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ब्राह्मणवादी व्यवस्था और समता का संघर्ष: एक समकालीन विमर्श

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तेजपाल सिंह तेज

          समकालीन भारत की राजनीति और समाज-संरचना को समझने के लिए केवल हालिया घटनाओं को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है; इतिहास के वे धब्बे और लगातार बहती सामाजिक धाराएँ भी समझनी होंगी जो आज के संघर्षों को रूप देती हैं। प्रो. जावेद पाशा के भाषण-निबंध का केंद्रबिंदु यही है: आज दिखाई देने वाला धार्मिक और जातीय टकराव ज़्यादातर सत्ता के केंद्रीकरण और एक दीर्घकालिक सामाजिक ढाँचे — जिसे वे ‘ब्राह्मणवादी व्यवस्था’ कहते हैं — के प्रतिफल हैं। इसका अध्ययन करने से न केवल हिंसा के तात्कालिक कारण समझे जा सकते हैं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान की रूपरेखा भी उभरती है।

          भारत के समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को समझने के लिए इतिहास की उन निरंतर धाराओं को देखना आवश्यक है जो सदियों से चली आ रही असमानताओं और सत्ता-संरचनाओं से जुड़ी हैं। प्रो. जावेद पाशा के भाषण का केंद्रीय कथन यही है कि आज के धार्मिक और जातीय टकराव का मूल कारण किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्रीकरण से उपजा वह व्यापक सामाजिक ढाँचा है जिसे वे ‘ब्राह्मणवादी व्यवस्था’ कहते हैं — एक ऐसी व्यवस्था जो समय के साथ अपने रूप बदलती रही पर उसका नियंत्रण करने का यत्‍न और मानसिकता नियत रही है।

          यह शोषण का इतिहास नया नहीं है; इसमें बौद्धों पर अत्याचार, जैनों के दमन, दलितों के सतत दर्जे का अपमान और धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध अक्सर सामने आने वाली हिंसा सभी शामिल हैं। पाशा का तर्क है कि अलग-अलग युगों में अलग-अलग रूप दिखाई देने के बावजूद पीछे एक ही सांस्कृतिक-राजनीतिक वर्ग रहा है जिसने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए समुदायों और विचारों को नियंत्रित किया — “व्यवस्था बदलती है — पर नियंत्रण करने वाली मानसिकता वही रहती है।”

          वे इस व्यवस्थात्मक नियंत्रण को तीन बड़े स्तम्भों में बाँटते हैं: धार्मिक/सांस्कृतिक क्षेत्र, राजनीति, और शासन-प्रशासन। इन तीनों का संयुक्त प्रभुत्व ही उन लाखों मेहनतकश लोगों के जन्मसिद्ध और आर्थिक अधिकारों को सीमित करता आया है। जब संस्कृति, नीति और शासन एक ही दिशा में सहायक हो जाएँ, तो सामाजिक असमानताओं को चुनौती देना कठिन हो जाता है — यही पाशा की चिंता का मूल बिंदु है।

          भाषण का एक प्रमुख दावा यह भी है कि यह व्यवस्था बेहद लचीली है; वह बाहरी दबाव आने पर अपना स्वरूप बदल लेती है और विरोधी विचारधाराओं के भीतर ही प्रवेश कर सत्ता का केंद्रीकरण कर लेती है। मस्जिदों में पृष्ठभूमि बदली मौलवियों का उदय हो, चर्चों में पुरोहित-समान प्रभुत्व बनना हो, या बौद्ध विहारों में जातिगत अनुशासन का घुस आना — सब वही रणनीति का हिस्सा हैं। संक्षेप में उनका सूत्र है: प्रवेश करो → नेतृत्व हासिल करो → दिशा बदल दो — अर्थात् विरोध को भीतर से तबाह कर देना।

          इसके सामने सामाजिक आंदोलनों की एक दूसरी धारा है — फुले, शाहू, अंबेडकर और उनकी समता-आधारित परंपराएँ — जो मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर खड़ी हैं। पाशा का कहना है कि असली टकराव धार्मिक पहचान के नाम पर नहीं, बल्कि मानव-समानता की मांग और व्यवस्था के वर्चस्व के बीच है। जब समाज के उपेक्षित वर्ग अपनी समता की मांग उठाते हैं, तब ही यह स्पष्ट होता है कि संघर्ष का स्वरूप असल में अधिकारों और सत्ता के बीच है, न कि केवल धार्मिक भावनाओं के संघर्ष तक सीमित।

