
हरनाम सिंह
वर्तमान का लेखन ही भविष्य का इतिहास बनता है, जिसके आईने में बहुत कुछ देखा जा सकता है। हर युग में इतिहास से पूछे जाने वाले सवाल वर्तमान के ही होते हैं। उनका जवाब मिलने में समय लगता है। भारत में औपनिवेशिक आजादी के लिए चलाए गए संग्राम में क्रांतिकारियों के योगदान पर बहुत कुछ लिखा गया है,आज भी लिखा जा रहा है। देश विभाजन के कारण इतिहासकारों के लिए क्रांतिकारियों के जीवन, उन्हें मिली सजा, उसके पूर्व अदालत में चले ट्रायल आदि की विस्तृत जानकारी नहीं थी। शनै: शनै: धुंध छंटने लगी जब क्रांतिकारियों से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक हुए। इनमें भगत सिंह ने किस तरह से आजादी के लिए चले संग्राम के दौरान केन्द्रीय विधान सभा के बाद अदालत का उपयोग किया था। यह अपने आप में अभूतपूर्व घटनाक्रम था।
भगत सिंह सहित अन्य क्रांतिकारियों के प्रति आमजन का सोच रोमानियत भरा रहा है। उन्हें नायक के रूप में पूजा जाता है। भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की तनी हुई मूछें हाथ या कमर में पिस्टल ऐसे ही चित्र समाज में प्रचलित हैं। पंजाब के लोक जीवन में भगत सिंह को गीतों के माध्यम से आज भी याद किया जाता है। इस रोमांटिज्म के कारण क्रांतिकारियों का रोजमर्रा का जीवन, वे कहां रहते थे, क्रांतिकारी गतिविधियों के अलावा वे क्या करते थे, उनके आपसी रिश्ते कैसे थे, पुलिस की जांच के दौरान उन्हें कैसी प्रताड़ना से गुजरना पड़ा था ? यह सब कभी चर्चा का विषय नहीं बन पाया। देश प्रेम से सराबोर आत्मोसर्ग के लिए बेचैन ये युवा आम नौजवानों जैसे ही थे। वे आपस में खुलकर एक दूसरे का मजाक बनाते थे, झगड़ते थे, गालियां देते थे। इन सब के बावजूद उनमें आपसी प्रेम, भाईचारा और एक दूसरे के प्रति विश्वास था। वैचारिक प्रतिबद्धता और लक्ष्य ने उन्हें जोड़े रखा। लक्ष्य था अंग्रेजों से आजादी प्राप्त करना।
संगठन में सभी क्रांतिकारियों की भूमिका अलग-अलग थी, लेकिन किसी का भी महत्व अन्य किसी सदस्य से कम नहीं था। रणनीति बनाना, बम तैयार करना, पिस्तौल की व्यवस्था करना, रेकी करने के अलावा अपने अड्डे पर रसद का इंतजाम करना, भोजन बनाना ये सब अलग-अलग परंतु महत्वपूर्ण काम थे। लेकिन इतिहास में सभी क्रांतिकारियों को उतना महत्व नहीं मिल पाया।
भूमिगत अवस्था में जय गोपाल सदैव घरेलू नौकर की भूमिका निभाता था। कई बार बतौर नौकर पड़ोसी भी उससे काम ले लेते थे और वह कभी इंकार भी नहीं करता था। आवरण बनाए रखने के लिए यह जरूरी था।
अमूमन क्रांतिकारियों को वयस्क और परिपक्व स्वरूप में देखा जाता है। हमें समझना होगा कि उनकी औसत आयु 22 वर्ष से अधिक नहीं थी उनसे बहुत अधिक अपेक्षा करना उचित नहीं है ।
वर्ष 1924 में राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा गठित (एच आर ए) हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में भगत सिंह ने सोशलिस्ट शब्द जोड़कर आजादी के लक्ष्य को विस्तारित किया था। 1927 में काकोरी रेल कांड में बिस्मिल और अन्य क्रांतिकारियों को मिली फांसी की सजा के पश्चात 1928 में फिरोज शाह कोटला में चंद्रशेखर आजाद ने संगठन का पुनर्गठन किया था।
1970 के दशक के पूर्व तक भगत सिंह और क्रांतिकारियों के बारे में तथ्य कम संस्मरण अधिक थे। जीवित बचे क्रांतिकारी यशपाल, अजय घोष, शिव वर्मा, मन्मथनाथ गुप्त की पुस्तकों से ही जानकारी मिलती थी। भगत सिंह की जेल डायरी और उस मुकदमे (लाहौर षड्यंत्र केस) जिसमें भगत सिंह और उसके साथियों को फांसी दी गई थी उसके ट्रायल के दस्तावेज सामने आने के बाद बहुत सारी जानकारी उजागर हुई।
