मुनेश त्यागी
१. मंदिर, मस्जिद में जाकर घंटा घडियालों को बजाने से मुक्ति,
२. सुबह के अखबारों, टीवी चैनलों में राशिफल की बकवास से मुक्ति,
३. रोज-रोज के व्रत और त्योहारों से छुटकारा,
४. रोज-रोज मूर्तियों, तस्वीरों को भोग लगाने से बीमारी से छुट्टी,
५. त्यौहारों पर देवी-देवताओं की पूजा अर्चना से मुक्ति,
६. भांति भांति के तीर्थ स्थलों के चक्कर लगाने से मुक्ति,
७. चार धामों के चक्कर काटने से मुक्ति,
८. हर मंदिर के सामने नतमस्तक होने से निजात,
९. तमाम तरह की पूजा-अर्चनाओं से छुट्टी,
१०. शनिवार के दान-पुण्य से मुक्ति,
११. शनिवार को मिर्च और नींबू की बर्बादी से निजात,
१२. भांति भांति के जबरन लादे गए व्रतों से मुक्ति,
१३. डरावनी मूर्तियों और तस्वीरों को देखने से मुक्ति,
१४. आदमी को ऊंच-नीच, छोटा बड़ा और अछूत मानने की बीमारी से छुटकारा,
१५. धर्मांधता, श्रद्धांध्दता और अंधविश्वासों से मुक्ति,
१६. कुंडलियों के चक्कर से छुटकारा और
भूत प्रेत और ऊपरी बला की बीमारियों से निजात,
१७. रोज-रोज के पूजा पाठ से होने वाली समय की बर्बादी से मुक्ति,
१८. बिल्ली, नेवले या सवाल करने पर, घर लौट जाने की मानसिकता से बाहर,
१९. किसी कार्य की सफलता के लिए देवी देवताओं के सामने हाथ जोड़कर खड़े रहने से होने वाले समय की बर्बादी से निजात,
२०. नदियों, नहरों, तालाबों और कुंडों के चक्कर काटने से मुक्ति,
२१. सत्यनारायण की कथा और उसके करवाने में होने वाले हजारों रुपए के खर्च से निजात,
२२. पंडितों, मुलाओं द्वारा नर्क में जाने के डर से मुक्ति,
२३. 1,3,5,7,9, 11,13, 21,51 की संख्याओं को अशुभ मानने से छुटकारा,
२४. स्वर्ग और जन्नत में मिलने वाली अप्सराओं, हूरों और गिलमान के लालच से मुक्ति,
२५. जीवन मरण, स्वर्ग नरक, मुक्ति और आत्मा के आवागमन के वहम से छुटकारा,
२६. जीवन के अमृत्व की बीमारी से मुक्ति,
२७. ओझा, ताबीज, गंडा, राख की चुटकी से बीमारियां ठीक होने वाली मानसिकता से छुटकारा,
२८. देवी देवताओं के जागरण पर होने वाले हजारों हजार रुपए की बर्बादी और उनकी मान्यताओं से मुक्ति,
२९. बाबाओं, मांओं, डेरा, पीर, पंडो की शरण में जाकर समस्याओं के हल हो जाने की मान्यता से निजात मिल गई है।
३०. भगवान एक हसीन और कोरी कल्पना के अलावा और कुछ भी नही है। यह नाम और शक्ति आदमी ने अपने उदर पूर्ति, स्वार्थ, अयोग्यता, अज्ञानता, कमजोरी, कमी और अक्षमता को छिपाने के लिए और शोषण और अन्याय को कायम रखने के लिए की है। प्रकृति या आदमी को बनाने या उत्पन्न करने में उनका कोई हाथ नही है। हां आदमी और औरत को महामूर्ख बनाने के लिए इनका खूब प्रयोग और उपयोग किया जाता है और किया जा रहा है और कमाल है कि आदमी पढ़ लिख कर भी मूर्ख बन रहा है उसकी नादानी और नासमझी पर सिर्फ दया ही आती है।
इस दुनिया में कुछ भी होने या न होने का, कोई न कोई कारण और संबंध होता है, यहां कुछ भी अकारण या अपने आप नही होता है। यहां कोई देवी, देवता, सुपरनेचुरल पावर होने पर हमें कोई विश्वास नहीं है। हमारी कथनी करनी में कोई फर्क नहीं होना चाहिए। यहां जो कुछ भी दिखाई देता है, जो कुछ भी सुनाई देता है और जो भी प्राकृतिक रूप से मौजूद है, वह सब मनुष्य और प्राकृतिक शक्तियों के कारण होता है।
हमें अपने चारों तरफ सृजित किए जा रहे ज्ञान विज्ञान पर नाज होना चाहिए और हमें ज्ञान विज्ञान की आधुनिकतम उपलब्धियों और तकनीकों से अवगत रहना चाहिए और हमें अपने जीवन में और अपने समाज में ज्ञान विज्ञान और वैज्ञानिक संस्कृति का प्रचार प्रसार करते रहना चाहिए। हमें हर चीज को तर्क, विवेक, आलोचना, अन्वेषण, खोजबीन और संदेह की कसौटी पर परख कर देखना चाहिए। ऐसा करके हम सब देवी, देवताओं, खुदा, अल्लाह, गोड, भगवान की बीमारी और मानसिक विकृति से बच जाएंगे और सुखी जीवन जी पाएंगे।





