अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

कनाडा और फ्रांस की अमेरिका और ट्रंप को कड़ी चुनौती, ने ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में में गाड़ दिया अपना झंडा

Share

नूक: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर नियंत्रण बढ़ाने के दबाव के बीच कनाडा और फ्रांस ने वहां अपने नए वाणिज्य दूतावास खोल दिए हैं. हालांकि दोनों देशों का कहना है कि यह फैसला पहले से तय था, लेकिन इसकी टाइमिंग को सीधे तौर पर वॉशिंगटन के लिए एक कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है. फ्रांस और कनाडा ने साफ कर दिया है कि रणनीतिक और खनिज संसाधनों से भरपूर यह द्वीप कोई ‘प्रॉपर्टी’ नहीं है जिसे खरीदा जा सके. अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों के जरिए इन देशों ने ग्रीनलैंड की संप्रभुता का समर्थन किया है. फ्रांस ऐसा पहला यूरोपीय संघ (ईयू) देश बन गया है, जिसने इस स्वायत्त डेनिश क्षेत्र में अपना राजनयिक मिशन स्थापित किया है. फ्रांसीसी विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि की है. कनाडा ने भी शुक्रवार को ही यहां अपना कॉन्सुलेट खोला है. कनाडा और फ्रांस के इस कदम को एक बड़े ‘राजनीतिक संकेत’ के रूप में देखा जा रहा है.कनाडा और फ्रांस ने ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में वाणिज्य दूतावास खोलकर अमेरिका और ट्रंप की मंशा को कड़ी चुनौती दी है. खनिज संसाधनों और रणनीतिक बढ़त के लिए फ्रांस अब वहां वैज्ञानिक व व्यापारिक मिशन चलाएगा. नाटो की बढ़ती सैन्य हलचल के बीच फ्रांस ऐसा करने वाला पहला ईयू देश बन गया है

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने जून 2025 में अपनी ग्रीनलैंड यात्रा के दौरान ही इसकी योजना बना ली थी. अब जां-नोएल पोइरियर ने नूक में कांसुल जनरल के रूप में कार्यभार संभाल लिया है. पोइरियर एक अनुभवी राजनयिक हैं और वियतनाम में फ्रांस के राजदूत रह चुके हैं. उनकी नियुक्ति यह साफ करती है कि फ्रांस इस क्षेत्र को कितनी गंभीरता से ले रहा है.

क्यों ग्रीनलैंड को लेकर मची है दुनिया में होड़?

ग्रीनलैंड कहने को तो बर्फ की चादर से ढका एक द्वीप है, लेकिन इसकी सतह के नीचे छिपे खनिज संसाधन महाशक्तियों की रातों की नींद उड़ा रहे हैं. फ्रांस यहां केवल झंडा गाड़ने नहीं गया है. उसके मिशन में वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाना और अपनी कंपनियों के लिए निवेश के रास्ते खोलना शामिल है. सबसे महत्वपूर्ण काम वहां मौजूद दुर्लभ खनिज संसाधनों की संभावनाओं का आकलन करना है. जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे यहां छिपे खजाने तक पहुंच आसान हो रही है. फ्रांस चाहता है कि इन संसाधनों की दौड़ में वह अमेरिका या चीन से पीछे न रहे.

क्या ट्रंप के ‘कब्जे’ वाले प्लान को मिलेगी चुनौती?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार ग्रीनलैंड को खरीदने या हासिल करने की इच्छा जताई है. हालांकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड के प्रशासन ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है, लेकिन ट्रंप के बयानों ने पूरे यूरोप को चौकन्ना कर दिया है. ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने हाल ही में कहा था कि वॉशिंगटन की इसे कब्जाने की मंशा अब भी बनी हुई है. ऐसे में फ्रांस का वहां अपना मिशन खोलना ईयू की ओर से एक मजबूत संदेश है कि ग्रीनलैंड केवल अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में नहीं रहेगा. कनाडा भी अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है और वहां नया दूतावास खोल रहा है.
क्या आर्कटिक में शुरू होने वाला है सैन्य तनाव?
ग्रीनलैंड में सैन्य गतिविधियां भी तेज हो गई हैं. नाटो (NATO) ने ‘आर्कटिक सेंट्री’ नाम से एक नया मिशन शुरू करने की योजना बनाई है. इसका मुख्य उद्देश्य उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में निगरानी और सतर्कता बढ़ाना है. असल में अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच ग्रीनलैंड को लेकर एक तरह का आंतरिक तनाव भी है. नाटो चाहता है कि आर्कटिक क्षेत्र में उसकी स्थिति इतनी मजबूत रहे कि कोई भी महाशक्ति अकेले यहां मनमानी न कर सके. फ्रांस की एंट्री ने इस पूरे समीकरण को और दिलचस्प बना दिया है.

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें