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*पत्रकार के काम को अपराध करार देना प्रेस की आज़ादी पर सीधा हमला,अभिसार पर भी FIR, करन थापर और सिद्धार्थ को SC से राहत*

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पत्रकारों के कई संगठनों ने वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन, करन थापर और अभिसार शर्मा के ख़िलाफ़ असम सरकार और उसकी पुलिस के रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए इसे प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर  हमला बताया है। साथ ही सिद्धार्थ और करन थापर के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई राहत का स्वागत किया है। 

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 22 अगस्त को द वायर के सह-संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और कंसल्टिंग एडिटर करन थापर के ख़िलाफ़ असम पुलिस द्वारा दर्ज राजद्रोह/देशद्रोह मामले में किसी भी दमनात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी। लाइव लॉ की ख़बर के अनुसार अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर के लिए निर्धारित की है। 

असम सरकार और उसकी पुलिस का रवैये को आप इससे समझ सकते हैं कि पहले 11 जुलाई 2025 को असम में द वायर की एक रिपोर्ट के आधार पर एफ़आईआर दर्ज की गई थी, जिसमें कथित तौर पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तानी बलों द्वारा भारतीय लड़ाकू विमानों को मार गिराने का ज़िक्र था। इस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएँ 152, 196, 197, 353, 45 और 61 लगाई गईं। पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसने 12 अगस्त 2025 को असम पुलिस द्वारा किसी भी तरह की दमनकारी कार्रवाई से उन्हें अंतरिम सुरक्षा दी। 

मगर इसके तुरंत बाद असम पुलिस ने थापर और वरदराजन पर एक और मुक़दमा दर्ज कर दिया। आज 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी एफ़आईआर में भी फिलहाल किसी तरह की कार्रवाई पर रोक लगा दी है।

अभिसार शर्मा का मामला

इस बीच, एक और वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा, जो लोकप्रिय यूट्यूब चैनल चलाते हैं, और Newsclick से भी जुड़े रहे हैं, पर भी गुरुवार, 21 अगस्त को एक एफ़आईआर दर्ज की गई। उन पर भी राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता को ख़तरे में डालने, विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने और राष्ट्रीय एकीकरण को प्रभावित करने वाले आरोप लगाए गए हैं। यह मामला असम में सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार पर उनके एक कार्यक्रम से जुड़ा है। शिकायत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के एक सदस्य द्वारा दर्ज कराई गई, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध संगठन है।

इन दोनों मामलों में असम पुलिस की कार्रवाई की देशभर में कड़ी आलोचना हुई है। पत्रकार संगठनों के साथ-साथ कई विपक्षी नेताओं ने भी इसका विरोध किया है। प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, इंडियन वीमेंस प्रेस कॉर्प्स, दिल्ली यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स, मुंबई प्रेस क्लब, डिजीपब समेत कई संस्थाओं ने इसे पत्रकारों को डराने-धमकाने की कार्रवाई बताया है।

पत्रकार अभिसार शर्मा पर दर्ज हुई एफ़आईआर की आलोचना करते हुए ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टलों और स्वतंत्र पत्रकारों के साझा मंच– डिजीपब ने आरोप लगाया कि पुलिस का इस्तेमाल लगातार असहमति की आवाज़ों को दबाने के हथियार की तरह किया जा रहा है।

संस्था ने कहा कि “अभिसार शर्मा जैसे सम्मानित पत्रकार के काम को अपराध करार देना प्रेस की आज़ादी पर सीधा हमला है”। डिजीपब ने मांग की कि यह मुक़दमा तुरंत रद्द किया जाए और पत्रकारों को डराने-धमकाने का सिलसिला ख़त्म हो।

डिजीपब ने सरकार और न्यायपालिका से भी अपील की कि राजद्रोह/देशद्रोह जैसी दमनकारी धाराओं का दुरुपयोग रोका जाए। संगठन ने कहा—“प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद है और हम हर क़ीमत पर इसकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

Ramswaroop Mantri

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