#पाकिस्तान से मिली फाइल
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना संयुक्त भारत के गुजरांवाला में हुई थी। विभाजन पश्चात भारत के हरिद्वार में इस विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना हुई। यहां के कुलपति प्रोफेसर स्वतंत्र कुमार वर्ष 2009 में एक आयोजन में सम्मिलित होने के लिए पाकिस्तान गए थे, जहां उनकी मुलाकात पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्ति न्यायाधीश खलिलुर्रहमान रमदे से हुई। लाहौर में प्रोफेसर स्वतंत्र कुमार को न्यायालय का वह कक्ष दिखाया गया जिसमें भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु पर मुकदमा चलाया गया था। मुकदमे से संबंधित दस्तावेज भी दिखाए गए। स्वतंत्र कुमार ने न्यायाधीश श्री रमदे से इन दस्तावेजों की प्रतिलिपि दिलवाने का अनुरोध किया। उनके पाकिस्तान से लौट आने के चार माह पश्चात लाहौर षड्यंत्र केस मुकदमे के ट्रायल की 1667 पन्नों की प्रतिलिपि गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार में डाक से पहुंच गई। उर्दू, फारसी के उन दस्तावेजों के अनुवाद से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। अनुवाद के लिए पाकिस्तानी नागरिक लक्ष्मण शर्मा को हरिद्वार बुलाया गया। श्री शर्मा ने लगभग साढ़े तीन साल में 1667 पन्नों का हिंदी में अनुवाद किया।
#सुर्खियों में रहे भगत सिंह
भगत सिंह और उनके साथियों के विचार तो बहुत ऊंचे थे लेकिन उनकी उम्र और क्रांतिकारी जीवन बहुत छोटा था। भगत सिंह पुनर्गठित हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में 1928 में शामिल हुए इसी वर्ष लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए स्कॉट के स्थान पर सांडर्स पर गोली चलाई गई थी। तत्पश्चात भगत सिंह भूमिगत हो गए और वे 1929 में असेंबली में प्रकट हुए जहां उन्होंने बम फेंक कर “बहरों को जगाया।” वहां से गिरफ्तार हुए और 1931 में शहादत पाई। 1928 से 31 तक के इन 3 वर्षों ने भारत के इतिहास को बदल दिया।
भगत सिंह अदालत का उपयोग अपने क्रांतिकारी विचारों के प्रचार मंच के रूप में करना चाहते थे, जिसमें वे सफल रहे। लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से कुख्यात यह मुकदमा सन 1929 के जून माह में शुरू हुआ 6 जून को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अदालत में जो ऐतिहासिक बयान दिया उसकी गूंज आज भी वर्तमान संदर्भों में सुनी जा सकती है। 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा घोषित हुई और 23 मार्च 1931 को उन्होंने शहादत पाई। इन क्रांतिकारियों को फांसी पर चढ़ाए जाने के पूर्व ही चंद्रशेखर आजाद शहीद हो चुके थे। भगत सिंह के मुकदमे की अवधि 21 माह तक थी इन महीनों के दौरान शायद ही कोई दिन बीता होगा जब ये क्रांतिकारी अखबारों की सुर्खियों में न रहे हों।
इसी दौरान क्रांतिकारियों की आत्मछवी का निर्माण भी हो रहा था। इसके पूर्व तक देशवासी क्रांतिकारियों की गतिविधियों पर विशेष ध्यान नहीं देते थे। वे उन्हें सिरफिरे, अधीर और समय से पहले आजादी की मांग करने वाले समझते थे। लाहौर में चले मुकदमे की रिपोर्टिंग रोज अखबारों में छप रही थी। उस प्रचार ने देशवासियों का ध्यान इनकी और आकृष्ट किया। ट्रायल के दौरान अखबारों की भाषा भी बदलने लगी क्रांतिकारियों को सम्मान और सहानुभूति की नज़र से देखा जाने लगा। अखबारों में मिले प्रचार का लाभ क्रांतिकारियों के आंदोलन को मिला।
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