीन हो जाएंगे। सबसे पहले श्वास को देखते रहें साथ में शरीर को ढीला छोड़ें। अपने आप शरीर गिर जाए तो रोकें नहीं, गिर जाने दें। शरीर शिथिल हो रहा है।
_बिलकुल छोड़ दें, गिरे तो गिर जाए, आगे झुके तो झुक जाए, जो होना है वह हो जाए पर श्वास पर ध्यान रहे और जो मन में हो रहा है उसकी चिंता न लें। शरीर बिलकुल शिथिल होता जा रहा है जैसे कोई प्राण ही न हो। जिसका भी लेटने को मन हो चुपचाप लेट जाए। हमें अपने को खो देना है।_
तो शरीर को रोकना नही। श्वास को देखते रहें और शरीर को ढीला छोड़ दे। शरीर बिलकुल निष्प्राण हो गया जैसे है ही नहीं और शरीर की तरफ से पकड़ छोड़ते ही मन बहुत गहराई मे चला जाएगा। शरीर की पकड़ छूटी कि मन से गहराई आई। श्वास पर ध्यान रखे और शरीर को निष्प्राण छोड़ दें।
_शरीर को बिलकुल ढीला छोड़ दें, क्योंकि तीसरे प्रयोग में वे ही जा सकेंगे जो शरीर से पकड़ छोड़ देंगे। शरीर बिलकुल ढीला छूट गया है। जो वह झुकता हो झुक जाए, गिरता हो गिर जाए,आप अपनी तरफ से शरीर को न सम्हाले। शरीर शिथिल हो गया है और श्वास भीतर व बाहर दिखाई पड़ रही है।_
यह ध्यान का गहरा प्रयोग है। तीसरे प्रयोग को भीतर में शुरू करें। श्वास दिखाई पड़ रही है कि भीतर आ रही है जा रही है, शरीर शिथिल छोड़ दिया है। ओंठ बिलकुल बंद रहे व जीभ तालु से लग जाए। भीतर वहन कर लें कि होठ बंद हो गए है व जीभ तालु से लग गई है।
_शरीर शिथिल है, श्वास देखी जा रही है। अब प्रयोग श्वास को देखते हुए ही साथ में मन में पूछने लगे कि मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? श्वास को देखते रहे, श्वास का देखना जारी रहे और भीतर तीव्रता से पूछे मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? भीतर मन में ही तीव्रता से पूछे मैं कौन हूं?_
इतनी तेजी से पूछे की दो पूछने के बीच जगह न रह जाए मैं कौन हूं? एक तूफान भीतर उठ जाए मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? इतने जोर से जैसे किसी बंद दरवाजे पर ठोकरें आई कि मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? इतने जोर से कि प्राण की पूरी शक्ति भीतर लग जाए पूछने में कि मैं कौन हूं?
जब भीतर पूछेगें मैं कौन हूं …सारा शरीर कंप जाएगा, प्राण कंप जाएगा, श्वास कंप जाएगी । सारी शक्ति लगा दें और प्रत्येक श्वास के पूछते रहें–मैं कौन हूं? एक दस मिनट इतनी तेजी से पूछे कि पसीना-पसीना हो जाए। सारी ताकत लगा दें। पूरी तरह से अपने को थका डाले।
_जितना पूछ सकते है उतना पूछ लें ताकि पीछे सब शांत हो जाए। मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? एक पांच मिनट पूरी शक्ति से भीतर पूछेें–मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? मैं कौन हूं? इतनी शक्ति से जिससे तूफान उठ जाए। फिर सब छोड़ देंगे और फिर शांत रह जाएंगे।_
जितने तूफान में जितनी आंधी में मन जाएगा उतनी ही गहरी शांति भी उपलब्ध होगी।मैं कौन हूं? यह प्राणी के पोर-पोर में गूंजने लगे। आखिरी ताकत लगा दें। इसके बाद अदभुत शांति में प्रवेश हो जाएगा।