          आज के संदर्भ में पाशा चेतावनी देते हैं कि खतरे के स्वरूप बदल चुके हैं: सामाजिक नफ़रत अब केवल सड़क या भीड़ तक सीमित नहीं रही, वह शिक्षा संस्थानों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सार्वजनिक नीतियों में भी उतर आई है; अल्पसंख्यक और वंचित समुदाय हिंसा और अलगाव झेल रहे हैं; और संवैधानिक अधिकार कई बार सिर्फ़ कागज़ों पर सिमट कर रह गए हैं। वे यह संकेत देते हैं कि “क़ानून बदले बिना भी व्यवस्था बदली जा सकती है” — यानी, औपचारिक नियम ज्यों के त्यों रहते हुए भी संस्थागत व्यवहार और सत्ता-संरचना में बदलाव आ सकता है, जो वास्तव में खतरनाक है।

          समाधान के रूप में पाशा धार्मिक पहचान बदलने का आग्रह नहीं करते; वे समानता पर आधारित एकजुटता, संगठित राजनीतिक रणनीति और संवैधानिक अधिकारों की दृढ़ रक्षा पर ज़ोर देते हैं। उनका विश्वास है कि फुले–शाहू–अंबेडकर की वह परंपरा, जिसने विचारों को न्याय और मानवाधिकारों के केंद्र में रखा, वही वास्तविक मुक्ति का मार्ग दिखा सकती है। दूसरे शब्दों में, व्यक्तिगत विश्वासों के बीच सह अस्तित्व संभव है, पर सामाजिक और राजनीतिक समानता के बिना वह सह अस्तित्व सतही ही रहेगा।

ऐतिहासिक परतें: शोषण की निरंतरता:

          इतिहास के पन्नों को पलटने पर जो तस्वीर उभरती है, वह संकुचित नहीं बल्कि परतदार है। बौद्ध और जैन समुदायों के साथ हुए उत्पीड़न, दलितों के साथ जारी भेदभाव और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर समय-समय पर प्रकट होने वाली हिंसा — ये सब अलग-अलग युगों के अलग-अलग घटनाक्रम हैं, पर स्रोत में अक्सर वही एक संरचनात्मक प्रवृत्ति दिखती है। पाशा का तर्क है कि अलग-अलग रूपों में दिखाई देने वाली यह प्रवृत्ति—सांस्कृतिक प्रभुत्व, आर्थिक और प्रशासनिक नियंत्रण—एक ही सांस्कृतिक-राजनीतिक वर्ग के मनोभावों और रणनीतियों का परिणाम है। व्यवस्था बदलती है, रूप बदलता है; पर सत्ता को बनाए रखने की मानसिकता और तरीक़े अक्सर एक जैसे ही रहते हैं।

तीन स्तंभ: संस्कृतिराजनीति और शासन:

          पाशा व्यवस्था के प्रभाव को तीन मुख्य स्तंभों से जोड़ते हैं—धार्मिक/सांस्कृतिक क्षेत्र, राजनीति और प्रशासन। जब ये तीनों परस्पर सहायक बन जाते हैं, तब न केवल सामाजिक असमानताएँ मजबूत होती हैं, बल्कि वे अधिकारों और संसाधनों तक पहुँच को भी नियंत्रित करती हैं। यही संयोजन उन समुदायों के जन्मसिद्ध और नागरिक अधिकारों को सीमित करता है जो लंबे समय से वंचित रहे हैं। भाषण का वह हिस्सा स्पष्ट करता है कि सांस्कृतिक प्रभुत्व केवल धार्मिक रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं; यह शिक्षा, सार्वजनिक स्मृति और पहचान के माध्यम से भी कार्य करता है।

लचीलापनविकासशील रणनीति:

