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*भाजपा सरकार मनुवादी साम दाम दंड भेद वाली राजनीति का उपयोग करसत्ता पर काबिज हुई!* 

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 -सुसंस्कृति परिहार 

दुनियां के सबसे बड़े संविधान के तहत भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में लोकतंत्र की स्थापना का सम्मान दुनिया भर में हुआ है। महिलाओं को वोट के अधिकार के साथ देश के प्रत्येक व्यक्ति को समानाधिकार मिला।अमीर गरीब, दलित पिछड़ा,लंगड़े लूले और सभी को सिर्फ एक वोट देने का अधिकार मिला।पहले वोट देने की वय 21वर्ष थी जिसे देश के युवा प्रधानमंत्री ने 18 वर्ष कर युवकों की भागीदारी बढ़ाई।ताकि देश की युवा पीढ़ी देश को आगे बढ़ाने में सहयोग करें।

संविधान में निष्पक्ष चुनाव हेतु स्वतंत्र इकाई चुनाव आयोग का गठन किया गया जिसमें तीन सदस्य रखे गए ताकि एक या दो की मनमानी ना चल सके।वे थे सीजेआई, प्रतिपक्ष नेता और सत्ता रुढ़ सरकार का एक सदस्य। चुनाव आयोग बराबर आचार संहिता के उल्लंघन पर कार्रवाई करता था। चुनाव ड्यूटी करने वाले अधिकारियों का क्रेज़ होता था।आज भी जब पीएम चुनाव फ़ार्म दाखिल करने जिला कलेक्टर के दर पर जाते हैं तो कुर्सी पर बैठे हुए वह सामने खड़े अभ्यर्थी से फार्म लेता है।

लेकिन सन् 2014 के चुनाव में जिस तरह षड्यंत्र पूर्वक कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के मनगढ़ंत आरोप बनाकर तिरंगे झंडे के साए में बैठकर संघियों ने देश की जनता को गुमराह किया और बाबरी ढांचे को गिराकर राम मंदिर बनाने के ताप को बढ़ाकर हिंदुत्व की डुगडुगी पीटी। लोकतांत्रिक देश में वोट का ध्रुवीकरण पहली बार किया गया।जो लोकतंत्र के लिए कलंक था। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने जबकि देश को दुनियां में फैली आर्थिक मंदी से अपने अपने अर्थशास्त्र के ज्ञान से बचाया। मनमोहन जी ने देश के विकास हेतु कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। दिक्कत सिर्फ़ यह रही वे चुपचाप काम करते रहे। कामों को विज्ञापित नहीं किया ना सभाओं में आत्मप्रचार किया।इस एक बड़ी चुप्पी के कारण वे ‘मौन’ मोहन सिंह तक कहलाए। जबकि कांग्रेस पर लगे सारे भ्रष्टाचार के आरोप भाजपा के कार्यकाल में ही अदालतों ने खारिज किए। इस चुनाव में अंबानी और अडानी ने इसके पूर्व के चुनावों से सैकड़ा गुना निवेश किया। यह मोदीजी के प्रिय गुजराती कारोबारी थे। इस तरह पहली बार भाजपा सरकार मनुवादी साम दाम दंड भेद वाली राजनीति का उपयोग कर ,लोकतांत्रिक चुनाव में इस्तेमाल कर सत्ता पर काबिज हुई।

फिर आया 2019का चुनाव इसमें लटके झटके अवाम समझने लगी थी क्योंकि वह जुमलेबाजी का शिकार हो चुकी थी। कारोबारी मित्रों के लिए पीएम ने सौ से अधिक विदेश यात्राएं की उन्होंने ने चुनावी सहयोग के एवज में देश को जी जान से लूटा उनके लिए देश की सम्पत्ति  बेचकर नंबर टू तथा पहुंचा दिया।देश में मंहगाई की खाई में चौगुनी वृद्धि हुई।अंबानी अडानी की लूट देश की अवाम को दिखाई पड़ने लगी थी। चूंकि अब सत्ता उनके हाथ में थी उन्होंने स्वतंत्र इकाईयों को दबोचकर मनमाने आरोप लगवाकर जांच एजेंसियों के छापे डलवाकर बड़े पैमाने पर लोगो को दहशत के वशीभूत हो दलबदल कर पार्टी में प्रवेश दिलाया। भाजपा की वाशिंग मशीन में बिराजमान गंगा ने उनके पाप धो डालें।भाजपा के पाले में आने वालों की कतार लग गई। तमाम गंदी राजनीति में संपृक्त लोग इस गटर में धवल होते रहे। यहां तक कि कई  प्रदेशों की सरकार भी इस तरह गिराई गईं। भाजपा का ग्राफ बढ़ता दिख रहा था किंतु कुछ प्रतिबद्ध भाजपाई और संघी इससे मन ही मन अप्रसन्न थे।इस आपाद संकट में विदेश से ईवीएम हैकिंग की तरकीब ने इसे इतनी बढ़त दे दी कि जनता अवाक रह गई।विपक्ष की सांसें उखड़ने लगीं। आवाज़ें उठीं तो उन्हें कुचल दिया गया।

अब आया 2024 का आमचुनाव। इसमें एक तो प्रतिपक्ष ने एकजुट होने की कोशिश की इंडिया गठबंधन बनाकर।दूसरा हैकिंग पर नज़र रखने की कोशिश की गई ।चुनाव आयोग को मय सबूतों के प्रमाण भी दिए किंतु क्या होता है जब सैंया भए कोतवाल। चुनावी धांधली को इस बार अदालत ने समझा है।मामले जारी हैं। इसलिए इस बार हैकिंग की जगह नया खेला होने का प्लान  बनाया गया। हालांकि यह पिछले चुनावों में आजमाया फार्मूला  था।याद करिए 2014के आमचुनाव   चुनाव को जब  बनारस में दो लाख वोटर बढ़ गए थे। प्रधानमंत्री का मामला था।बात आई गई हो गई। लेकिन इस चुनाव में प्रतिपक्ष की इतनी दबिश रही कि सभी क्षेत्रों में वे वोटरों की संख्या उतनी नहीं बढ़ा पाए जो चार सौ पार की बात कर रहे थे वे सिमट गए सिर्फ 240 पर। तीसरी बार सत्ता दो वैशाखियों से मिल पाई।

अब अगले आमचुनाव की तैयारी से पहले बिहार राज्य चुनाव में जो एस आईआर आया है।वह चोरी हालांकि पकड़ी गई है।जिसका उद्देश्य था कि इस चुनाव में विपक्षी पार्टी के वोटर्स को चुनाव से दूर करना था। फिलहाल चुनाव आयोग काम में तो लगा है किंतु उसकी चूलें हिल चुकी हैं। सुको ने भी आधार कार्ड और मतदाता परिचय पत्र के आधार पर वोट डालने की हिदायत दी है। जिससे अब एसआईआर इतना असर कारक नहीं होगा।

कुल मिलाकर भाजपा चुनाव जीतने की कशिश में अब तक जितने हथकंडों का प्रयोग कर चुकी है।वे यह बताते हैं कि यह पार्टी लोकतांत्रिक भावना का सिरे से दमन कर येन केन प्रकारेण सत्ता पर बने रहना चाहती है। इसलिए मनुवादी हथियार साम दाम दंड भेद का सहारा लेती है। लोकतांत्रिक देश में एक परिपक्व संविधान की ओट में यह सब जो चल रहा है उसका ज़ोरदार विरोध होना ही चाहिए।यह देश की लोकप्रियता गरिमा का भी सवाल है।

Ramswaroop Mantri

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