_फिर दस मिनट के लिए हम बिना कुछ किए,जो है उसके साथ पड़े रह जाएंगे। फिर सब छोड़ देंगे श्वास भी, पूछना भी, देखना भी, फिर सिर्फ रह जाएंगे, पक्षियों की आवाज सुनाई पड़ेंगी, सागर की लहरों की आवाज सुनाई पड़ेेंगी, हवाएं पत्तों को हिलाएंगी।_
चारों तरफ जो हो रहा है उसमें डूब कर रह जाएं, उसके साथ एक हो जाए। यह पक्षियों की आवाज अलग न रहे, यह सागर की गर्जन अलग न रहे, सूरज की धूप अलग न रहे, अब दस मिनट के लिए कुछ भी न करें, बस इस विस्तार में डूब कर रह जाएं और मन परम गहराइयों को छुएगा।
_बहुत शांति में उतर जाएगा। अब धीरे-धीरे आंख खोल लें…आंख न खुले तो दोनों हाथ आंख पर रख लें और फिर धीरे-धीरे आंख खोलें। जो लोग लेट गए हैं वे धीरे-धीरे उठें। अगर उठना न बने तो उठने से पहले दो-चार गहरी श्वास लें फिर आहिस्ता-आहिस्ता उठें।_
झटके से कोई भी न उठे। लेकिन अगर बिलकुल उठते न बनें तो पड़े रहें, गहरी श्वास लें और फिर धीरे-धीरे उठें। एक व्यक्ति रो ले, तो उसके भीतर के कितने भार कट सकते हैं, इसका आपको पता नहीं हैं। आप उसको देख कर कुछ भी नहीं जान सकते कि उसके भीतर क्या हो रहा है।
*क्या हैं मूलभूत 3 सूत्र ?*
जिस अर्थ में शेष सब खोजा जा सकता है, स्व उसी अर्थ में नहीं खोजा जा सकता है। वहां जो खोज रहा है, और जिसे खोज रहा है, उन दोनों में दूरी जो नहीं है। संसार की खोज होती है, स्वयं की खोज नहीं होती और जो स्वयं को ही खोजने निकल पड़ते हैं।
_वे स्वयं से और दूर ही निकल जाते हैं। जो स्वयं आप हो, उसे कैसे खोजा जा सकता है … यह सत्य ठीक से समझ लेना आवश्यक है, तो खोज हो भी सकती है। संसार को पाना हो तो बाहर खोजना पड़ता है और यदि स्वयं को पाना हो तो सब खोज छोड़कर अनुद्धिग्ग और स्थिर होना पड़ता है।_
उस पूर्ण शांति और शून्य में ही उसका दर्शन होता है, जो कि “मैं हूं”। वास्तव में,खोज भी एक उद्दिग्नता है ..एक तनाव है। वह भी एक चाह और वासना है और वासना से आत्मा को नहीं पाया जा सकता है। वही तो बाधा है। वासना का अर्थ है कि मैं कुछ होना चाहता हूं या कि कुछ पाना चाहता हूं।
_और आत्मा वह है जो कि मुझे उपलब्ध ही है, जो कि मैं हूं ही। वासना और आत्मा की दिशायें विपरीत हैं। वे विरोधी आयाम। इसलिए, यह ठीक से समझ लें कि आत्मा को पाया तो जा सकता है, पर चाहा नहीं जा सकता है। आत्मा की कोई चाह नहीं हो सकती है।_
सब चाह सांसारिक है, और कोई भी चाह आध्यात्मिक नहीं है। वासना ही तो संसार है और सब वासना अज्ञान है ..बंधन है। फिर यह वासना धन की हो या धर्म की, पद की हो या प्रभु की, मद की हो या मोक्ष की, उसमें कुछ भेद नहीं है। वासना वासना है।
_लेकिन वासना का ज्ञान वासना से मुक्त कर देता है, क्योंकि वासना का ज्ञान उसके दुःखस्वरूप को प्रकट कर देता है। दुःख का बोध दुःख से मुक्ति है, क्योंकि दुःख को जानकर कोई दुःख को नहीं चाह सकता है। और उस क्षण जब कोई चाह नहीं होती है और चित्त वासना से विक्षुब्ध नहीं होता है।_
