रेणुका, कोलकाता
फेसबुक पर एक स्त्री होना क्या है
फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करते ही लोग
राफेल की गति से इनबॉक्स में एंट्री मारते हैं
किसी को हाय करनी है…
किसी को हैलो…
किसी को दोस्ती करनी है…
तो किसी को शादी…
कोई साथ में चाय पीना चाहता है…
तो कोई कॉफी..
कोई साथ में लंच करना चाहता है तो
कोई कैंडिल लाइट डिनर…
कोई किये जा रहा है लगातार मैसेंजर पर कॉल
कोई भेज रहा लव इमोजी
कोई भेज रहा फ्लाइंग किस….
कोई 15 साल का है…
कोई 50 साल का है…
तो कोई है 75 साल का…
सबको जानना है क्या करती हो,
कहां रहती हो,
कहां जॉब करती हो,
अकेले रहती हो…?
सब मोहित हैं चेहरे पर….
(चाहे चेहरा खूबसूरत हो या न हो,
या फेक प्रोफाइल हो)
सबको अच्छी लग रही है मासूमियत
सब डूब जाना चाहते हैं आंखों में
सब बांध रहे हैं पुल तारीफों के
सब लगे हैं साबित करने में
खुद को सबसे श्रेष्ठ आशिक…
इनबॉक्स में आने वालों की
उम्र, जाति, मजहब, नाम— सब अलग हैं,
लेकिन सबकी है एक सी नियत.
इतना आसान भी नहीं है
औरत होकर फेसबुक चला पाना…
और इतना भी आसान नहीं है
मैसेंजर का इनबॉक्स खोल पाना…
- जितने लोग मेरी पोस्ट पढ़ते, समझते, जानते हैं, मैं महिलावादी या Feminism की बिल्कुल भी समर्थक नहीं, फिर भी ये मेरा सोशल मीडिया के शुरुआती दिनों का अनुभव रहा है, जो शायद बहुत-सी महिलाओं की भी हो, इसलिए लिख दी, क्योंकि ये एक कड़ुवा सच है.





