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*बिहार एक बार फिर देश को रास्ता दिखाएगा*

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लाल बहादुर सिंह

बिहार चुनाव की तारीखों की घोषणा हो चुकी है और 6 तथा 11 नवंबर को दो चरणों में चुनाव हो रहा है और 14 नवंबर को चुनाव नतीजों की घोषणा हो जाएगी। चुनाव में आमने-सामने महागठबंधन और एनडीए हैं हालांकि प्रशांत किशोर तीसरा कोण बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जहां 6 नवंबर का चुनाव गंगा के दोनों तरफ के अंदरूनी जिलों में होगा, वहीं 11 नवंबर का चुनाव विभिन्न सीमावर्ती जिलों में होगा।

अभी दोनों गठबंधनों में किसी ने अपना सीट बंटवारा का ऐलान नहीं किया है लेकिन दोनों गठबंधनों के अंदर सीटों को लेकर रस्साकसी जारी है। ऐसा लगता है कि ज्यादा तीखी मोलतोल एनडीए में हो रही है। जहां जदयू एक सीट ही सही भाजपा से अधिक लेकर अपने को बड़ा भाई साबित करने पर आमादा है। वहीं चिराग पासवान 40 सीटों के लिए दावेदारी कर रहे हैं तो हम पार्टी के जीतन राम मांझी कम से कम 15 सीटों पर लड़ने का ऐलान सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं। उनका कहना है कि उन्हें उपमुख्यमंत्री नहीं बनना है लेकिन अपनी पार्टी को इतनी सीटें दिलवानी हैं जिससे बिहार में पार्टी को राज्यस्तरीय पार्टी का दर्जा मिल जाए। उधर उपेंद्र कुशवाहा की भी पार्टी है।

ऐसी चर्चा है कि सन ऑफ मल्लाह की विकासशील पार्टी पर भी भाजपा की निगाह है। गौरतलब है कि पिछली बार भी यह पार्टी महागठबंधन का हिस्सा थी लेकिन अंतिम क्षणों में छिटककर उससे अलग हो गई थी। अबकी बार उसके नेता महागठबंधन के साथ रहने की ही कसमें खा रहे हैं लेकिन अगर मनचाही सीटें नहीं मिलीं तो पाला बदलते उन्हें देर नहीं लगेगी। यह भी देखने की बात होगी कि भाजपा जदयू को अपने से अधिक सीटें देने पर तैयार होती है या नहीं।

महागठबंधन में यह बात साफ हो जाने के बाद कि कांग्रेस ही पिछले चुनाव में उसकी सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई थी, कांग्रेस अपने बढ़े हुए प्रोफाइल के कारण फिर अधिक सीटें मांग रही है। निश्चय ही 2024 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सीटें दोगुना करने और राहुल गांधी की हाल ही में अन्य नेताओं के साथ वोट चोरी को लेकर की गई यात्रा को मिले अपार समर्थन ने उनके नेताओं का आत्मविश्वास बढ़ाया है। बताया जा रहा है कि उन्होंने अपने सबसे मजबूत इलाकों में 25 प्रत्याशियों का नाम तय भी कर लिया है।

उधर भाकपा माले ने भी 40 सीटों पर दावा ठोंका है। यहां यह याद रखना होगा कि पिछले चुनाव में सबसे अच्छा स्ट्राइक रेट भाकपा माले का ही था जिसने 19 में से 12 सीटें जीत ली थीं। इसके अलावा माले एक जनांदोलन की पार्टी के बतौर लगातार सक्रिय रही है इसलिए बेशक उसके दावे में दम है।

जहां तक मुद्दों की बात है, वे अनगिनत हैं। नीतीश कुमार के 20 साल के शासन के बाद बिहार आज देश का सबसे पिछड़ा और गरीब राज्य है चाहे जिस भी पैमाने पर नाप लिया जाए। यहां प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है। यह सबसे अधिक निरक्षरों का राज्य है। स्वास्थ्य सुविधाएं सबसे खस्ता हाल हैं। अच्छी शिक्षण संस्थाओं का अकाल है। औद्योगिकरण नगण्य है। यहां तक कि पहले जो चीनी मिलें थीं वे भी बंद हैं। जिन मिलों के बारे में स्वयं प्रधानमंत्री वायदा करके गए थे, वे तक फिर से नहीं खुल पाई हैं। बिहार देश का वह राज्य है जहां जेन ज़ी की आबादी का अनुपात सर्वाधिक है, दूसरी ओर अच्छी शिक्षा और रोजगार के अवसरों का घोर अभाव है। न तो पढ़े लिखे लोगों के लिए रोजगार के अवसर हैं, न ही अशिक्षित शारीरिक श्रम करने वालों के लिए।

यही कारण है कि बिहार से सबसे ज्यादा पलायन है। छात्र वहां से पलायन कर दिल्ली और अन्य विश्वविद्यालयों की ओर जा रहे हैं , तो नौकरियों और काम की तलाश में पंजाब से लेकर महाराष्ट्र, तमिलनाड तक जा रहे हैं और हर तरह का अपमान झेलने को अभिशप्त हैं। दरअसल बेरोजगारी के संकट ने हर जगह फासीवादी संगठनों को जन्म दिया है, जो प्रवासियों को मुद्दा बना रहे हैं और उनके ऊपर तरह तरह के हमलों के माध्यम से अपनी राजनीति चमका रहे हैं।

बेरोजगारी इतना बड़ा मुद्दा है कि पिछले चुनाव में इसी एक मुद्दे को जोरशोर से उठाकर तेजस्वी और महागठबंधन करीब करीब चुनाव जीतने के नजदीक पहुंच गए थे। जाहिर है इस चुनाव में भी ये ज्वलंत और बुनियादी मुद्दे ज्यों के त्यों कायम हैं बल्कि उनकी तीव्रता और बढ़ी ही है। पिछले पांच साल लगातार छात्र युवा प्रतियोगी परीक्षार्थी सड़कों पर उतरते रहे और नीतीश भाजपा सरकार की लाठी और आंसू गैस का सामना करते रहे। जाहिर है यह सवाल आज भी बेहद प्रासंगिक बना हुआ है।


प्रशांत किशोर भी इन्हीं मुद्दों को उठाकर विभिन्न समुदायों के विशेषकर युवाओं को अपने पक्ष में जीत लेने की कोशिश कर रहे हैं।

इन्हीं सवालों को चुनाव में बड़ा मुद्दा बनने से रोकने के लिए चुनाव के ऐन पहले मोदी सरकार की मदद से नीतीश कुमार ने खजाना खोल दिया। महिलाओं के खाते में दस हजार से लेकर युवाओं को भत्ता, किसानों के खाते में पैसे से लेकर बुजुर्गों को पेंशन तक।


बिहार के लोग वैसे आर्थिक रूप से जितने गरीब हैं, राजनीतिक रूप से उतने ही परिपक्व हैं।

यह देखना होगा कि विपक्षी महागठबंधन रोजगार, कृषि विकास, औद्योगिकरण, पलायन जैसे सवालों को बढ़ा मुद्दा बना पाता है? यदि ऐसा हो पाया तो रेवड़ियां बांटकर चुनाव जीत लेने की मोदी नीतीश शाह की सारी चालाकी धरी रह जाएगी और बिहार की जनता एक बार फिर देश को रास्ता दिखाएगी।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।) 

Ramswaroop Mantri

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