और हम कुछ खोज नहीं रहे होते हैं–उसी क्षण, उस शांत और अकंप क्षण में ही उसका अनुभव होता है, जो कि हमारा वास्तविक होना है। जब वासना नहीं होती है, तब आत्मा प्रकट होती है। आत्मा को मत चाहो, चाह को जानो और उससे मुक्त हो जाओ।
_तो तुम उसे जान लोगे और पा लोगे जो कि आत्मा है। जो अपने भीतर अंधेरे से भरा है, सारे जगत् में भी रोशनी हो, उससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जहां जाएगा, अपने अंधेरे को साथ ले जाएगा। कोई खोज सार्थक नहीं है, जब तक भीतर आलोकित न हो।_
वास्तव में,धर्म का विचार से कोई संबंध नहीं है। उसका संबंध निर्विचार से है। विचार तर्क है उससे उत्पत्तियां तो आती हैं, पर समाधान नहीं आता है। धर्म समाधान है। विचार का द्वार तर्क है और समाधान का द्वार समाधि है। समाधि शून्य चैतन्य हैं।
_चित्त शून्य हो पर जाग्रत हो, उस शांत स्थिति में सत्य के द्वार खुलते हैं। शून्य में ही सत्य का साक्षात होता है, और परिणामस्वरूप सारा जीवन परिवर्तित हो जाता है। शून्य तक, समाधि तक ध्यान से पहुंचते हैं। पर साधारणतः जिसे ध्यान समझा जाता है, वह ध्यान नहीं है। वह भी चिंतन ही है।_
हो सकता है कि वे विचार आत्मा के हों या परमात्मा के हों, पर वे भी विचार ही हैं। इससे भेद नहीं पड़ता है कि विचार किसके हैं। विचार मात्र वस्तुतः पर अन्य का या बाह्य का होता है। विचार मात्र अनात्म का होता है। “स्व” का कोई विचार नहीं हो सकता है।
_क्योकि विचार के लिए दो का होना जरूरी है। इसलिए विचार द्वैत के बाहर नहीं ले जाता है। अद्दैत में, स्व में चलना है, और उसे जानना है, तो विचार नहीं, ध्यान मार्ग है। विचार और ध्यान बिल्कुल विपरीत दिशाएं हैं–एक बहिर्गामी है, एक अंतर्मुखी है।_
साधारणतः तो यही समझा जाता है कि एकाग्रता ध्यान है। एकाग्रता ध्यान नहीं है। क्योंकि एकाग्रता में तनाव है। एकाग्रता का मतलब यह है कि सब जगह से छोड़ कर एक जगह मन को जबरदस्ती रोकना। तो मन को ऐसी अवस्था में छोड़ना है जहां कोई द्वंद्व ही नहीं है।
_तब तो ध्यान में आप जा सकते हैं। मन को निर्द्वंद्व छोड़ना है; जो मन से लड़ेगा उसकी हार निश्चित है। मन के भीतर जो व्यक्ति लड़ेगा, वह अपने को दो हिस्सों में तोड़ रहा है। जिससे लड़ रहा है, वह भी वही है; और जो लड़ रहा है, वह भी वही है।_
उन दोनों में से तो कोई नहीं जीतेगा, वह क्षीण और कमजोर हो जाएगा।अगर मन को जीतना हो तो पहला नियम यह है कि लड़ना मत बल्कि घंटे भर के लिए मन को विश्राम देना। तो विश्राम का सूत्र अलग हो जाएगा कि मन जैसा है हम उससे राजी हैं।
_अगर आप उससे नाराज हैं तो फिर विश्राम नहीं संभव हो सकता। क्योंकि नाराजी से लड़ाई शुरू हो जाएगी। मन जैसा भी है–बुरा और भला, क्रोध से भरा, चिंता से भरा, विचारों से भरा– हम उसी मन के साथ राजी हैं ..मन जो भी करेगा, हम चुपचाप बैठे देखते रहेंगे।_
