अग्नि आलोक
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पर उपदेश……. बहु तेरे

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी स्वतंत्रता के अमृतमहोत्सव की बधाई देने आए। बधाई देने के तुरंत बाद ही एकदम शुरू हो गए। शुरुआत इस तरह की।
मराठी भाषा में एक कहावत है।
लोका सांगे ब्रह्मज्ञान आपण कोरडे पाषाण इस कहावत में ऐसे व्यक्ति के लिए व्यंग्य हैं,जो दूसरों को तो नीति पर चलने का उपदेश देता है, आचरण को शुद्ध रखने की सलाह देता है लेकिन स्वयं के कथनी करनी में अंतर होता है।
उक्त कहावत का शब्दशः अर्थ होता है लोगों से ब्रह्म का ज्ञान की बात करना और स्वयं कोरे पाषाण की तरह रहना। इस बात को संत तुलसीबाबा ने रामचरितमानस में इस तरह कहा है।
“पर उपदेश कुशल बहु तेरे।जे आचरहिं ते नर न घनेरे
दूसरों को उपदेश देना तो बहुत आसान है लेकिन स्वयं उन उपदेशों पर अमल करना कठिन।
सीतारामजी के क्रोध मिश्रित वक्तव्य को सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ।
मैने साहस कर सीतारामजी से पूछा यकायक आज आपको क्या हो गया?
मेरे प्रश्न को नजरअंदाज कर सीतारामजी ने कहा महात्मा गांधीजी ने आंदोलन के दौरान स्वयं कस्तूरबा को साथ में रखा।
गांधीजी ने कहा है कि अगर में स्त्री होता तो चंडिका ही होता।
गांधीजी के अनुयायी भूदान प्रणेता आचार्य विनोबा भावेजी ने कहा है, नारी स्वरक्षित होनी चाहिए आरक्षित नहीं।
विनोबाजी ने उदाहरण देते हुए कहा है कि,जंगल में शेरनी की रक्षा शेर नहीं करता है।
कहा गया है न परोपकार की शरुआत घर से होती है
(Charity begins at home)
इतिहास हर बात को नोट करता है। इतिहास को झुठलाने की कोई कितना भी कोशिश कर ले,लेकिन इतिहास अमिट ही रहेगा।
इसवर्ष हम स्वतन्त्रता प्राप्ति के 76 वें वर्ष में प्रवेश कर गएं हैं। हमने 75वा वर्ष अमृतमहोत्सव के रूप में मनाया है। 75 वर्ष की गणना सन 1947 के 15 अगस्त से ही की गई है।
इस गणना में किसी को कोई कंफ्यूजन नहीं होना चाहिए।
सोचा था कि, हम सुनेंगे की बढ़ती महंगाई की गति पर लगाम लगेगी। बेरोजगारों के लिए रोजगार के स्त्रोत खुलेंगे।
गांधीजी और पटेलजी के गृहनगर में गरल युक्त मदिरा पर रोक लगेगी। रोक तो दूर अफसोस भी सुनने को नहीं मिला।
एक समाचार ने तो दिल दहला दिया, एक बालक ने प्रधान आचार्य के पीने का पानी पी लिया,उस बालक को बाल्यकाल में ही इहलोक से परलोक भेज दिया। उस बालक का अपराध सिर्फ इतना था कि वह दलित परिवार में जन्मा था।
परिवार के व्यापक स्वरूप को वाद-विवाद में घसीटना संकीर्ण सोच का ही तो द्योतक है।
इतना कहतें हुए सीतारामजी थोड़े सामान्य हुए। मुझसे क्षमा मांगते हुए कहने लगे पता नहीं आज मुझे क्या हो गया। मै एकदम आवेश में आ गया। क्षमा करना।
मैने कहा अंततः आप व्यंग्यकार ही तो हैं।
सीतारामजी ने मुस्कुराते मुझे अमृतमहोत्सव की बधाई दी।
इस अमृतमहोत्सव की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि, हमनें अपने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के महत्व को समझा है।
सभी देशवासियों को अमृतमहोत्सव की बधाई।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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