          ब्राह्मणवादी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण गुण पाशा के अनुसार उसकी लचीलेपन शीलता है। यह कठोर रीति-रिवाज़ों में कैद होकर नहीं टिकती; विरोधी धाराओं में प्रवेश कर, नेतृत्व हथियाकर और उनकी दिशाओं को मोड़कर स्वयं का विस्तार कर लेती है। मस्जिदों, चर्चों, विहारों — हर जगह इस तरह की खुरचनें दिखाई देती हैं, जहाँ शुरुआती आदर्शों के स्थान पर सत्ता के नए स्वरूप उभरते हैं। इसका व्यावहारिक निष्कर्ष साफ़ है: संघर्ष केवल बाहरी टकराव से नहीं, अंदरूनी राजनीतिक-सांस्कृतिक फेरबदल से भी जुड़ा होता है।

विचारधारात्मक टकराव: न्याय बनाम वर्चस्व:

भाषण में दो स्पष्ट वैचारिक धारणाएँ उभरतीं — एक वह जो स्पष्ट रूप से सत्ता संरचना के संरक्षण में है और दूसरी वह जो समता, न्याय और मानवाधिकारों की परंपरा को आगे बढ़ाती है (फुले, शाहू, अंबेडकर की विरासत)। पाशा कहते हैं कि वास्तविक टकराव धार्मिक पहचान के बजाय मानव-समानता की माँग और संकुचित वर्चस्ववादी व्यवस्था के बीच है। यह वह कथन है जो समकालीन सामाजिक आंदोलनों को केवल धार्मिक संघर्ष नहीं, बल्कि संवैधानिक और नागरिक अधिकारों के प्रश्न के रूप में देखने का आग्रह करता है।

आधुनिक खतरे: औपचारिकता बनाम वास्तविकता:

          आज का भय यही है कि संवैधानिक व्यवस्थाएँ और औपचारिक नियम बने रहने के बावजूद व्यवस्था का व्यवहार और सत्ता का अभ्यास बदल सकता है। शिक्षा संस्थानों में घुसती नफ़रत, प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पक्षपात और दैनिक जीवन में संवैधानिक अधिकारों की उपेक्षा—ये संकेत देते हैं कि केवल कानून का अस्तित्व पर्याप्त नहीं है; उसकी प्रभावी रक्षा और संस्थागत जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है।

 रास्ते और समाधान:

          पाशा समाधान को पहचानों के पार देखना चाहते हैं। उनका वक्‍तव्य धार्मिक पहचान बदलने का नहीं—बल्कि समानता-आधारित एकजुटता, संगठित राजनीतिक रणनीति और संवैधानिक अधिकारों की दृढ़ रक्षा का समर्थन करता है। फुले–शाहू–अंबेडकर जैसी परंपराएँ, जो सामाजिक न्याय को केंद्र में रखती हैं, पाशा के लिए न केवल ऐतिहासिक प्रतीक हैं बल्कि सामूहिक मुक्ति की व्यवहारिक रूपरेखा भी हैं।

निष्कर्ष: इतिहास की समझ से ही भविष्य बनेगा:

          समस्याओं की जड़ें यदि गहरी हैं, तो उनका उपचार भी गहरा और रणनीतिक होना चाहिए। पाशा की अंतर्दृष्टि यह स्पष्ट करती है कि उपेक्षित वर्गों का एकता और संवैधानिक लड़ाई ही दीर्घकालिक न्याय का मार्ग खोल सकती है। इतिहास की समझ के बिना केवल तात्कालिक विरोध-प्रदर्शन सीमित असर ही पैदा कर सकते हैं; जबकि संगठित और समता-केन्द्रित रणनीति परिवर्तन को स्थायी बना सकती है।

          पाशा की व्याख्या यह कहती है कि भारत में संघर्ष धार्मिक पहचान के बीच नहीं, बल्कि मानवाधिकार और वर्चस्ववादी व्यवस्था के बीच रहा है। अगर उपेक्षित वर्ग आपस में विभाजित रहते हैं तो वही सत्ता-ढाँचा और मजबूत होगा; पर यदि वे समानता और संवैधानिक अधिकार के आधार पर संगठित हों, तो बदलाव सम्भव है। इस अंतर्दृष्टि का निहितार्थ स्पष्ट है: इतिहास की समझ के बिना वर्तमान चुनौतियों का सामना करना कठिन है, और सामूहिक, रणनीतिक संगठन ही वह रास्ता है जो दीर्घकालीन न्याय की ओर ले जा सकता है ।(https://youtu.be/sL63uOVtmSQ?si=8qnypcq2QAsT5uOA)

Ramswaroop Mantri

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