ध्यान का अर्थ है बाहर से कोई संबंध न रह जाए अर्थात चित्त की बाहर के जगत में कोई गति न रह जाए। चित्त बिलकुल शून्य हो जाए ..अगति को उपलब्ध हो जाए। उस ठहरे हुए क्षण में, उस रुके हुए क्षण में जब सब रुक गया हो, थम गया हो–उस अवस्था का नाम ध्यान है।
_ध्यान शून्यता है। शून्यता में कोई बिंदु नहीं रह जाता जहां हम टिकते हों,हों कोई आधार नहीं रह जाता। सब निराधार हो जाता है।विचार “पर” को जानने का मार्ग है, ध्यान “स्व” को जानने का। ध्यान का अर्थ है क्रियाहीन होना। ध्यान क्रिया नहीं, अवस्था है।_
वह अपने स्वरूप में होने की स्थिति है। क्रिया में हम अपने से बाहर के जगत से संबंधित होते हैं। अक्रिया में स्वयं से संबंधित होते हैं। जब हम कुछ भी नहीं कर रहे हैं, तब हमें उसका बोध होता है जो कि हम हैं। अन्यथा, क्रियाओं में व्यस्त हम स्वयं से ही अपरिचित रह जाते हैं।
जब हममें कोई क्रिया नहीं होती है और यह विचार भी नहीं रह जाता है कि मैं हूं”। केवल बस “होना” मात्र ही रह जाता है। इसे ही शून्य समझें। यही वह बिंदु है जहां से संसार का नहीं, सत्य का दर्शन होता है। इस शून्य में ही वह दीवार गिर जाती है, जो मुझे स्वयं को जानने से रोके हुए है।
_विचार के पर्दे उठ जाते हैं और प्रज्ञा का आविर्भाव होता है। इस सीमा में विचार नहीं, जाना जाता है। यहां साक्षात दर्शन है। यहां न ज्ञेय न ज्ञाता है। यहां तो केवल ज्ञान ही है। तरंगें जब नहीं होती हैं, तब सागर के दर्शन होते हैं। और जब बादल नहीं होती हैं तो नीलाकाश के दर्शन होते हैं।_
यह सागर प्रत्येक के भीतर है, और यह आकाश प्रत्येक के भीतर है। हम इस आकाश को जानना चाहते हैं, तो निश्चय ही जान सकते हैं। इस आकाश तक पहुंचने का रास्ता भी है। वह भी प्रत्येक के ही पास है और हममें से प्रत्येक उस पर चलना भी जानता है।
_पर हम केवल एक ही दिशा में चलना जानते हैं। कोई भी रास्ता केवल एक दिशागामी नहीं हो सकता है। प्रत्येक राह अनिवार्यतः दो दिशाओं में, दो विपरीत दिशाओं में सत्ता रखती है। उसके होने के लिए ही यह अनिवार्य है कि वह एक ही साथ दो विपरीत दिशाओं में हो।_
अन्यथा वह हो ही नहीं सकती है। आने का और जाने का मार्ग एक ही है। वही मार्ग दोनों काम करेगा। मार्ग तो वही होगा, केवल दिशा वही नहीं होगी। “संसार” और “स्व” का मार्ग तो एक ही है। जो संसार में लाता है, वही स्वयं में भी ले जायेगा। केवल दिशा विपरीत होगी।
_अभी तक जो सामने था, वही अब पीछे होगा। और जो पीठ की ओर था, उस पर आंखें करनी होंगी।
रास्ता वही है, केवल हमें विपरीत मुड़ जाना है।सन्मुख से विमुख और विमुख से सन्मुख होना है।_
इन सूत्रों पर चलने से चित्त की वह स्थिति बनेगी जो कि शांति और सत्यानुभूति की साधना के लिए अत्यंत आवश्यक है।
*पहला सूत्र है वर्तमान में जीना :*
अतीत और भविष्य के चिंतन की यांत्रिक धारा में न बहें। उसके कारण वर्तमान का जीवित क्षण व्यर्थ ही निकल जाता है ।
