अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

बलात्कारों, हत्यायों की सजा काटते राम रहीम की शरण में फ़िर भाजपा सरकार

Share

       पुष्पा गुप्ता 

    आज़ाद भारत के इतिहास में यह अवश्य ही पहली बार हुआ होगा कि हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में सज़ा काट रहे किसी व्यक्ति को सात सालों में 306 दिन की पैरोल मिली हो।

      जेल जाने के बाद से बाबा गुरमीत राम रहीम को अब तक 12 बार पैरोल दी गयी है और आठ बार पैरोल चुनाव से ठीक पहले मिली है। इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र एक बार फिर इस बलात्कारी बाबा को पैरोल मिली है। इस बार यह पैरोल 30 दिन की है। इससे पहले हरियाणा राजस्थान व लोकसभा चुनाव में राम रहीम को पैरोल मिल चुकी है।

      ज्ञात हो कि दिल्ली में भी राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा के अच्छे-ख़ासे अनुयायी हैं। यही कारण है कि भाजपा उसे इस समय पैरोल पर छुड़ा कर लायी है। एक तरफ़ बलात्कारी बाबा को पैरोल पर पैरोल मिली जा रही है, वहीं दूसरी तरफ़ जनता के हक़ की बात करने वाले तमाम बुद्धजीवी और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बिना चार्ज़शीट के भी सालों साल जेल में रखा जाता है और बीमार पड़ने पर भी बेल नहीं दी जाती। 

     स्टेन स्वामी-साईं बाबा को आप भूले नहीं होंगे, जिन्हें झूठा आरोप लगा कर यू.ए.पी.ए लगा दिया गया था। जेल की बद्तर परिस्थितियों में रहने के कारण ही उनकी मौत हुई। वहीं राम रहीम जैसा बलात्कार व हत्या का आरोपी खुले आम समाज में घूमकर भाजपा का प्रचार कर रहा है। सहज़ ही समझा जा सकता है कि फ़ासीवादी हिन्दुत्ववादी भाजपा का ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा महज़ एक ढकोसला है, बल्कि इनका असली नारा है ‘बलात्कारियों के सम्मान में भाजपा मैदान में’।

      भारत जैसे देश में जहाँ आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा ऐतिहासिक तौर पर वैज्ञानिक चेतना की कमी और बौद्धिक पिछड़ेपन का शिकार है, वहाँ तमाम तरह के बाबाओं का माया जाल फैला हुआ है, तथा इन बाबाओं ने लोगों की आस्था का फ़ायदा उठाकर उनकी आँखों पर अन्धविश्वास और अतार्किकता की पट्टी बाँध दी है। 

       धर्म राजनीतिक व चुनावी समीकरण तय करने में बेहद ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यही कारण है कि इन तमाम बाबाओं को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। इनके काले धन्धे क़ानून व राजनीति की देखरेख में फलते-फूलते हैं, जिसके बदले में इन चुनावी पार्टियों को इन बाबाओं के अनुयायियों का वोट बैंक हासिल होता है। 

     धर्म और राजनीति के नापाक गठजोड़ का यह नंगा नाच जिस बेशर्मी के साथ भाजपा के सत्ता में आने के बाद हो रहा है शायद ही पहले कभी हुआ हो।

भाजपाई नेताओं व मंत्रियों द्वारा आसाराम, राम रहीम से लेकर तमाम बाबाओं के मंचों पर जाकर नतमस्तक होना कोई नई परिघटना नहीं है और ना ही किसी से छुपी है। लेकिन बेशर्मी की इन्तेहा तब हो जाती है जब भाजपा सरकार व भाजपाई नेता ऐसे सज़ा काट रहे अपराधियों के बार-बार जेल से बाहर आने की योजनाबद्ध रूपरेखा तैयार करते हैं और फिर इनके मंचों पर जाकर नतमस्तक होकर वोटों की भीख माँगते हैं।

      भगतसिंह ने कहा था कि धर्म हर व्यक्ति का निजी मसला होना चाहिए व सार्वजनिक जीवन तथा राजनीति से अलग होना चाहिए। आज धर्म व राजनीति मिलकर इस देश की आवाम की किस्मत तय कर रहे हैं तथा उन्हें नफ़रत के कुएँ में धकेल रहे हैं। इसलिए हमारा मानना है कि धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल पूरी तरह से प्रतिबन्धित होना चाहिए। 

  क्या जनतंत्र की आधार जनता यह नहीं चाहेगी कि,

(1) ऐसे सज़ायाफ़्ता बाबाओं को पैरोल पर बाहर निकालने वाले तमाम ज़िम्मेदार नेताओं व अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए?

(2) राम रहीम के पैरोल को तत्काल रद्द किया जाना चाहिए?

ReplyReply to allForwardAdd reaction

Ramswaroop Mantri

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें