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दिमाग की नसबंदी

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*शिव प्रसाद

भागवत ने बयान दिया कि “पंडितों ने जाति बनाई”, इस पर बहस छिड़ गयी है। कभी भागवत बयान देते हैं कि “आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए” इस पर भी हँगामा शुरू हो जाता है। कभी बयान आएगा “हनुमान दलित थे” फिर इस पर बहस शुरू हो जाती है। इस तरह की बहसों से रोजी-रोटी के सवाल पीछे हो जाते हैं। इस तरह के बयान सही मायने में दिमाग की नसबंदी करने के औजार की तरह होते हैं।

दिमाग की नसबंदी का मतलब दिमाग में नए विचार ना पैदा होने देना। बिना संदेह, बिना तर्क शोषक वर्ग की बात मान लेना।

  आज शोषक वर्ग जनता के अंदर सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक अंधविश्वासों को बढ़ावा देकर चेतना का विकास नहीं होने दे रहा है। लोग हजारों समस्याओं से जूझ रहे हैं और शासक वर्ग लोकलुभावन भाषण देकर जनता के दिमाग पर अपना कब्जा जमाए हुए हैं।

 जनता को धार्मिक और राजनीतिक ज्ञान के अलावा आर्थिक ज्ञान होना बहुत जरूरी है। दलाल नौकरशाह पूंजीपतियों, सामंती मठाधीशों, घुसखोर अफसरों और साम्राज्यवादी ताकतों का गठजोड़ हमारे देश के मजदूरों किसानों का जबर्दस्त शोषण कर रहा है। 

देश के छात्र, नवजवान, मजदूर, किसान, आर्थिक समस्याओं को लेकर रोजी रोटी के सवालों को लेकर कहीं शासक वर्ग के खिलाफ विद्रोह न कर दे, इस लिए शोषक वर्ग जनता के दिमाग में धार्मिक उन्माद भरकर जनता को जनता से  लड़ा रहा है।

 जनता को जनता से लड़ाने के लिए उन्होंने अखबार, टेलीविजन, रेडियो, सोशल मीडिया समेत सारी मीडिया, लगा दिया है। शोषक वर्ग की सारी मीडिया जनता के दिमाग की नसबंदी करने में लगी हुई है।

*यह लेख नया अभियान मासिक पत्रिका फरवरी अंक से लिया गया है।*

Ramswaroop Mantri

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