_जबकि केवल यही वास्तविक है। न अतीत की कोई सत्ता है, न भविष्य की। एक स्मृति में है, एक कल्पना में। वास्तविक क्षण केवल वर्तमान है। सत्य को यदि जाना जा सकता है तो केवल वर्तमान में ही जाना जा सकता है। साधना के इन दिनों में स्मरणपूर्वक अतीत और भविष्य से अपने को मुक्त रखें।_
समझें कि वे हैं ही नहीं। जो क्षण पास है–जिसमें आप हैं, बस वही है। उसमें और उसे परिपूर्णता से जी लेना है। रात्रि में ऐसे सोयें जैसे सारा अतीत छोड़कर सो रहे हैं। अतीत के प्रति मर जावें। और सुबह–एक नयी सुबह में और एक नये मनुष्य की भांति उठें।
_जो सोया था वह न उठे। वह सो ही जावे। उसे उठने दें जो कि नित नया है। इस वर्तमान में जीने को सतत, चौबीस घंटे स्मरण रखें और होश रखें कि कहीं अतीत और भविष्य-चिंतन की यांत्रिक आदतें पुनः सक्रिय तो नहीं हो गयी हैं।अमूर्च्छा उन्हें तोड़ देती है।_
*दूसरा सूत्र है सहजता से जीना :*
मनुष्य का सारा व्यवहार कृत्रिम और औपचारिक है। एक मिथ्या आवरण हम अपने पर सदा ओढ़े रहते हैं। और इस आवरण के कारण हमें अपनी वास्तविकता धीरे-धीरे विस्मृत ही हो जाती है। इस मिथ्या आवरण को निकालकर अलग रख देना है।
_नाटक करने नहीं, स्वयं को जानने को एकत्रित हुए हैं। नाटक के बाद नाटक के पात्र जैसे अपनी नाटकीय वेशभूषा को उतारकर रख देते हैं, ऐसे ही आप भी अपने मिथ्या चेहरों को उतारकर रख दें। वह जो आप में मौलिक है और सहज है–उसे प्रकट होने दें और उसमें जियें।_
सरल और सहज जीवन में ही साधना विकसित होती है। साधना के दिनों में जानें कि न आपका कोई पद है, न कोई वैशिष्ट्य है, न प्रतिष्ठा है। उन सारी नकाबों को अलग कर दें।
_आप निपट आप हैं और अति साधारण मनुष्य हैं, जिसका न कोई नाम है, न कोई प्रतिष्ठा है, न कुल है, न वर्ग है, न जाति है। एक नामहीन व्यक्ति–एक अति-साधारण इकाई मात्र–ऐसे हमें जीना है। स्मरण रहे कि वही हमारी वास्तविकता भी है।_
*तीसरा सूत्र है अकेलेपन को स्वीकार कर जीना :*
साधना का जीवन अत्यंत अकेलेपन में, एकाकीपन में जन्म पाता है। पर मनुष्य साधारणतः कभी भी अकेला नहीं होता है। वह सदा दूसरों से घिरा रहता है और बाहर भीड़ में न हो तो भीतर भीड़ में होता है। इस भीड़ को विसर्जित कर देना है।
_भीतर भीड़ को इकट्ठी न होने दें और बाहर भी ऐसे जीयें कि जैसे आप अकेले ही हैं। किसी दूसरे से कोई संबंध नहीं रखना है। संबंधों में हम उसे भूल गये हैं जो कि हम स्वयं हैं। आप किसी के मित्र हैं या कि शत्रु हैं, पिता हैं या कि पुत्र हैं, पति हैं या कि पत्नी हैं।_
_ये संबंध आपको इतने घेरे हुए हैं कि आप स्वयं को अपनी निजता में नहीं जान पाते हैं। आपने अपने आपको अपने संबंधों के वस्त्रों से भिन्न करके भी कभी नहीं देखा है। सब संबंधों से अपने को उऋण कर लें और तब जो शेष बच रहता है, जानें कि वही आपका वास्तविक होना है। वह शेष सत्ता ही अपने-आप में हैं..स्व है। उसमें ही हमें जीना है।_
*(चेतना विकास मिशन)*





